Friday, 15 February 2019

पीड़ा तो मेरी सखी है पुरानी

पीड़ा तो मेरी सखी है पुरानी
खुशियों ने की है सदा बेईमानी

मुझपर जो बीता है
भीतर जो रीता है
किसको दिखाऊँ
कैसे बताऊँ
काफी नहीं है, बताऊँ जुबानी,
खुशियों ने की है सदा बेईमानी
पीड़ा तो मेरी सखी है पुरानी

मन है ये प्यासा
चहुँ दिश निराशा
सूखा पड़ा है
खाली घड़ा है
बचा है जरा सा, बस आँखों में पानी,
खुशियों ने की है सदा बेईमानी
पीड़ा तो मेरी सखी है पुरानी

तेरे बिन अधूरा
जीवन है मेरा
न करना बहाना
बस लौट आना
सच है यही, ये न कोई कहानी,
खुशियों ने की है सदा बेईमानी
पीड़ा तो मेरी सखी है पुरानी,..!

बदल दे इरादे
बाकी है वादे
न ही खुद को सता
न दे मुझको सजा
अब आ भी जा, बीते जिंदगानी,
खुशियों ने की है सदा बेईमानी
पीड़ा तो मेरी सखी है पुरानी,..!

प्रीति सुराना

Thursday, 14 February 2019

तुम्हारे बगैर

जब तक तुम मेरे साथ-साथ चलोगे
नहीं छोड़ेंगे चलना मेरे कमजोर पैर,
लड़खड़ाते कदम हौसला नहीं छोड़ेंगे
जब तक जीना न पड़े तुम्हारे बगैर!

प्रीति सुराना

रुख

मौन का तोड़ नहीं है पर ये तोड़ देता है,
घुट-घुट कर जिंदगी का रुख मोड़ देता है।

प्रीति सुराना

सीमा

अब न डर है न दर्द,
देने वाले ने अपनी हर सीमा तोड़ दी,
मैंने भी आज हालात से
हार जाने की फितरत छोड़ दी!

प्रीति सुराना

मौन

कह लिया, सह लिया,
सुन लिया, गुन लिया,
अंततः बस यही हुआ
मौन मैंने चुन लिया,..!

प्रीति सुराना

Tuesday, 12 February 2019

सूखे पत्ते की मानिंद

सूखे पत्ते की मानिंद

पेड़ से टूटा सूखा पीला पड़ा पत्ता,..

वही
जिस पर लोग तरस खाते हैं
और कहते हैं
बेचारा
साख से टूटकर अस्तित्व खो बैठा,..

पर
क्या कभी, किसी ने
पूछा उस पत्ते से
कि वास्तव में
वो खुद क्या महसूस कर रहा है टूटकर,..

मैंने महसूस किया
जी ली उसने पूरी उम्र
अपनी शाखाओं को हराभरा रखने के लिये
धूप, बारिश, ठंड और पतझड़ में भी
अपने वजूद को समर्पित करके,...

हर हाल में परस्थितियों से जूझते हुए
काट लिया पूरा जीवन
आज पहली बार
वो शाख से लटके हवा में हिलने की बजाय
उड़ सकता है हवा के साथ, हवा की दिशा में,..

और
जब तक भी जीवन शेष है
खुली हवा में मुक्त जीवन जीकर
अंत में भी जब मिट्टी में मिले
तो खाद बनकर किसी नई संभावना को
जन्म देने का निमित्त बनकर जीवन सार्थक कर लेगा,....!

हाँ! सचमुच मैं हो जाना चाहती हूँ
पेड़ से टूटे सूखे पीले पड़े पत्ते की मानिंद,..!!!

प्रीति सुराना

Monday, 11 February 2019

अद्भुत पल(ताजा संस्मरण 11/2/19)

अद्भुत पल(ताजा संस्मरण 11/2/19)

कुँवर बेचैन ने कहा मेरे गीतों में प्रीति भी है और अन्तरा भी :)

