Saturday, 13 July 2019

कुछ पल नदी भी ठहरना चाहती होगी!

यकीनन
निरंतरता, तरलता और सरलता की
मौलिक प्रवृति के बाद भी,..
ढलान से
कलकल करती मनोरम झरने की
प्राकृतिक सुंदरता के बावजूद भी,..
कभी, कहीं,
किसी न किसी तट पर,
किसी न किसी ढलान पर,
किसी न किसी मोड़ पर,
कुछ पल
नदी भी ठहरना चाहती होगी,..
लेकिन
जब-जब
जहाँ-जहाँ
उसने थमना चाहा
या तो प्रदूषण और मलीनता उसके हिस्से में आई
या फिर वो सूख गई
इससे बचने की विवशता के चलते
सारे अवरोधों को पार करती हुई
नदी सतत चलती रहती है
ये जानते हुए भी
उसकी नियति
सह अस्तित्व के नियमानुसार
अंततः सागर में मिलकर
खारा हो जाना ही है
फिर भी मलीनता
और
समय से पूर्व अस्तित्वहीन हो जाने की बजाय
निरंतरता को बरकरार रखते हुए
नियति को स्वीकारते हुए
समर्पण की भावना लिए
सागर में विलीन होना ही चुनती है,..!
पर मुझे पूरा विश्वास है
कुछ पल
नदी भी ठहरना चाहती होगी,..
हाँ!
बिल्कुल मेरी तरह,..!

प्रीति सुराना

Friday, 12 July 2019

कैद

बहुत गहरे में भीतर मन के
कुछ तो है जो चुभता है,
नहीं होता है हरदम वो ही
बाहर से जो दिखता है,
लाख लगा लूँ पहरे मन पर
मुस्कानों से गम को कैद करूँ,
पढ़ ही लेते हैं जो अपने हैं
आँखों से जो रिसता है,...!

प्रीति सुराना

Monday, 8 July 2019

गुजर-बसर

बहुत कठिन होता है हरदम
खुद से खुद तक का सफर,
अकसर सबको मिल जाती है
कांटों वाली ही डगर,
जिस तक जाने की हो चाह
चाहे उस जग में हो प्रेम,
फिर भी खुद से परिचय के बिन
नामुमकिन है गुजर-बसर!

प्रीति सुराना

Sunday, 7 July 2019

मेरे आँचल के चार कोने,... और मेरी मन्नतें

मेरे आँचल के चार कोने,... और मेरी मन्नतें

सुना था
मांगनी हो कोई मन्नत
तो बांध लेना चाहिए
अपने आँचल में गाँठ
और रखना चाहिए अटूट विश्वास
ये मन्नतें जरूर पूरी होंगी!
मेरे आँचल के चार कोने,...

एक में बांधी जन्मदाता
माँ-पापा के आशीर्वाद की
ताउम्र ख्वाहिश के नाम की गाँठ
और खोंच लिया कमर पर
इस निश्चय के साथ कि
जब तक आँचल में बंधा है आशीष
कमरकस कर तैयार हूँ
हर परिस्थिति का सामना करने
और जिम्मेदारियों को निभाने के लिए!

दूसरे में बांधी सृष्टि की
सलामती की आकांक्षा
और छोड़ दिया धरा के संपर्क में
इस उम्मीद के साथ
कि मेरी यह मन्नत
खुद धरती माँ संभाल लेगी
जैसे संभालती है सम्पूर्ण सृष्टि
अपने संतुलन से
अनंतानंत काल से!

तीसरे कोने में बांधी एक गाँठ
अपने बच्चों की खुशियों के नाम
और छोड़ दिया हवा में लहराता
ताकि मेरे बच्चे
मुझसे भावनाओं की डोर से
बंधे रहकर भी सीख जाएं
परिंदों की तरह
आज़ाद रहकर भी
उड़ना, गिरना और संभलना!

