Wednesday, 12 May 2021

कल्याण मित्र

*हर एक दोस्त जरूरी होता है* 

आज मैं इस बात को हमारे गुरुजनों के दर्शनानुसार एक नए तरीके से पल्लवित करने का प्रयास कर रही हूँ।
जीवन मे नौ रस, सात रंग होते है सभी का अलग अलग अनुपातों में मिश्रण नए रंग और नए रस का जनक होता है। उसी तरह मित्र भी व्यवहार और साहचर्य के अनुसार पाँच प्रकार के होते हैं।
1. खाली मित्र
2. ताली मित्र
3. प्याली मित्र
4. थाली मित्र
5. कल्याण मित्र
आप सभी सोच रहे होंगे कि ये किस प्रकार के मित्रों की बात कर रही हूँ? है न!
अति संक्षिप्त व्याख्या कर रही हूँ, जब कोई बिल्कुल खाली हो और कोई कामधाम न हो तो आपके पास आकर घंटों बैठ जाए वो है *खाली मित्र*, आपके पास बैठे तो बैठे आपकी हर बात पर आपके मुँह पर तारीफ करे (पीठ पीछे राम जाने) वो होता है *ताली मित्र*, जो चाय या वाय के लिए हमप्याला होने को मिलता जुलता रहे वो है *प्याली मित्र*, जिसे बाहर खाने का शौक हो लेकिन हर बार अपनी जेब खाली न करने की गरज से आपके साथ खाने-पीने-घूमने को जाए वो है *थाली मित्र*!
वास्तविकता ये है कि समय समय पर हमें इन सभी मित्रों की आवश्यकता महसूस होती रहती है, और हम भी किसी के लिए इनमें से किसी श्रेणी के मित्र हो सकते हैं।
अब बात करते हैं *कल्याण मित्र* की,...! 
वो मित्र जो खाली या अकेलेपन में सबके पहले याद आए, दुख बाँटने या खुशी मनाने में जरुरी हो, हम प्याला हो या हमनिवाला हो लेकिन हमारी पसंद और जरूरतों का हमसे ज्यादा जिसे अंदाजा हो, हमारी सफलता पर जिसका सीना गर्व से फूल जाता हो लेकिन हमारी गलती पर सबसे ज्यादा रोकता, टोकता, डाँटता या समझाता हो, जिस मित्र में हर तरह से, हर परिस्थिति में साथ निभाने का जज्बा हो। जो माँ की ममता, पिता का साया, भाई/बहन का प्रेम और स्पष्टवादी मित्र हो, वो होता है *कल्याण मित्र*। और हर एक मित्र जरुरी होता है लेकिन कल्याण मित्र जीवन के लिए ऑक्सीजन होता है। न मिले तो दुर्दशा कैसी ये हम और आप सभी जानते हैं। 

मेरे सभी कल्याण मित्रों को समर्पित यह रचना 

दोस्ती      एक    ऐसा     रिश्ता
जिसमें      उम्र,    जाति,    धर्म, 
पैसा,    काम,  या परिवार  नहीं
मायने      रखता   है    व्यवहार,
अटूट     विश्वास     और    प्यार
कह    सकें  दिल  की  हर  बात
बिन भूमिका या बिन ये कहे कि 
किसी   से    कहना  मत    यार,
और     हो     सके   बिना   द्वेष
दोस्त   की  खुशी  में  हम  खुश
दुख में हो  जाए  ये  मन  आहत
मैं और तुम 'हम' बनकर निभाएं 
ताउम्र  ये रिश्ता  यही है चाहत। 

मेरे सभी मित्रों के जीवन मे कोई न कोई कल्याण मित्र जरुर हो ये कामना हमेशा करुँगी, और मेरे सभी मित्रों को मेरा मित्र होने के लिए दिल से आभार -> 

साथ ही एक सच यह भी👇🏼
काफिला साथ चलता है अकसर कामयाबी के बाद,..
बिरले ही होते हैं जो संघर्ष में साथ देते हैं,.
कामयाब होने के बाद हाथ थामने वालों को क्या कहूं,..?
"दोस्त" वो होते हैं जो मुश्किल वक्त में हाथों में हाथ देते हैं,..!
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति
*डॉ प्रीति समकित सुराना*

समर्पित आप श्री के चरणों में,

मेरा शौर्य  और संवेग  समर्पित आप श्री के चरणों में, 
वाणी  आपकी  ही  गूंजती  है प्रतिपल  मेरे कर्णों  में,
सूरी पीयूष,  सम्यक ही बस गए मेरी हैं इन आँखों में,
गुरुवर सानिध्य का संकल्प सजा दो मेरे मन के वर्णों में।

डॉ प्रीति समकित सुराना

माँ का प्यार

जिसका प्यार  कभी अल्प नहीं होता,
जिसके बिना कोई संकल्प नहीं होता,
केवल "माँ का प्यार" ही है दुनिया में,
जिसका कोई भी  विकल्प नहीं होता।

#डॉप्रीतिसमकितसुराना

चमत्कार से कम नहीं,..!


            दो बिल्कुल विपरीत लड़कियाँ रुप, रंग, व्यक्तित्व, व्यवहार, परिस्थितियाँ और परिवेश की 3 माह 21 दिन का उम्र में फर्क था। छोटी लड़की के पहले जन्मदिन में मोहल्ले के बच्चों के साथ पहली बच्ची को भी बुलाया गया। उस पहली मुलाकात के बाद एक मोहल्ला, एक ही रिक्शा, एक ही स्कूल लेकिन केजी1 से 10वीं तक अलग अलग सेक्शन्स में रहीं या ये समझ लीजिए कि दोनों की दोस्ती के कारण रखा गया। ग्यारहवीं में एक ही विषय होने के बाद सिर्फ 2 साल एक क्लास में रहीं। घर पर भी परिवारों में बहुत मेल न था। एक तरह से एक के घर सर्व सुविधाओं के बीच बंधन कसे हुए थे, एक के घर सीमित साधनों में भी आजादी के एहसास थे। एक के घर दूसरी आती तो शान्ति से दबे पांव, दबी आवाज़ और दबे अंदाज़ में दूसरी के घर पहली आती तो झूले की पेंगों से भी तेज, तूफान की तरह और शरारतों की टोकरी लिए।
        वक़्त ने करवट ली। पहली जो ननिहाल में रही बचपन से वो पहुँच गई नाना घर से अपने घर। वहाँ से 3 साल बाद ससुराल। उसकी शादी के 4 साल बाद दूसरी की शादी हुई।
        सच कहूँ तो आज भी सैंकड़ों मीलों की दूरी है, दोनों में कोई समानता, कोई स्वार्थ, कोई लाभ-हानि नहीं सिर्फ एक ही आधार पर टिका है दोनों का रिश्ता वो है "विश्वास युक्त प्रेम"।
        हाँ! आज पूजा का जन्मदिन है और प्रीति-पूजा की विस्मयकारी दोस्ती की 44वीं वर्षगाँठ भी। जो किसी *चमत्कार* से कम नहीं। ढेरों शिकायतों के बाद भी दोनों खुश हैं साथ-साथ वो भी ताउम्र दोस्ती निभाने के लिए सपरिवार❤️😘। 

डॉ प्रीति समकित सुराना

तमस घनेरा छट जाएगा

तमस घनेरा छट जाएगा
नया सबेरा फिर आएगा 

कहा समय ने ही ये मुझसे
बुरा समय है कट जाएगा 

समय समय की है ये बातें
समय नया दिन खुद लाएगा 

नहीं बदल पाया जीवन तो
समय ठहर कैसे पाएगा 

कल फिर कल वो होगा जिसमें
नया सबेरा फिर आएगा
बुरा समय है कट जाएगा
तमस घनेरा छट जाएगा 

डॉ प्रीति समकित सुराना

Friday, 30 April 2021

बेड़ा पार करेंगे राम

छोड़ बुरे करो अच्छे काम।
सहना सीखो छाँव-घाम।
धैर्य धारण कर लोगे जब,
तो बेड़ा पार करेंगे राम।। 

सच्चा भक्त, या हो वाम।
करे दंड-भेद-दाम या साम।
उद्देश्य अगर लोकहित हो,
तो बेड़ा पार करेंगे राम।। 

चरण प्रभु के लेना थाम।
जाकर राम प्रभु के धाम।
जनहित की करना याचना,
तो बेड़ा पार करेंगे राम।। 

याद रखो बस सुबह-शाम।
नाम जपो तुम आठो याम।
मैले मन को निर्मल कर लो,
तो बेड़ा पार करेंगे राम।। 