           कभी-कभी जीवन में बिना किसी पूर्व सूचना के भी कुछ यादगार और खूबसूरत पल झोली में आ जाते हैं।
         हुआ यूँ कि आज बालाघाट में होने जा रहे कवि सम्मेलन में आ. Dr. Kunwar Bechain जी सहित कवि वृन्द का आना तय था। 1:30 बजे Golu भैय्या का फ़ोन दुकान के किसी काम से आया। आवाज़ ठीक से नहीं आ रही थी तो मैंने पूछा आप हो कहाँ, तो पता चला कि वो नागपुर से लौट रहे हैं और साथ में कवि कुंवर बेचैन, कमल मनोहर और कवयित्री अंकिता सिंह भी हैं और उनको लेकर घर आ रहे हैं। मुझे लगा आदतानुसार मजाक कर रहे होंगे। फिर भी 2:45 को मैंने फोन लगाकर पूछा सच में आ रहे हो न?
        और 15 मिनट बाद गाड़ी घर के सामने, और मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। 5 मिनट कब 50 मिनट में बदले पता ही न चला। बच्चों (tanmay Jayti Jainam) ने माला और शाल से तीनो का स्वागत किया, मैंने अपनी किताबें सुनो,..बात मान की, दृष्टिकोण, कतरा-कतरा मेरा मन, और अन्तरा शब्दशक्ति(एक परिचय) सभी को भेंट की। जयति द्वारा बनाए गए स्केच अभी प्रकाशित Rajendra Shrivastava (गिलहरी) एवं DrChetna Upadhyay (बालकों की अदालत) बाल कविता संग्रह भी जयति ने सभी को भेंट दिए। स्वल्पाहार के साथ मेरे pet परिवार सिनी, टफी, टूटू और ट्वीटी के साथ मुलाकात फोटोग्राफी और खूब सारी साहित्यिक बातें हुई। समकित की अनुपस्थिति को भी सभी ने मिस किया और कुंवर बेचैन जी ने अप्रत्यक्ष आशीर्वाद दिया।
         बहुत खुशी हुई जब आ. Dr Kunwar Bechain जी ने आशीर्वाद देते हुए मुझे कहा कि साहित्य की ऐसी सेवा और महिलाओं और नवोदितों के लिए नए मंच से हो रहा यह प्रयास सचमुच सार्थक सोच और कदम है, हमेशा यूँ ही आगे बढ़ते रहो। कमल मनोहर जी ने भी बच्चों को विशेष स्नेह देते हुए साहित्य के इस नए रूप और प्रयासों की अनुमोदन प्रशंसा और हास्य में घुले मधुर संवादों से आशीष दिया। प्यारी सी मुस्कुराती हुई अंकिता ने भी fb पर जुड़ने और बात करने का वादा किया। कुँवर सर ने कहा वैसे बहुत थके हुए थे पर यहाँ रुकना सार्थक रहा, नींद भाग गई। कमल मनोहर जी ने कहा कि न रुकते तो इतने अच्छे पड़ाव से अनभिज्ञ रह जाते।
         कुल मिलाकर बहुत खूबसूरत पल फिर आने, फिर मिलने के वादों के साथ सभी ने विदा ली, स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण मेरा कवि सम्मेलन में जाना संभव नहीं था अतः मैंने भी क्षमा मांगी।
        एक स्वप्न कुँवर बेचैन जी से रूबरू मिलने का पूरा हुआ, वो भी इस तरह घर पर जो कभी सोचा ही नहीं था।
        सारा क्रेडिट गोलू भैय्या को क्योंकि उनकी वजह से ही ये संभव हो पाया। बच्चों का भी थैंक्स फ़ोटो के लिए जिससे ये पल हमेशा के लिए कैद हो गए जिंदगी के पन्नों पर।