चौथा और आखरी कोना
जो रहता है हमेशा मेरे हाथ में
मेरे वजूद को सुरक्षित ढकता हुआ
मुझे खुद में समेटता हुआ
मुझे महसूस करवाता हुआ
कि सृष्टि में जन्मदाताओं ने मुझे जन्म दिया
मैंने नई संतति को जन्म देकर कर्तव्य निभाया
पर अब तमाम कर्तव्य निभा पाउंगी
सिर्फ तुम्हारे साथ के कारण,..!

मेरे आँचल के आखरी कोने में
बंधी है मन्नत सिर्फ तुम्हारे साथ की,
देना मुझे दुआ हमारा साथ न छूटे,
मेरी चारो मन्नतों में
माँ-पापा, सृष्टि, बच्चे और तुम्हारी
ख्वाहिश, आकांक्षा, उम्मीद और खुशी मांगी
जो कर देगी मेरा संसार पूरा
उस कोने में लाकर
जहाँ बंधी हैं गाँठ हमारे साथ की मन्नत की!

सुनो!
अब बारी तुम्हारी 
माँगना तुम भी
एक मन्नत
मेरी मन्नतों के पूरे होने की
क्योंकि
मेरा जीवन समर्पित जिसे
वो हो
सिर्फ तुम,..!

प्रीति सुराना

Friday, 5 July 2019

गूढ़ कविता सा,..!

सुनो!
लिखना चाहती हूँ हर विधा में खुद को
बेबहर जिंदगी है और बाबहर मुश्किलें
गीत, ग़ज़ल, कहानी, कविता
क्या लिखूं कुछ भी तय नहीं है
शब्द तो है पर लय नहीं है

कथ्य, शिल्प, उपमेय, उपमान
अलंकार, शब्दशक्ति, रस, भाव
और कथ्य भी है
पर कथानक के लिए व्यवस्थित ज़मीन नहीं है
लंबी कहानी है
पर कविता सी छोटी जिंदगानी है

आज
जब मैं लिखना चाहती हूं
शब्द-शब्द खुद को
तो समझ नहीं पा रही हूँ
खुद को कहानी सा विस्तार दूँ
या समेट लूँ खुद को
किसी गूढ़ कविता सा चंद पंक्तियों में,..!

प्रीति सुराना

Sunday, 30 June 2019

मैं बुरी ही सही पर मैं हूँ!

मुझमें गिन-गिन कर बुराई ढूंढने का शुक्रिया।
मुझमें छुपे तमाम ऐब तलाशने का शुक्रिया।
इतना तो मैं खुद भी खुद को नहीं जानती थी,
इस तरह मुझसे मुझे ही मिलाने का शुक्रिया।

प्रीति सुराना

Thursday, 27 June 2019

आज डॉ चाचा&चाची की शादी को 42 साल हो गए

मुझे बहु बनकर आए 21 साल हो गए सुराना परिवार में और आज डॉ चाचा&चाची की शादी को 42 साल हो गए।
बात यूँ है कि तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई टाइप डॉ. (Bharti Surana) चाचा-चाची से (दोनों दरअसल रिश्ते में दादा-दादीसास हैं) आते ही रिश्ता जुड़ गया। दादा-दादी को चाचा-चाची कहते-कहते और तनु के कदमो की आहट के साथ ही डॉ. पेशेंट का रिश्ता कब दोस्ती में बदल गया पता ही नहीं चला। रोज नई तकलीफों से जूझती ही रहती हूँ पर हिम्मत और आत्मविश्वास में आप दोनों का साथ भूल ही नहीं सकती, आज जहां हूँ, जो हूँ उसके पीछे आप दोनों की प्रेरणा और आशीर्वाद साथ न होता तो आज सिर्फ एक पेशेंट होती, शायद डिप्रेशन की शिकार और कुछ करने का हौसला और जुनून होता ही नहीं। आप दोनों को शादी की सालगिरह की ढेर सारी बधाइयाँ, मेरे दोस्त होने का दिल से आभार।
यूँही खिलखिलाते रहें आप दोनों
और आज जो बिरवां रोपा है आंगन में
बस उसके साथ-साथ
खुशियां भी आंगन में बढ़ती रहे हर रोज,...!

प्रीति सुराना