केवल जपना नहीं है नाम।
कर्मों का ही मिलेगा दाम।
कर्म यदि होंगे अच्छे सब,
तो बेड़ा पार करेंगे राम।। 

डॉ प्रीति समकित सुराना

मानवता की परीक्षा है

बीते  तीन  दिनों में  तीन अपनों को खोया है
पल-पल,  बात-बात  पर मन ये मेरा  रोया है
हे! ईश्वर कैसी कठिन मानवता  की परीक्षा है
तू बतला भगवान कि तू जाग रहा या सोया है 

डॉ प्रीति समकित सुराना

#आसमाँ कुछ बोल

छोटी सी मेरी औकात
क्या दूँ मैं कोई सौगात

पीड़ा तीखी दिल में आज
गिन न सकी इतने आघात

सुख मानो कुछ पल की ओस
दुख आँसू की है बरसात

अब तू आसमान कुछ बोल
तुझ संग है तारों की बारात

अब सुखमय हो हर इक जीव
दिन हो खुश, जगमग हो रात।

डॉ प्रीति समकित सुराना

Friday, 16 April 2021

*हिंदी साहित्य राष्ट्र गौरव सम्मान*

*सूचना एवं सम्मान* के लिए हार्दिक आभार आदरणीय, मार्गदर्शक और परम मित्र Dinesh Dehati Kavi जी एवं साहित्य संगम संस्था तिरोड़ी का जिन्होंने यह सूचना [30/03, 15:32] को व्हाटसप पर दी। 

"हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन करने एवं अपनी निरंतर हिंदी लेखन  में सफलता के लिए *डॉ प्रीति समकित सुराना वारासिवनी* को *हिंदी साहित्य राष्ट्र गौरव सम्मान* 10 अप्रैल को राष्ट्रीय साहित्यकार सम्मेलन तिरोड़ी द्वारा प्रदान किया जाएगा।"

सहचलन

*सहचलन*

जितने नकारात्मक या बचकाने काम है
अकेली उंगली से हो जाते है

कनिष्का से कुट्टी करना या लघुशंका का इशारा,
अनामिका से नुक़्क़ीन बांधना
(यानि न छूने का इशारा)
मध्यमा दिखाकर गाली देना
तर्जनी से दोषारोपण
और अंगूठे से धत्ता दिखाना!

पर
कनिष्का से कहा की कलम पकड़ ले
अनामिका से अपेक्षा की कनिष्का का साथ दे
मध्यमा से निवेदन किया पन्ने पलट ले
तर्जनी से कहा मुझे मेरे दोषों से अवगत करा
अंगूठे से कहा तर्जनी से मिले बिना सब कुछ लिखकर बता।

सब ने एक स्वर में एक ही बात कही 
कोई भी अच्छा काम किसी एक उंगली का नहीं है 
दूसरी उंगली का सहारा लेना ही पड़ता है।

तब एकता और मुष्ठी के बल
और सहचलन के सिद्धांत पर
मेरा यकीन अटल हो गया

जो मैं नहीं कर सकती 
वो हम करने की ताकत रखते हैं
विचारणीय है,...
यूँ भी कहावतें यूँही नहीं बनती
कहा गया है
*अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता*

*डॉ प्रीति समकित सुराना*

Thursday, 15 April 2021

जिंदगी! देख

जिंदगी! देख
तू है तो सब कुछ है
तू है और मैं मर-मर कर जियूँ
ये ठीक तो नही है न?
और तेरे लिए ही
हर हालात से 
लड़ना सीख लिया है मैंने,..
छलावा नहीं है
अब मेरी मुस्कुराहट में
अपने दर्द और आँसुओं को
पीना सीख लिया मैंने,..
हाँ जिंदगी! देख
मैं खुश हूँ
और
तेरी खातिर
जीना सीख लिया मैंने,..!

डॉ प्रीति समकित सुराना

*समर्थ नारी गौरव सम्मान* 2021

मेरी 14 पुस्तक "सृष्टि मेरे आँचल में,..!"
(लिपिबध्द पुस्तक एवं ईबुक दोनों प्रकाशित)

*समर्थ नारी गौरव सम्मान* 2021 
(अप्रतियोगी)

ईबुक का लिंक
सृष्टि मेरे आंचल में - डॉ. प्रीति सुराना - antrashabdshakti.com/2021/04/09/सृष्टि-मेरे-आंचल-में-डॉ-प्/

सभी पुस्तकें एक साथ 👇🏼
antrashabdshakti.com/category/समर्थ-नारी-गौरव-सम्मान/

निम्नलिखित *आ. रचनाकारों* को
अन्तरा शब्द शक्ति प्रकाशन एवं संस्था द्वारा आयोजित लेखन प्रतियोगिता में सक्रिय सहभागिता, साहित्य सेवा एवं सृजन हेतु *समर्थ नारी गौरव सम्मान 2021* से सम्मानित किया जाता है।

विश्व महिला दिवस 8 मार्च को आयोजित लेखन प्रतियोगिता जिसमें सभी रचनाकारों की 16 पेज की लघु पुस्तिका प्रकाशित की गई है। कोरोना महामारी की विषम परिस्थितियों के चलते चाहकर भी विमोचन का आयोजन नहीं कर पा रहे हैं इसलिए इस बार ईविमोचन एवं सम्मान का आयोजन किया गया। जिसमें सभी रचनाकारों को 10 पुस्तकें, सम्मान पत्र और स्मृति चिन्ह डाक द्वारा भेजा जा रहा है। प्रथम विजेता को 500/ द्वितीय विजेता को 300/ तृतीय विजेता को 200/- की नगद राशि खाते में भेजी गई।
निर्णायक की भूमिका डॉ भारती वर्मा बौड़ाई (मार्गदर्शक), कीर्ति प्रदीप वर्मा (महासचिव), पूजा दीपक राठौड़ (संयोजक) ने निभाई।

प्रतिभागियों के नाम

1. मंजू सरावगी (प्रथम)
2. पिंकी परुथी 'अनामिका' (द्वितीय)
3. किरण विचपुरिया (द्वितीय)
4. तोषी गुप्ता (तृतीय)
5. लीना शर्मा
6. अदिति रूसिया
7. संगीता देवांगन
8. सोनाली तिवारी 'दीपशिखा'
9. डॉ हेमा पाण्डेय
10. ऋतु कोचर
11. मीना विवेक जैन
12. देवयानी नायक
13. मीनाक्षी सुकुमारन
14. सुषमा सोनी 'टीना'
15. पूजा राठौर (निर्णायक)
16. कीर्ति वर्मा (निर्णायक)
17. डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई (निर्णायक)
18. 
डॉ प्रीति समकित सुराना 
(आयोजक एवं संस्थापक)
अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन एवं संस्था

मेरी 13वीं पुस्तक "प्रीत के गीत"

मेरी 13वीं पुस्तक "प्रीत के गीत" 
यूँ तो विमोचन हुए तीन महीने से ज्यादा हो गए हैं पर आज पन्ने पलटते हुए मन किया कि सखी Ranjana जी का आभार व्यक्त करुँ जिनकी लिखी भूमिका ने मेरी पुस्तक का महत्व बढ़ा दिया।
दिल से आभार सहित प्रस्तुत है उनकी लिखी भूमिका👇🏼

प्रीत के गीत की गूँज
=============
             अक्षर ब्रह्म है। शब्दों में समाहित अक्षर-समूह जीवन रचना का आधार है। अक्षर ही अभिव्यक्ति है और बाह्य-अन्तर अभिव्यक्ति ही अध्ययन-अनुभव, चरित्र और संस्कार की परिचायक है। शब्द लालित्य, मधुरता और पावित्र्य सहेज कर रखना और भावनात्मक सम्बन्धों को अपनी रचनाओं में जीवित रखना एक कवि की नैतिक जिम्मेदारी है।

उदयभानु हंस कहते हैं कि ----
             "वह शक्ति है कवि की कलम में जिससे इस धरती को वह स्वर्ग बना सकता है !"