प्रीति सुराना

Sunday, 10 February 2019

आरोपी

आरोपी

          समीर मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि हर बार हमारे झगड़े की वजह मेरी ही किसी बात को बताना और फिर हर परिस्थिति का जिम्मेदार मुझे बता कर पूरी तरह आरोपी की तरह कटघरे में रखना ये समाधान कतई नहीं हो सकता, कभी तो जहाँ मैं हूँ वहां आकर समझने की कोशिश की होती कि मेरी सोच, मेरी भावनाएँ, मेरी नीयत क्या थी?
       देखो प्रियंका तुम फिर यही साबित करने की जिद कर रही हो कि तुम सही हो और मैं तुम्हे यही समझना चाहता हूँ कि,...
       बस! यही मैं नहीं चाहती कि हर बार तुम्हारी बात यहीं से शुरू हो कि मैं समझाना चाहता हूँ क्योंकि मुझे भी ये लगता है कभी-कभी तुम्हे भी समझने की जरूरत है चाहे तुम कितने भी समझदार क्यों न हो हर बार सामने वाला नासमझ हो जरूरी नहीं है। कभी ये भी सोचा जाना जरूरी है कि परिस्थितियाँ क्या थी?
        ओके! तुम जब समझना ही नहीं चाहती तो मैं भी इतना फुरसत में नहीं हूँ कि तुम्हे समझाने में वक्त बरबाद करूँ। रहो अपनी ही सोच के साथ कि तुम सही हो।
        ओके! मैं बार-बार गलत होने के आरोप के साथ रहने की बजाय ये सोच कर रह लूँगी कि मैं नासमझ हूँ और समझदार सिर्फ तुम हो जिसने कभी कोई गलती की ही नहीं। तुम्हे बहुत मिलेंगे जिन्हें समझाओ कि उनकी गलतियाँ क्या-क्या है। तुम्हारे साथ, तुम्हारे लिए और तुम्हारे बाद भी जीने वाले कितने ही रिश्ते होंगे पर आज तुमने आरोपी घोषित करते हुए तुमने वो रिश्ता खो दिया जो तुम्हारे लिए जान दे सकता था।
         दोनों ही तरफ से फोन का डिसकनेक्ट होना और एक खूबसूरत रिश्ते का पटाक्षेप। दोनों ही जानते हैं कि जिंदगी में ये सारे अहसास और विश्वास किस्मत से मिलते हैं। अहम की लड़ाई में प्रेम हार गया और अब दोनों ओर सिर्फ आरोपी खड़े हैं रिश्तों के न्यायालय में किस्मत के फैसले के इंतज़ार में।

प्रीति सुराना

मिट्टी का पुतला

मैं तो वैसे ही मिली तुमसे,
मैं जैसी हूँ,
तुमने कभी जिक्र भी न किया
कि तरशोगे मुझे,
ये भी आज ही जाना
तुमने पहचाना ही नहीं मुझे,..

मिट्टी का पुतला हूँ,
विधाता का बनाया हुआ,
गढ़ सकते थे आसानी से
किसी भी सांचे में,
पत्थर समझकर
चोट पहुँचाने की जरूरत ही न होती,..!

प्रीति सुराना

पति परमेश्वर

पति परमेश्वर

         शाम के लगभग 5 बजे थे। कालोनी के सामने बने पार्क में इस वक्त काफी लोगों का आना जाना रहता है।
         शीला पार्लर से लौट रही थी, आदतानुसार माधुरी ने आवाज़ लगाई 'कहाँ से आ रही हो शीला, बड़ी जच रही हो क्या बात है?
         शीला ने कहा अरे यूँ ही जरा पार्लर हो आई आज वैलेंटाइन डे है न तो डिनर पर जाना है।
        ओहो! गज़ब की बात है, कौन है तुम्हारा प्रेमी? करवाचौथ का व्रत तो तुम करती नहीं जो पति से प्रेम करो?
        अचानक ये सुनकर शीला अचकचाई और दूसरे ही पल गुस्से में बोल पड़ी 'मेरा पति परमेश्वर नहीं बल्कि पति ही है, सुख-दुख का साथी, दोस्त और प्रेमी सबकुछ।' जिस पति को परमेश्वर मानकर आप पूजती हैं उसी पति के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करती हैं ??
         'जिनके पति परममेश्वर होते हैं उन्हें शायद किसी और वैलेंटाइन या प्रेमी का अर्थ कुछ और हो।' ये कहती हुई शीला वहाँ से बिना रुके आगे निकल गई और माधुरी की सोच पर अब भी आवक थी।
        माधुरी के मन में एक ही पल में हज़ारों सवाल छोड़ आई शीला।

प्रीति सुराना

Saturday, 9 February 2019

कड़वा सच

आज मान लिया
दर्द बहुत ही निजी भाव है
दिल में दर्द है
तो ध्यान रहे
दिमाग तक भी बात न पहुँचे,

आज का समय
इस बात को सरासर गलत ठहराता है
कि बाँटने से दर्द कम होता है,
सच में बहुत-बहुत दुखता है
जिसे भी बताओ वही नमक डाल जाता है,

आज का कड़वा सच सिर्फ ये है
आपको दर्द है
तो दर्द निवारक औषधियों से परहेज करें
ये लीवर,किडनी ही नहीं
जिंदगी को भी नए दर्द दे सकती है।

एक कड़वा सच
बहुत पहले ही कह दिया था
किसी शायर ने,...
अपने आँसू खुद ही पोंछ लिया
कोई और पोंछेगा तो कीमत लेगा,..!