             मन की गहरी झील में भाव हों और दृष्टि में सपने सजाने और पूरा करने की क्षमता, तो समूची कायनात स्थितियाँ पैदा करने का कारण बन ही जाती है, परन्तु किसी निर्झर की महीन ध्वनि मन के गहन अरण्य के एकान्त में तब तक सुनाई नहीं देती है, जब तक हम अपने मन के कोलाहल से स्वयं किनारा न कर लें। लवणयुक्त जिह्वा से मिश्री की मिठास कभी अनुभव नहीं की जा सकती। 
           प्रीति सुराना न केवल एक कवयित्री, लेखिका व सम्पादिका हैं, वरन् एक समाजसेविका भी हैं। गौशाला को मात्र शब्दों से ही बयां नहीं करतीं बल्कि सेवा और सुश्रूषा भी करती हैं। "औरत जब तक भी रहती है" --- यह उनके रक्त में प्रवाहित वह विषय है, जिसने अनगिनत महिलाओं को लेखन से जोड़ा है। छोटी-छोटी खुशियों को जीने का प्रोत्साहन दिया है।
                प्रीति सुराना एक आवाज है, जो संगठन की शक्ति बन जाती है। अपने आपको पहचानने का हुनर सिखाती है, अपना और अपनी भाषा हिन्दी का सम्मान करना सिखाती है, परन्तु हिन्दी पर होने वाली भाषायी और राजनैतिक नाइंसाफी से द्रवित हो प्रीति सुराना इस अत्याचार और अतिक्रमण से  भीतर तक कहीं टूट सी जाती हैं।
             मन को संभालते हुए, भावों को कलमबद्ध करते हुए, कवयित्री की काव्यगत उपमाएँ पार्थिव सौंदर्य की कल्पनाओं और अलंकारों में यथार्थ गढ़ती हैं। पर्वत, बादल, आसमां, पेड़ और धूप की परछाइयाँ उनके काव्य रूपी जल में उतर अठखेलियाँ करती हैं। प्रतिपल पाठकों के इर्द-गिर्द मृदु तरंगों का एहसास लिए उनके विषय अदृश्य रूप से मन को स्पर्श कर जाते है। 

कहते हैं कि-----
           मन यदि कुबेर हो जाए तो कनक राशि हर आँगन में बरस सकती है। यही सुवर्ण राशि बरसी है ------ प्रीति सुराना की नव कृति "प्रीत के गीत" के आँगन में लगभग 90 कविताओं की अविरत झड़ी बन।
               कवयित्री की लेखन के प्रति आसक्ति सर्वश्रुत है। उनके चिन्तन की परिधि में मृदा, पृथा, अम्बर, बूँद, बदली, समन्दर जैसे नैसर्गिक विषय और अश्क, सिसकी, मौन, अन्तस, दर्द जैसे करुणरस से ओतप्रोत विषयों की महक समायी रहती है, जो जरा, व्याधि इत्यादि को परे झटक कर अपनी खुशबू बिखेरती रहती है। आशा जब एक पल कभी निराशा की स्थिति भी उत्पन्न करती है, तो कवयित्री को लगता है कि "कुछ तो टूट रहा है अंदर", कभी सोचती है "दर्द की बदलियाँ हैं, गीत कैसे लिखूँ", मानो "लिख रही हूँ एक तराना" कहकर वह "अम्बर की अलगनी" पर "आँखों के नीर" को टाँग देना चाहती हैं।  
               घोर पूर्वाग्रहों और आत्ममुग्धता की गुंजलक में फंसे इस दौर में प्रीति सुराना द्वारा लिखी गई कविताओं के विषय में कहना होगा कि इन कविताओं के पठन पाठन से आरोहमान मानदण्डों तक पहुँचने की लालसा के तहत कवयित्री ने कविता की सुनहरी देहरी पर पाँव रखे हैं। 
              प्रीति सुराना अपने लिए साहित्य रूपी भास्कर से उष्मा पाती हैं। वे लेखन में इस कदर डूबी हुई हैं कि कलम और स्याही के बिना उनके प्राण प्रफुल्लित नहीं होते। वह कभी कहती हैं कि "अच्छे दिन आने तो दो" तो कभी खुद को आईने में देख कहती हैं "अच्छे दिन खुद क्यूँ नहीं लाते", कभी "चिन्ताएँ ही शेष रहीं" आज के भागम-भाग के समय में पेशानी पर अपने अक्स छोड़ जाती है।
             "प्रीत के गीत" में विषय बाहुल्य है। जिन पाठकों को ईश्वरीय वरदहस्त की मुमुक्षा है, उनके लिये "प्रभु थामो मेरी पतवार" जैसी कविता में प्रीति सुराना ने स्वयं को मानो भगवान को सौंप दिया है। "गणपति वंदना" में भगवान गणेश के एक सौ आठ नामों का स्मरण करते हुए उन्होंने अलख जगाई है। 
             पीड़ा की पराकाष्ठा को महसूस करते हुए कवयित्री प्रीति सुराना द्वारा लिखित कविताएँ हर दिल से होकर गुजरती हैं। सर्वकालव्यापी  समसामयिक काव्य अपनी छाप छोड़ते हैं --- "भीग रहा है अन्तस् मेरा", "गीत कैसे लिखूँ", "तबियत खराब सी है, खुशी नाराज़ सी है", "दर्द की बदलियाँ हैं" जैसे अनगिनत शीर्षक पाठकीय ऐषणा को, विशेष रूप से स्त्री विमर्श को झिंझोड़ कर, एक पल को साँसों की गति तेज़ करके भावनाओं को आकण्ठ कर जाते हैं। काव्य संग्रह ने मंजुल नाद उत्पन्न कर, मन के गलियारों में रस घोला है, जिसमें कवयित्री ने सहज, स्वाभाविक, प्रतिमान रचे हैं। उनके इस प्रयास का सर्वत्र स्वागत ही होगा।
         मानव मन को गूँथने के लिये जिस डोर और सूचिका की जरूरत है ,जो प्रवाह अभिलषित है, वही कवयित्री के उद्गार हैं।

कहा जा सकता है कि ----
            आसमां कागद हो और किरणें सुनहरी स्याही, तो जो भी लिखा जाएगा अप्रतिम ही होगा।

        इन कविताओं को महज कल्पना-प्रसूत व पीड़ा-जनित ही नहीं कहा जा सकता, अपितु वे मन के भाव-तन्तुओं को प्रियतर कंपन देती हैं। विद्वज्जनों के मध्य इस नव कृति का हार्दिक स्वागत होगा। काव्यात्मक उद्गार और रसमयता के संगम पर अधिष्ठित ये "प्रीत के गीत" पाठकों का अविरत स्नेह सम्पादित करेंगे, अपनी गूँज को धरा से लेकर अम्बर तक पहुँचाने में सक्षम होंगे,  इसी विश्वास के साथ----
     डॉ. प्रीति समकित सुराना को अनन्त शुभकामनाएँ।

 रंजना श्रीवास्तव
(कवयित्री/लेखिका) 
नागपुर - 440034
मो. 9096808191
( 17/12/2020 )

*क्या संबंधों में स्थिरता के चार सेतु समझ, सहयोग, सहभोज, संवाद हैं?*

नदी के दो किनारों की तरह दो स्वतंत्र व्यक्तिव मिलकर जब अपनी रिक्तता को स्नेह जल से भरते हैं तो प्रवाहित स्नेह से उपजे अनेक संबंधों को बांधने वाला सेतु बहुत मजबूत हो यह रिश्तों की स्थिरता और प्रगाढ़ता के लिए अनिवार्य है।
कल जब यह विषय आलेख के लिए चुना तब से मस्तिष्क में बार-बार मेरे दोनों परिवार यानि घर और अन्तरा शब्दशक्ति का नाम कौंधता रहा।
मेरी समझ से मैंने 'स' को 'स' से जोड़ने का प्रयास किया जिससे  'स' का दशक स्वतः ही तैयार हो गया। आप सोच रहे होंगे 'स' का दशक आखिर क्या?
तो सबसे पहले शीर्षक से शुरू करते हैं 
 *स्नेह* से उपजे *संबंधों* की *स्थिरता* हेतु मजबूत सेतु *समझ* से उपजा सामंजस्य, सामंजस्य से पनपी *सहयोग* की भावना जिससे जीवन नैय्या का तैरना आसान हो जाता है। साथ बैठ कर भोजन करने से एक दूसरे की रुचि-अरुचि, स्वाद, स्वास्थ्य और स्वभाव के साथ मनः स्थिति का अंदाजा लगता है। *सहभोज*, स्नेहभोज, प्रीतिभोज का आयोजन खुशी के अवसर पर किया जाना मूलतः एक दूसरे के सुखदुख में शामिल होने का प्रतिकात्मक स्वरूप ही है।
और सब से अंतिम और सबसे  से महत्वपूर्ण बात है *संवाद*, समझेंगे, मिलेंगे और जानेंगे तो बात होगी, और अटल सत्य है ये कि बात करने से ही बात बनती है। संवादहीनता सारे विकल्प बंद कर देती है। संवाद जारी रहे तो गुस्से में भी मन की बात बाहर आ जाती है और बात बाहर आने से समस्या को सुलझाया जा सकता है, संवादहीनता कुंठा को जन्म देती है और कुंठा सबसे दुष्कर गरल है।
अब जाहिर सी बात है जो *स्नेह के संबंध* हैं उनकी *स्थिरता* का *सेतु* यदि *समझ*, *सहयोग*, *सहभोज* और *संवाद* से बना हो तो *सभ्यता*, *संस्कार* और *संस्कृति* से परिपूर्ण मजबूत परिवार का निर्माण तय है और जिस देश में ऐसे परिवार हों उसकी *अखंडता और अक्षुण्णता अखंडित* ही रहेगी।
मैंने कोशिश की है हमेशा घर और अन्तरा शब्दशक्ति परिवार को इस स्नेहसेतु से बांधने की। तो आ रहे हैं न आप सब एक बार मेरे आंगन में स्नेहभोज और स्नेह संवाद के लिए क्योंकि हम सब एक परिवार हैं। हैं न!

डॉ प्रीति समकित सुराना

Sunday, 4 April 2021

भारत विकास परिषद द्वारा सम्मान

भारत विकास परिषद के संस्थापक डॉ सूरज प्रकाश जी की जन्मशताब्दी वर्षगाँठ पर महाकौशल के महासचिव डॉ नीरज अरोरा जी के संयोजन में समाज में उत्कृष्ट कार्यों हेतु गणमान्य नागरिकों का शाखा वारासिवनी में सम्मान किया गया। डॉ. के एस में जी (क्षेत्रीय महासचिव), प. आलोक मिश्रा (प्रांताध्यक्ष), इंजि. सुनील कोठारी (राष्ट्रीय मंत्री), आ. वैभव कश्यप जी (जिला संघ चालक), के कर कमलों से यह सम्मान मुझे भी प्राप्त हुआ, उससे बड़ा सम्मान मेरे लिए यह था कि उपरोक्त सभी अतिथियों ने किये गए कार्यों के लिए आशीर्वाद दिया और साथ ही भारत विकास परिषद में सक्रिय सहभगिता के लिए स्वीकृति देने को कहा। अपने परिवार और अपने नगर में सम्मानित होने का सुखद पल सचमुच अद्वितीय होता है। विभाग चालक आ. रविन्द्र श्रीवास्तव जी के संचालन में पूरी स्थानीय टीम के सहयोग से शपथ, सम्मान, राष्ट्रीय गीत के साथ भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।

*कुछ तो बात है*

अन्तरा शब्दशक्ति के साथ
*साल के 52 सप्ताह*
52 सप्ताह में 
प्रति सप्ताह तीन दिन 
शब्द, पंक्ति या चित्र पर कविता लिखना
यानि
कम से कम 156 कविताएँ,..
प्रति सप्ताह नए विषय पर
500 शब्दों में एक आलेख
यानि 52 आलेख 
कम से कम 156 पन्नों का गद्य लेखन,..
प्रति सप्ताह नए विषय पर
एक कथा/कहानी
यानि 52 कथा/कहानी
कम से कम 80 पन्नों का कहानियों का संकलन,..
साल में एक बार0 रचनाओं की समीक्षा
यानि 
कम से कम 16 पन्नों की सृजक सृजन समीक्षा पुस्तिका,..
महीने में कम से कम एक लाइव आयोजन,..
साल में 12 सरप्राइज साझा संकलन,..
साल में कम से कम 4 सम्मान समारोह
वो भी प्रकाशन योजना सहित,..!
यानि 
एक रचनाकार के 
कम से कम 4 संकलन तैयार होने का पूरा अवसर!
एक परिवार जैसा माहौल,
मान-सम्मान, स्नेह, मित्रता, सकारात्मकता, रचनात्मकता,
और सबसे महत्वपूर्ण अपने आपको एक पृथक पहचान देना!
पुस्तकों को राष्ट्रीय पुस्तकालय 
और अन्तरा शब्दशक्ति पुस्तकालय में संग्रहित करना
यानि हमारी रचनाओं का सुरक्षित हो जाना,..!
हमारे बाद भी हमारा लिखा कहीं न कहीं तो होगा,
कभी न कभी तो पढ़ा जाएगा,
इतिहास गवाह है,..
टंकित शब्दों ने हमेशा कालचक्र की गवाही दी है,
इस तरह हम बन जाते हैं समय साक्षी,..!
*कुछ तो बात है*
जो अन्तरा शब्दशक्ति को जीवित रखेगा सदा-सदा
साहित्य की अनवरत यात्रा के लिए,..!
साहित्यानुरागी स्वजनों,
बस चलते रहना यूँही मेरे साथ मेरे सहयात्री बनकर,..! 

संस्थापक
डॉ प्रीति समकित सुराना

Friday, 2 April 2021

सृष्टि मेरे आँचल में,..!

हाँ सशक्त हूँ मैं, 
मुझे सक्षम होने दो,
अबला न कहो मुझे, 
बस डर कम होने दो,
मुझमें हुनर है सृजन का 
और सृष्टि मेरे आँचल में,..,
सारे कर्तव्य सिर माथे पर 
लेकिन 
अधिकार भी पुरुषों सम होने दो!

नारी सशक्तिकरण या सक्ष्मीकरण की बात करें तो मैं यहीं आकर रुक जाती हूँ कि हम सब कुछ पुरुषों की तरह ही पाना चाहती हैं तो वो पुरुष होकर जितना संतुष्ट हैं,अगर हम स्त्री होकर उतने संतुष्ट हो जाएं तो हम सशक्त तो पहले ही हैं समर्थ भी हो जाएंगे। 
स्त्री और स्त्रीत्व 

बार-बार 
हमारे स्त्री होने को सत्यापित करके
यूँ भी हमें 
मान लिया गया है
कुछ अलग,... असाधारण,... अनूठा!
और 
कुछ अलग, असाधारण, अनूठा होकर
लीक से हट कर
अपनी पहचान को कायम रखते हुए,..
सृष्टि की निरन्तरता का
सबसे बड़ा दायित्व निभाते हुए
आभार सृष्टि और सृष्टि के रचयिता का
जिसने
हमारे होने को सहजता से स्वीकारते हुए
बिता दी सदियाँ
हमारे होने का उत्सव मनाते हुए,..
सच!
गौरवान्वित हैं
स्त्री भी, स्त्रीत्व को निभाते हुए,..!

लेकिन बात यहाँ केवल मेरी सोच की नहीं है बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की स्तिथि और "जितने मुँह उतनी बातें" को चरितार्थ करते हुए समाज का बहुमुखी स्वरुप की है। इसलिए सबसे पहले ये सोचा जाए कि तन, मन, धन और जन इन चारों परिपेक्ष्य में नारी की स्थिति क्या है?
तन से नाजुक है लेकिन सृष्टि ने सृजन का सबसे बड़ा दायित्व नारी को दिया है।
मन से कोमल है लेकिन इतिहास गवाह है कि बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना करने का साहस दिखाने में नारी ने कभी हिम्मत नहीं हारी।
धन से निर्भर है लेकिन आत्मनिर्भरता की बात आए तो पूरा परिवार नारी के इर्दगिर्द चलता है और अवसर मिले तो चौसठ कलाओं से युक्त नारी सब पर भारी।
जन यानि लोगों की बातों से सबसे ज्यादा प्रभावित नारी होती है लेकिन नारी ही नारी के लिए सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धी है यह भी कटु सत्य है। 