प्रीति सुराना

Friday, 8 February 2019

सहेजने की आदत डालें

परिवर्तन संसार का नियम है। जो आज है वो कल हो जरूरी नहीं। दिन का रात में बदलना रात का फिर दिन हो जाना इससे बड़ा कोई और उदाहरण किसी भी जीवित व्यक्ति के लिए नहीं हो सकता। कल और कल के लिए आज का होना अनिवार्य है। जो कुछ भी अभी घटित हो रहा वही पल पल बीता हुआ कल बनेगा और जो आने वाला पल है वही भविष्य है और चाहे बीता हुआ हो या आने वाला कल उसके लिए जरूरी है आज का होना ठीक एक परिकल्पना को सच करने के लिये आवश्यक सामग्री की तरह। ये बात और है को परिकल्पना के साकार होते ही वह एक खोज, एक याद, एक अतीत की उपलब्धि बनकर रह जाएगा। खैर,..!
समय ये सोचने का है कि आज और अभी के अलावा सब कुछ परिवर्तनशील है तो आज और अभी को सार्थक कैसे बनाया जाए। कैसे जीये कि जीवन में मलाल न राह जाए। परिवर्तन का समय कोई नियत काल नहीं है बल्कि पल प्रतिपल है। अभी अभी ही साल बदला है, अभी अभी ही बसंत की आहट आई है। माघ में ही फागुनी बयार की दूर से आती सनसनाहट सुनाई देने लगी है। फाग रंगों की बहार लेकर आएगा , बासंती मधुमास जीवन मे उम्मीदों के रंग भरकर इठलाता हुआ गुजर जाएगा। सोचना ये है गुजरते हुए हर पल को यादगार, आदर्श और अमिट बनाने के लिए क्या किया जाए। क्यों न सहेजने की एक बहुत खूबसूरत आदत डाल ली जाए। आज जो भी घट रहा है पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, मानसिक और शारीरिक स्तर पर हर पल जो परिवर्तित हो रहा है उसे कुछ इस तरह लिख लिया जाए कि जो बदला वो क्या था और जो बदलाव हमारी ओर से अपेक्षित था वो क्या था? क्या जो अपेक्षित था वो सही और उसके लिए किए गए प्रयास पर्याप्त थे, या जो हुआ वो सटीक था, नहीं था तो क्यों नहीं।
यकीन मानिए, दस में से एक ने भी सिर्फ दैनिक जीवन के अनुभवों को डायरी पर लिख दिया तो उनका यह कार्य आने वाले कालखंड में मार्गदर्शक दस्तावेज बन जाएगा जो कि ये बताएगा कि अपेक्षा उपेक्षित सिर्फ और सिर्फ समर्पित हो कर किये गए प्रयासों या समर्पण में कमी के कारण होती रही है। फिर बात सपनो की हो या अपनो की, देश या समाज की हो या कल और आज की।
बस एक सोच है ये की सहेजा जाए जीवन से जुड़ी हर अच्छी बुरी घटना, सही गलत की बातों और हालातों को। कल हमारे बाद जब यादों की संदूक खोली जाए, तो धुंधली तस्वीरों और पीले पड़े कागजों में बिखरा पड़ा हो वो हर पल जो सचमुच बदला जा सकता था, शायद बीच का एक भी पल बदल दिया जाता तो सब कुछ, कुछ और होता।
इन्हीं संभावनाओं का नाम जीवन है किंतु उससे भी बड़ा एक सच ये भी है कि परिवर्तन संसार का नियम है पर दिन का रात में और रात का दिन में बदलने का क्रम और काल निश्चित है और जब भी उलझेंगे इन रहस्यों में अंतिम जवाब होगा ये तो नियति का खेल है, और हम आप फिर तलाशने लगेंगे आज और अभी को छोड़कर आने वाला कल, क्रम चलता रहेगा, विचारों का आरोह और अवरोह भी सतत याद दिलाता रहेगा कि परिवर्तन संसार का नियम है और जो न समझ पाएं वो रहस्य नियति,.. अतः चलते रहें जब तक संभव है, और हो सके तो सहेजने की आदत डालें चाहे तस्वीरों में चाहे डायरी के पन्नो पर या सोशल साइट्स पर,...😊👍

प्रीति सुराना