स्त्री तुम सृजक 

माना कि हम महिला दिवस मनाकर खुश होते हैं,... पर सच ये भी है कि समीकरण बदल गए हैं? अकसर लोग हमेशा नारी की महानता के लिए ये सोच रखते आए हैं जो सच भी है,... क्योंकि स्त्री  सृजक  है,...
नारी घर की स्वामिनी, नारी घर की लाज।
नारी ने कल को जना,नारी ने ही आज।।
धीरे-धीरे लोगो की सोच बदली नारी मुक्ति जैसी क्रान्तिकारी सोच और बदलाव ने समाज में कई आमूलचूल परिवर्तन किये,.. कई तरह से सोच और सोच के साथ नारी और पुरुष के समीकरण बदले, नारी के अस्तित्व ने ऋण (-) से बराबर (=) और फिर धन (+) का प्रतिनिधित्व भी किया,..
लेकिन एक पहलू ये भी है कि समीकरण कितने भी बदल जाएं,... मापदंड कितने भी परिवर्तित हो जाएं... समय का चक्र कितना भी आधुनिकता का लिबास ओढ़ ले,... स्त्री और पुरूष चाहे कितना भी शत्रुता, प्रतिद्वंदिता, विरोध और असहिष्णुता का प्रदर्शन करे,... प्राकृतिक नैसर्गिक और शाश्वत सत्य यही है कि ये शत्रु नही एकदूसरे का पर्याय हैं,...।
माना नारी ने जना, सकल जगत का वंश।
पर न भूलो हर वंश में, नर का भी है अंश।।
मैं यह मानती हूँ यदि स्वीकार कर ली जाए एक दूसरे की पूरकता तो संघर्ष का कोई कारण ही नहीं है,.. । क्योंकि स्त्री और पुरुष दिन और रात की तरह एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं तन मन और आत्मा से तो क्या हुआ?  दिन और रात कभी एक दूसरे के बिना कालचक्र को पूरा कर पाए है,,...?  स्त्री और पुरूष रच पाए है कभी अकेले किसी नई संतति को,.....? 
तो फिर ये कोई संघर्ष क्यों? हर बार स्त्री के स्त्रीत्व और पुरूष के पुरूषत्व का माप-तोल क्यों? महत्व का आकलन और अस्तित्व पर प्रश्निन्ह क्यों? क्यूँ हम स्त्री और पुरूष के संकुचित संबोधनो को परे रख कर इंसान और इंसानियत पर मुद्दे नहीं उठाते??
एक और सवाल जो अक्सर मेरे मन में उठता है की हर बार ऐसा ही क्यूँ सोचा जाए,... कि "हर स्त्री के भीतर सीता का अंश होता है,.. और हर पुरुष के भीतर कहीं रावण सोया रहता है,.." कभी कोई क्यूं नहीं सोचता,..कि हर स्त्री में कहीं सूर्पनखा का अंश होता है,... और हर पुरुष के भीतर कहीं राम/लक्ष्मण रहता है ..."
मैं खुद एक नारी होने के नाते खुद से कई बार ये सवाल पूछती हूँ कि कभी अबला और कभी,.. देवी बनकर,.. या फिर पुरूषों को ही दोष देकर सहानुभूति बटोरने या अपनी तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने की जरुरत क्यों है? हम खुद ही अपने लिये कई ऐसे पैमाने और दायरे तय करते हैं, .. जो स्त्री की पुरुषों से तुलना किये जाने को मजबूर करता है जिससे हमें बाहर निकलना चाहिए,..। पुरुष को हमेशा ही शक की नज़र से देखने की बजाय सोच बदलनी चाहिए,.. क्योंकि कोई भी व्यक्ति केवल अच्छा या केवल बुरा नही होता,.. ये बात बिल्कुल सही है। और फिर हर बार हर बात को स्त्री और पुरुष के संदर्भ में वर्गीकृत किया जाए या हर बार स्त्री पृरुष को विमर्श का विषय बनाया जाए जरूरी तो नहीं,..? मैं और आप अपनी सोच के लिए स्वतंत्र हैं,.. पर काश सबको ये सही लगे कि,..
नारी की ही जय न हो, हो नर का भी मान।
जग में जनक जननी का,मान हो एक समान ।।
 
स्त्री विमर्श हो तो एक और महत्वपूर्ण सवाल बार-बार उठता है,.. "क्या वाकई ब्रह्माण्ड को समझना आसान, पर महिला खुद ही एक रहस्य है?"
      कुछ समय पहले ही में हमने एक महान वैज्ञानिक प्रोफेसर स्टीफ़न हाॅकिंग को खो दिया जो कि ब्रह्माण्ड की खोज में लगे हुए थे। स्टीफन हॉकिंग ने ब्लैक होल और बिग बैंग सिद्धांत को समझने में अहम योगदान दिया। उन्होंने दो विवाह किए। उस आधार पर नारी को लेकर उनका एक कथन अखबारों में प्रमुखता से छाया हुआ है कि *ब्रह्माण्ड को समझना आसान, पर महिला खुद ही एक रहस्य है।* कमोबेश इसी तरह की और भी बातें कई लोग अपने हिसाब से कह चुके हैं जो कि उनके अपने व्यक्तिगत अनुभव रहे होंगे। क्या आप को भी लगता है कि स्त्रियों को समझना इतना कठिन है?
     आश्चर्य की बात नहीं कि आज स्त्री वर्ग खुद विमर्श कर रहा है कि हर बार इस तरह की बातों का सामना क्यों करना पड़ता है?
      सबके अपने मत सबकी अपनी सोच होती है तो सोचा आज मैं भी सोचूं इस विषय पर। जितना सोच पाई मैं उसका सार यही निकला कि *स्त्री हमेशा से प्रकृति, संस्कृति, परिस्थिति, नियति, अनुभूति, अभिव्यक्ति जैसी अनेकानेक स्त्रीलिंग वाली बातों से प्रभावित है जिसपर गौर किया जाना चाहिए।*
स्त्री की प्रकृति संवेदनशील है जो हर छोटी से छोटी बात से प्रभावित होती है।
अब तक संस्कृति ने स्त्री को बहुत हद तक प्रतिबंधित रखा। भारतीय संस्कृति की बात करें तो देवी से दानवी तक, अबला से सबला तक, बेचारी से वीरांगना तक अनेकानेक रूपों में वर्गीकृत किया गया है।
रही बात परिस्थिति की तो स्त्री को तन-मन-धन के अनुसार कभी सौंदर्य ने छला, कभी पैसों की जरूरत और लालच ने तो कभी प्रेम और रिश्तों ने।
स्त्री की नियति है कि वह माँ है और मातृत्व के इस गौरव के साथ साथ अनेकानेक दायित्वों का निर्वहन करती हुई भी पुरुष के बिना अपूर्ण है क्योंकि मातृत्व का गौरव बिना पुरुष के संसर्ग के संभव नहीं है।
अनुभूति के लिहाज से स्त्री को एक अनूठी संरचना माना जाता है जो सृष्टि को चलाने में सहायक है।
अभिव्यक्ति के परिदृश्य में शारीरिक संरचना के सौंदर्य और गुणदोष सर्व विदित हैं।
स्त्री को पुरुष समझा या नहीं, स्त्री पुरुष के लिए रहस्य है, बला है, अबला है, प्रेरणा है या जो कुछ भी है,..। 
एक सवाल हमेशा मेरे मन में उठता है कि क्या खुद स्त्री अपनी क्षमताओं और सीमाओं को या अपनी प्रकृति और नियति को समझ पाई है?
आज स्त्री को पुरुष क्या समझता है ये उनके अनुभवों की कहानी उनकी जुबानी हो सकती है पर सोचने का विषय ये है कि क्या एक स्त्री दूसरी स्त्री को समझती है,... ?
स्त्री की स्त्री से प्रतिस्पर्धा, स्त्री का सफलता के लिए स्त्री का हाथ थामने की बजाय पुरुष का सहारा लेने की प्रवृति, स्त्री के अंदर कपट या मायाचार की प्रबलता, स्त्रीत्व और स्त्री सौंदर्य का दुरुपयोग जिसे शास्त्रों में त्रियाचरित्र कहा गया है,.. ये सभी कारक वो कमज़ोर तथ्य है जो स्त्री और पुरुष की तुलना में स्त्री को कमतर आंके जाने का कारण हैं।
विचारणीय प्रश्नों में यह पक्ष निष्पक्ष होकर सोचा जाना चाहिए कि शास्त्रों में क्यों लिखा गया है कि *स्त्री ही स्त्री की प्रथम शत्रु है।* जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण समाज के घर-घर और दर-दर में मिल जाएंगे। कैकेयी, मंदोदरी से आधुनिक स्त्री की व्यथा और कथा ही प्रमाणिकता के लिए पर्याप्त है,...जरूरत केवल खुद में झांकने की है।
रामचरित मानस में रावण के द्वारा मंदोदरी को कहे गए इस कथन पर विचार अनिवार्य है:-
*“नारि सुभाऊ सत्य सब कहहीं।*
*अवगुन आठ सदा उर रहहीं।*
*साहस अनृत चपलता माया।*
*भय अविवेक असौच अदाया।“*
पुरुष ने जो उपमाएं सदा से स्त्री को दी है उसके लिए स्त्री स्वयं जिम्मेदार है। आज जरूरत कौन क्या सोचता है के दायरे से बाहर आकर हम क्या हैं इसे सिद्ध करने की है जो अपनी मानसिकता के दायरे को बढ़ाए बिना या स्त्री-पुरुष विमर्श से बाहर निकल कर *मानवतावादी विमर्श, सहयोग, सम्मान, सामंजस्य से ही संभव है।* 
एक और जरूरी बात जिससे बचना चाहिए कि एक पक्ष में हम ही शास्त्रोक्तियों का उदाहरण देकर दूसरे पक्ष में उसे अमान्य घोषित करते हैं *जैसे शास्त्रकार भी पुरुष ही थे आदि* ,.. आखिर ये कब तक? इसीलिए मैंने स्त्री या पुरुष विरोधी नहीं बल्कि आत्मावलोकन का पक्ष रखा कि जो है वो क्यों है? क्या हम इसका खंडन करने में समर्थ हैं? यदि हाँ! तो सदियों की बेड़ियाँ तोड़ने का साहस वीरों और वीरांगनाओं ने कर दिखाया होता। 
आज आत्मावलोकन के साथ-साथ केवल विमर्श ही नहीं बल्कि कुछ कर दिखाने का युग है और हम सौभाग्यशाली हैं कि आधुनिकीकरण के दौर में जन्में हैं तो आइए इसका सदुपयोग करें। और सच ये भी तो है कि स्त्री को खुद को साबित करने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि स्त्री तो जन्मसिद्ध रचनाकार है,..

*जन्मसिद्ध रचनाकार*

सुनो!!
रचती हूँ मैं
हर परिस्थिति में
रोज कुछ नया,..
रचना 
मेरी नियति ही नही
बल्कि मेरे लिए
प्रकृति का दिया
चमत्कारी उपहार भी है,..
अपने अंश से वंश को रचने की योग्यता
जब नियति ने दी है मुझे
तब अपने भावों को 
शब्दों में रचना भी 
मेरा अधिकार है गुनाह नही,..।
हाँ!
स्त्री रूप में जन्म देकर
स्वयं
सृष्टि के नियंता ने
बना दिया मुझे
जन्मसिद्ध रचनाकार !!!

इतने सारे गुणों के बाद भी अक्सर लोगों को कहते सुना है कि "महिलाएँ कमजोर, बीमार और आश्रित होती हैं।"

*अपनी परिस्थितियों के लिए महिलाएँ खुद कितनी जिम्मेदार?*
                आजकल यह विषय बहुत ज्यादा चर्चा में है और साथ ही जिम्मेदारी पर उठा सवाल भी। सबके अपने विचार सबके अपनी सोच। इसी कड़ी में मैं भी शामिल हूँ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का फायदा उठाते हुए अपना विचार सबके सक्षम रख रही हूँ।
 सबसे पहले बात करते हैं स्वास्थ्य समस्याओं के प्रकार पर। स्वास्थ्य समस्याएँ यानि बीमारियाँ केवल शारीरिक ही नहीं मानसिक भी होती हैं। और मैंने अपने आसपास शारीरिक से ज्यादा मानसिक बीमारियों से जूझते देखा है। 
स्वास्थ्य के प्रकार के बाद बात करें महिलाओं के प्रकार की। जानती हूं मेरी यह बात थोड़ी अजीब लगेगी सबको पर सच ये बात भी बहुत मायने रखती है । अतः महिलाओं को इन श्रेणियों के आधार पर वर्गीकृत किया गया ।
शिक्षित/अशिक्षित
निर्धन/मधमवर्गीय/समृद्ध
गृहणी/ कामकाजी  
किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य पर असर होता है शारीरिक क्षमताओं का मानसिक और आर्थिक स्तर का,.. । पर अभी हम बात कर रहे महिलाओं के स्वास्थ्य की और इसी बात के लिए मैंने परिस्थितियों का अध्य्यन किया जिसमें महिलाओं की सोच, शिक्षा, पारिवारिक माहौल, आर्थिक स्थिति का स्वास्थ्य पर प्रभाव प्रमुख मुद्दा था। उसी आधार पर महिलाओं को बारह श्रेणियों में रखकर शारीरिक और मानसिक रोगों के लिए कौन जिम्मेदार ये जानने की कोशिश की। आइये निष्कर्ष पर एक नज़र डालें। 

1) निर्धन अशिक्षित गृहणी - इस वर्ग की महिलाएं पैसे के आभाव में मानसिक और शारीरिक यातनाएं झेलती हैं और परिवार के भरण पोषण का पहले ध्यान रखने की विवशता में कुपोषण का शिकार होती हैं। नशे  के  सर्वाधिक आदी इस वर्ग की महिलाऐं शारीरिक शोषण से भी मुक्त नहीं हो पाती। जिसकी वजह से शारीरिक और मानसिक बीमारियों से जूझती हैं। 

2) समृद्ध अशिक्षित गृहणी - आर्थिक स्थिति अच्छी होने की वजह से इस वर्ग की महिलाऐं अकसर शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होती हैं किन्तु अशिक्षित होने के कारण आधुनिक परिवेश में सामन्जस्य न बैठा पाने के कारण मानसिक रूप से बीमार रहती हैं जिसके लिए वो खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि चाहे तो उपलब्ध साधनो का सदुपयोग कर प्रौढ़ शिक्षा का हिस्सा बनकर स्वयं को अवसाद जैसी बीमारियों से बचा सकती हैं। घर के कामों के साथ सामाजिक कार्यों का हिस्सा बनकर व्यक्तिव का विकास कर सकती हैं। 

3) मध्यमवर्गीय अशिक्षित गृहणी - मध्यमवर्गीय महिलाएं भी अशिक्षित होने की वजह से मानसिक रूप से कमजोर होती हैं जो शारीरिक व्याधियों को बढ़ावा देता है।ये माहिलाएं भी अपनी स्थिति थोड़े से प्रयासों से सुधार सकती हैं। 

4) निर्धन शिक्षित गृहणी - आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद यह शिक्षित महिला वर्ग स्वछता और स्वास्थ्य का ध्यान रखता है, धन के आभाव की वजह से मानसिक तनाव और परिस्थितिजन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझने के लिए सरकारी सुविधाओं और जानकारी का सदुपयोग कर जीवनस्तर सुधारने में लगा रहता है। 

5) समृद्ध शिक्षित गृहणी - यह वर्ग सभी तरह की समस्याओं से निपटने के लिए सक्षम होता है, जानकारियों का उपयोग सही दिशा में करे तो इस वर्ग की महिलाएं अगर स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न करें तो खुद को स्वस्थ रखने में समर्थ हैं। 

6) मध्यमवर्गीय शिक्षित गृहणी - यह वर्ग भी शिक्षा और समय का सदुपयोग करते हुए जीवन यापन करें तो शारीरिक और मानसिक रोगों से दूर रह सकती हैं। आर्थिक सहायता के लिए आजकल अनेक संस्थाएं कार्यरत हैं जो बीमारियों के इलाज में मदद करती हैं। जरुरत है केवल जागरूक रहने की। 

7) निर्धन अशिक्षित कामकाजी महिला -  ये महिलाऐं अकसर लोगों के घरों में काम करती हैं या मजदूरी करती हैं समय के अभाव में स्वस्थ के प्रति लापरवाह होती हैं, यह वर्ग थकान मिटाने और संगत से प्रभावित होकर सबसे ज्यादा नशे की आदी होती हैं और शारीरिक शोषण का भी शिकार होती हैं। यौन रोगों का संक्रमण उस वर्ग में सबसे ज्यादा पाया गया। 

8) समृद्ध अशिक्षित कामकाजी महिला- यह वर्ग प्रायः सामाजिक कार्यों में ज्यादा संलग्न पाया गया, अकसर देखा गया समाज सेवा के नाम पर अलग अलग समूहों से जुड़ी ये महिलाएं ऐसे क्षेत्रों से जुडी होती हैं जिससे खुद भी जागरूक रहे और जरूरतमंदों को अपनी प्रतिष्ठा के लिए मदद करती रहें पर इनसे बातचीत करते हुए महसूस होता है की इनमे आंतरिक रिक्तता और मानसिक अवसाद मौजूद होता है। सक्षम होते हुए ये खुद के प्रति लापरवाह होकर दिखावे की जिंदगी जीती हैं। इस वर्ग में एल्कोहॉलिक महिलाओं का अनुपात भी अधिक पाया गया। 

9) मध्यमवर्गीय अशिक्षित कामकाजी महिला- ये वर्ग भी छोटे मोटे कार्यों में संलग्न रहते हुए आर्थिक स्थिति सुधारने में प्रयासरत रहते हुए  अवसादग्रस्त पाया गया क्योंकि शिक्षा के आभाव में अकसर गृहद्योगों में संलग्न यह वर्ग मेहनत के अनुरूप फल न मिलने के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार रहता है पर सही दिशानिर्देश से यह वर्ग स्वास्थ्य समस्याओं से बच सकता है। 

10) निर्धन शिक्षित कामकाजी महिला - ये महिलाएं सबसे ज्यादा जागरूक पाई गई स्वास्थ्य के प्रति। वर्तमान में चल रहे महिला सशक्तिकरण और सक्षमीकरण के साथ महिला जागरूकता मुहीम का सबसे बड़ा हिस्सा यही वर्ग है । सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों और सुविधाओं जैसे मुफ्त इलाज और सेनेटरी पैड्स वितरण आदि का सर्वाधिक लाभ उठती हैं और लोगो तक जानकारियों का संचार भी करती हैं। 

11) समृद्ध शिक्षित कामकाजी महिला - यह वर्ग स्टेटस मेन्टेन करने के चक्कर में इस तरह उलझा हुआ है की सबकुछ होते हुए भी अकेलापन और अवसाद का शिकार है । बीमारियों का इलाज करवाने में सक्षम होते हुए भी समयाभाव ने इस वर्ग को मनोरोगी बना दिया है। यदि समय काम और स्वास्थ्य के बीच सामंजस्य बना सके तो यह वर्ग सबसे सुरक्षित रह सकता है। 

12) मध्यमवर्गीय शिक्षित कामकाजी महिला- आर्थिक स्तर सुधारने की मुहीम में जुटा यह वर्ग अतिरिक्त शारीरिक और मानसिक श्रम के कारण अधिकतम समस्याओं का शिकार है। ये अकसर बीमारियों को बढ़ने के बाद इलाज के लिए पहुचती हैं और यही लापरवाही समस्याओं को इतना बढ़ा देती हैं कि न ठीक से इलाज करवा पाती न सह पाती और डिप्रेशन में जीती हैं।
         पूरे विवरण पर नज़र डालने के बाद मुझे तो यही महसूस हुआ की महिलाएं अपने स्वास्थ्य के लिए काफी हद तक खुद जिम्मेदार हैं । शिक्षा एक अति आवश्यक तत्व है । डिग्रीयों से ज्यादा जरुरत व्यवहारिक शिक्षा की है जो आजकल अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा प्रचारित प्रसारित की जा रही है। चिकित्सा संबंधी जानकारियों और सुविधाओं की भी समाज में कोई कमी नहीं है । भागमभाग की जिंदगी में सबसे ज्यादा मायने रखता है समय के साथ सामन्जस्य बैठाते हुए अपना ख्याल खुद रखें । सामाजिक , पारिवारिक और आर्थिक समस्याओं से रुबरु हर कोई होता है पर स्त्री-पुरुष  समानाधिकार की ओर बढ़ते कालचक्र में ये कारक गौण लगते हैं । इसलिए परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है,.. 

*खुद को मजबूत बनाना और हर हाल में खुश रहते हुए सबसे अधिक फैले अवसाद नामक रोग से खुद को बचाना । 
*डाइट फूड के फैशन में न पड़ते हुए पौष्टिक आहार लेना । 
*संस्थाओं द्वारा दी जा रही स्वास्थय संबंधी जानकारियों को गंभीरता से लेते हुए निर्देशों का पालन करना।
*स्वच्छ और संयमित रहते हुए नशे और असुरक्षित यौन संबंधो से दृढ़तापूर्वक दूर रहना।
*सरकारी गैरसरकारी संस्थाओं द्वारा मिल रही स्वास्थ्य सुविधाओं की पर्याप्त जानकारी रखना और जरुरत पर उपयोग करना ।
* आत्मनिर्भरता और व्यवहरिक शिक्षा की अनिवार्यता का महत्त्व समझना।
*** सबसे जरुरी बात सबकुछ जानते समझते हुए खुद को लापरवाही से रोकना । 

महिला हो या पुरुष अपने स्वयं के लिए सजग रहना स्वयं की जिम्मेदारी है (अवांछित परिस्थितियां या अपवाद की बात और है) किंतु शरीर हमारा है, मन हमारा है, जीवन हमारा है तो इसे संभालने का दायित्व भी हमारा ही है । ये विचार पूर्णतः मेरे व्यक्तिगत विचार हैं सब सहमत हो ये अनिवार्य नहीं और जो असहमत हैं उन्हें किसी बात से ठेस पंहुचे या आपत्ति हो तो क्षमाप्रार्थी हूं,.... 
(विशेष:- मेरी नज़र में गृहणी का कार्यक्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है यहाँ कामकाजी महिलाओं से मेरा तात्पर्य गृहकार्यों के अतिरिक्त कोई अन्य कार्यक्षेत्र से है,....) 

एक और निवेदन की स्त्री-पुरुष विमर्श से बहार निकल कर मानव-विमर्श की तरफ बढ़ें,..आज स्त्री पुरुष की तुलना से ज्यादा जरुरत है समाज में "मानव-विमर्श" की,...!
कभी देखा है
बिना बीज के
जमीन से कोपलों को फूटते,
धरती और गगन के
मिलाप के बिना
क्षितिज का नजारा,
धूप और बारिश के
संगम के बिना
सतरंगी इंद्रधनुष,
रात और सुबह की
संधि के बिना
प्रभात की किरण,
दिन और रात के
संसर्ग के बिना
सुहानी साझ,
लहरों का चांद से
आकर्षित हुए बिना
ज्वार भाटे का उठना,
स्त्री और पुरूष के
समागम के बिना
नई संतति को जन्म लेते,

कभी सुना है 
यह विमर्श कि
जमीन और बीज में,
महान कौन?
धरती और आकाश में 
क्षेष्ठ कौन?
धूप या बारिश में
जरूरी कौन?
रात और दिन में
उपयोगी कौन?
लहरों और चांदनी में 
सुंदर कौन?

फिर
स्त्री और पुरूष
की तुलना क्यों?
क्यों होते हैं 
ये स्त्री विमर्श?
ये पुरूष विमर्श?

जब लहरें,चांदनी ज्वार-भाटा,
धरती,आकाश,क्षितिज कोपलें,
रात दिन प्रभात और संध्या 
धूप बारिश और इंद्रधनुष
सब कुछ प्रकृति की अद्भूत कृतियां हैं
सबका अपना अस्तित्व है
महत्व है 
उपयोगिता है

तो स्त्री और पुरूष
जो नवजीवन के सृजनकर्ता है
इन अनुपम कृतियों के साथ
यह भेदभाव क्यों
अन्याय क्यों
हम मानव होकर मानवीयता से परे क्यों हैं
कब करेंगे हम
स्त्री विमर्श पुरूष विमर्श भूलकर
"मानव विमर्श".......!

संस्थापक
अन्तरा-शब्दशक्ति संस्था एवं प्रकाशन
डॉ. प्रीति सुराना

*कोयले की दलाली में हाथ काले*

'दलाली' एक शुद्ध व्यापार है जिसमें आपको जो काम खुद करने का समय न हो उसे किसी के माध्यम से करवाया जाता है जिसके बदले एक तय राशि या अंश उसे दिया जाता है जिसे एजेंट या बिचौलिया या दलाल कहते हैं।
सच है *कोयले की दलाली में हाथ काले होते हैं* यानि बुरे कामों का माध्यम बनोगे तो बदनामी के दाग मिलेंगे ही। पर कभी इस पहलू से सोचा आपने कि दलालों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?
मंदिर में भगवान से मिलने गए तो जल्दबाजी में पुजारी को दलाल बना लिया। किसी सरकारी काम में अड़चनें आई तो रिश्वत दे दी, जब भी अटका हुआ काम निकालना हो तो बिचौलियों का सहारा ले लिया। कोयले खदान से बिना छुए नहीं निकाले जा सकते, कितने ही ग्लोब्स पहन लो दाग लग ही जाते हैं, पर मायने ये रखता है कि कोयले निकाले किस उद्देश्य से? चोरी की, स्मगलिंग की या बिना मालिकाना अधिकार के बेच दिया, या मजदूरों को काम दिया, किसी भूखे को रोटी के लिये चूल्हा जलवाया, या खूबसूरत गहनों के लिए हीरे की तलाश की।
जिस तरह गंदगी मिटाने के लिए सफाई खुद न करनी हो तो मशीनों या मजदूरों की जरुरत होती है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि मजदूर गंदा हो गया, रोटी बनाने के लिए पहले आटे को गूँधना पड़ता है, दीवारों को रंगने के लिए भी रंगों को छूना पड़ता है, फूलों का व्यापार करने के लिए खुशबू के साथ कांटो की चुभन भी मिलती है, पर उद्देश्य अच्छा होने के कारण इनसे जुड़ी कहावतें नहीं बनी।
यकीनन कोयला छुआ है तो हाथ काले होंगे ही, पर याद रखना चाहिए कि कोयले को बुराई का सांकेतिक शब्द बनाकर एक मुहावरा गढ़ा गया है। वास्तव में अर्थ ये है कि *स्वार्थवश बुरे काम का साथ देने वाला व्यक्ति भी बुराई से प्रभावित होगा ही ये अटल सत्य है।* ये मेरी व्यक्तिगत सोच है जरुरी नहीं है कि सभी सहमत हों क्योंकि सभी के विचार तन-मन-धन और जन से प्रभावित होते हैं पर यह पक्ष भी विचारणीय है इसलिए सोचिएगा जरुर कि हम किसी को कोयले की दलाली के लिए विवश तो नहीं कर रहे हैं और हाँ तो उद्देश्य सकारात्मक है या नकारात्मक?
इसका जवाब हम सब के घरों, कार्यक्षेत्र, समाज और देश से संबंधित कार्यों का अवलोकन करने पर स्वतः ही मिल जाएगा, क्योंकि कहीं न कहीं किसी न किसी कोयले की दलाली के जिम्मेदार हम भी हैं और उत्तरदायी ठहराते हैं सिस्टम को, वो सिस्टम जो हम सब से ही मिलकर बना है। जब चिंतन होगा तो चिंता जरूर होगी कि कोयले की दलाली में हाथ काले होते हैं।*

मैंने पूछा
जब जानते हो कि
*कोयले की दलाली में हाथ काले होते हैं*
तो इत्र क्यों नहीं बेचते,
उसने कहा
लोग सीधे-सीधे काम करते होते
तो दलालों की जरुरत क्या थी?
यदि मैंने हाथ काले न किये होते
तो कई गरीबों के घरों में चूल्हे नहीं जलते
और न अनगिनत अमीरों को हीरे नसीब होते,..!
रहा सवाल इत्र का तो दलाली अच्छी हो
तो मित्र बन ही जाते हैं
और जहाँ मित्र वहाँ इत्र ही इत्र!

*डॉ प्रीति समकित सुराना*

Tuesday, 30 March 2021

अचानक याद आया

अचानक याद आया
उस होली का वो पल
जिसमें
मैं पानी सी तरल हुई
तुम रंग से घुले मुझमें
कुछ इस तरह
कि मेरी रंगत बदल दी तुमने
फिर
कभी कोई
अलग न कर सका हमें
जैसे हों
जिस्म मैं रुह तुम
दिल मैं धड़कन तुम
जिंदगी मैं सांसें तुम
तुम मैं और मैं तुम
पानी में घुले रंग से,...!

डॉ प्रीति समकित सुराना

*मेरा प्यारा परिवार और होली का उपहार*

*मेरा प्यारा परिवार और होली का उपहार*

💚🧡🖤❤️🤍🤎


आज मनाई मिलकर होली

अन्तरा के आंगन में,

*कीर्ति 'छबीली'* फिरती रही

दिन भर पूरे प्रांगण में!

*पिंकी 'स्वीटी दीदी'* ने

खूब बनाए नाम सभी के,

खुश होकर की बातें की बहुत

*आशु 'अन्तरा की छुटकी'* ने!

*दिनेश देहाती* बहुत *'अनुभवी'*

*संदीप सोनी* बड़े *'मेहनती संपादक'*

*टीना सोनी* संदीप की *'सुषमा'*,

*सरफ़राज़ 'सूरमा'* *रंजना जी 'धर्मानुरागी'*!

*पंकज* चमके *'जुगनू'* जैसा,

*किशोर* साहित्य का है *'सागर'*,

*ललिता जी* बड़ी *'सलोनी'* *अलका* है *'अनमोल'*

*कृति* एक *'अदृश्य शक्ति'* *बबिता जी* स्नेह की *'गागर'*!

*लीना 'तितली'* सी उड़ती फिरे

*अदिति 'मस्तानी'* अपनी मस्ती में,

*प्रमिला 'चुलबुली'* *मीनू 'प्यारी लड़की'* 

*भारती दी 'छत्रछाया'* है इस बस्ती में!

*ब्रजेश जी* का क्या कहें?

इनकी *चलती का नाम गाड़ी* है,

*समकित 'नींव का पत्थर'* हैं

और *पूजा* इनकी *'सुनहरी'* साली है!

*प्रेम जी 'पाॅज़िटिव वाइब्रेशन'* लाती,

*राधा जी 'जोशीली'* जोश भर जाती,

*देवयानी जी एक 'सशक्त महिला'*

*पूनम* (करतियार) *'सौंधी खुशबू'* लाती!

*ओमप्रकाश जी- 'गणितज्ञ'* हैं,

*रविन्द्र जी* है *'गज़ल सम्राट'*

*आनन्द जी 'केवल आनन्द'* हैं

*शीतल जी* हैं यहाँ के *'युवराज'*!

*सोनम* है प्यारी *यंग एचीवर*

*पूनम झा* है *'परफेक्ट कथाकार'*

*नमिता जी* हैं एक *'सुपर वुमन'*

*जयकृष्ण जी 'अन्तरा के राजकुमार'*!

*रमा जी 'प्रकृति प्रेमी'* हैं

*नीरजा मेहता जी* है *'कमलिनी'*

*कैलाश जी* अडिग *'अन्तरा के पर्वत'*

*प्रदीप जी* हैं *'काव्य शिरोमणि'*

*हेमन्त जी 'अन्तरा के रत्न'* हैं,

है *नवनीता नुपुर 'उभरती गायिका'*,

*विक्रमादित्य जी* हैं *'पूर्व के प्रहरी'*

*साधना जी*- प्रभु की *'आराध्या'*!

*सत्यप्रसन्न जी* बड़े *'परफेक्शनिस्ट'* हैं

*मीनाक्षी सुकुमारन* है एक *'सेलीब्रिटी'*

*मनोरमा जी* तो *'ईद का चाँद'* हैं

*किरण विचपुरिया* है प्रेम की *'माधुरी'*!

*अमित जी* चलाते *लिटरेचर प्लस टूरिज्म*

*निकिता* इज न्यू एंड *'गुड गोइंग'*,

*स्वाति* का नंबर है *'3041'*

वो करती है बहुत कुछ डिजाइनिंग!

*तोषी* है *'महक'*, *रेनू जी 'जोगन'*

*अनुजा है *'मीठी-मीठी'*, *प्रेमलता* हैं *'मकरन्द'*

*मधु तिवारी* हैं *'सुप्रभात'* संदेश,

*अजय पांडेजी* अनोखा *'संस्मरण'*!

*नवीन जी  'बरगद का पेड़'*

*संगीता जी 'काव्य मंजरी'*

*मुकेश मनमौजी 'मौजी बाबा'*

*तेजकरण जी* बड़े *'ओजस्वी'*!

*संतोष जी 'सौम्या'*, *सीता जी 'कोकिला'*

और *हेमलता* जी है *'मनस्विनी'*

*वाणी* है यहाँ की *'राजकुमारी'*

*नवनीता कटकवार* है *'कुमुदिनी'*!

*मधु माधुरी 'अपराजिता'*

*'मंजू जी* बनी *'दादी रूपमती*

*स्मृति* के मुख *'प्यारी मुस्कान'*

*ऋतु 'चंचला'* *मीना 'मंजूषा'*

*वंदना* तो है *'कुन्दन'*!

*शिखा बोर्डिया* है *'उभरती नायिका*' 

*करण जैन* एक *'साहसी युवा'* 

*बीना दी 'तरन्नुम'* सी सुखदा,

*किरण मोर* जी मानो हो *'वसुधा'*!

*मोनिका रुसिया जी 'नायाब हीरा'*

*कुशल जैन* है कलम का *'योद्धा'*

*अंजू भूटानी जी* अनुशासन में *'पारंगत'*

*भारती शर्मा* की *'बुलंद आवाज़'*!

*भावना जी 'सहृदयी'*, *कंचन जी 'ग़ज़ल'*

सुशोभित है *अन्तरा शब्दशक्ति* पटल,

*प्रीति* को *'परी'* बनाया जिसने

उस परिवार को नित्य करती हूँ नमन!


*डॉ प्रीति समकित सुराना*