Sunday, 20 May 2018

बेअसर

सुनो!

मेरे
जीने की
एकमात्र
वजह
हो

'सिर्फ तुम'

सौ दर्द
हज़ार मुसीबतें
लाख ठोकरें
तमाम टूटी ख्वाहिशें
अनगिनत आँसू

सब बेअसर

जब किसी पल
अचानक तुम
हर शिकवा भुलाकर
गले से लगाकर
सिर्फ इतना कह दो

मैं हूँ न!

प्रीति सुराना

Friday, 18 May 2018

मुक्ति

सुनो!
मुक्ति चाहती हूँ
हर दर्द से
बस इतना ही सोचा था
और
अचानक आकर
तुमने मुझे
सीने से लगा लिया।
बस एक ख़याल
और
कितना सुखद
ये पल
और
मेरे तुम,... प्रीति सुराना

वास्ते

इतनी नजदीकियां भी न बढ़ाइए
कि दूरियों को दर्द हो,...
सिर्फ नजदिकियों से रखोगे वास्ते
तो फिर दर्द जाएंगे किस रास्ते???

प्रीति सुराना

Thursday, 17 May 2018

कहन

वेदना, व्यथा, पीड़ा और दर्द
है सभी रिश्तेदार और भाई बहन।
दास्ताँ, अफ़साने, किस्से-कहानी
निकलते हैं एकदूजे का चोला पहन
क्या कहना, सुनना या समझाना
सब महसूस करने की बातें हैं
सिर्फ जुदा है कहीं भाषा-शिल्प
या कहीं विधा,शैली और कहन,.... प्रीति सुराना

Wednesday, 16 May 2018

शोर

हर वो ख्वाब
जिसने किया शोर
तोड़ दिया
हर बार
ज़माने ने,..
और तब से
आहिस्ता-आहिस्ता
मैंने डाल ली आदत
ख्वाबों को जीने की खामोशी से
जब तक वो पूरे न हो जाएं,..
अब
मेरे ख्वाबों, मेरी ख्वाहिशों
और मेरे मंजिल की ओर
बढ़ते कदमों की आवाज़
सिर्फ दिल की धड़कनों तक
पहुंचती है,..
सुनो!
देना साथ और करना दुआ
मेरे अपनों की खुशी से जुड़ा
कोई ख्वाब
कोई विश्वास न टूटे,...
मेरे हमराज़,
मेरे हमसफर,
मेरे तुम,..
सिर्फ तुम ही तो रहते हो
मेरे दिल में,...प्रीति सुराना

Sunday, 6 May 2018

संभालना खुद को मेरे बाद,..

सुनो!
जानती हूँ
नहीं होगा तुम्हे असर
भेड़िया आया की कहानी की तरह
यदि मैं कह दूं कि मुझे कुछ हो जाएगा
आज नासाज़ सी है तबीयत मेरी,..
और सच कहूँ
मैं चाहती भी यही हूँ
न हो तुम्हे कोई असर,...

हाँ!
तुम्हारी तकलीफ का अंदाज़ा
तुमसे कहीं ज्यादा है मुझे,..
क्योंकि
इन दिनों हो रहे
हादसों ने सिखाया
हम अपनों को खोकर
जीते हैं
डर-डर कर,...

क्योंकि
हादसों का असर
जाने वाले को नहीं होता
बल्कि होता सिर्फ
पीछे छूट रहे अपनों पर,...
मेरा अपनी तबीयत को लेकर
तुमसे बार-बार कहना
तैयार रखेगा मानसिक तौर पर
तुम्हें मेरे बाद संभलने के लिए,..

सच
मैं नहीं चाहती गुजर जाना
एक हादसे की तरह
क्योंकि नहीं चाहती
तुम्हें छोड़ना
डर और सदमे के साथ अकेला,
चाहती हूँ सिर्फ इतना
कि समझो जाना तय होता है,..

बस
अचानक जाना
अधूरी तैयारी के कारण
देता है सफर में
तकलीफें
पहले से पता हो
तो सफर होता है आसान
जाने वाले का भी
और छूट रहे अपनों का भी,...

मैं
इन दिनों
रोज सड़कों पर हो रहे
हादसों में से नहीं हूं
तुम समझना मुझे
मेरी बातों को
और
संभालना
खुद को मेरे बाद,..

प्रीति सुराना

Thursday, 3 May 2018

पहली चोरी (संस्मरण)

*पहली चोरी*

कक्षा kg2 सन 1980 की बात है। स्लेट के साथ कलम की जोड़ी से मेरी थोड़ी ज्यादा ही दुश्मनी थी,...     
           नानी के घर रहकर मेरी पढ़ाई हुई है। लिहाजा नानी जिन्हें में माँ कहती थी उन्होंने ही पालन-पोषण किया।
     कलम खाने की बुरी लत थी। रोज माँ एक कलम देती थी और दूसरे दिन गायब। घर मे पूरा डिब्बा होता था। माँ की समझ मे नहीं आता था रोज कलम खत्म कैसे हो जाती थी।
दरअसल मैम जितनी देर स्कूल में लिखवाती उतनी देर में थोड़ी थोड़ी करके मैं पूरी कलम खा जाती थी।
थोड़े समय बाद रोज होमवर्क मिलने लगा, आगे a to z और पीछे A to Z  या अ से अः और 1 से 20 तक लिखकर ले जाना था। क्योंकि तब हमें सुलेख स्लेट में लिखवाया जाता था। कलम थी नहीं, माँ से रो रोकर कलम ली। और लिखते समय माँ ने कलम खाते देख लिया सजा ये कि अगले दिन स्कूल ले जाने के लिए कलम नहीं मिलेगी।
स्कूल में पेंसिल कम कलम ज्यादा चलती थी क्योंकि रड़के मैम जो प्राइमरी की प्राचार्या थीं वो स्लेट का उपयोग ज्यादा करवाती थी। पर कलम न होने से उन्होंने अगले 2 दिन डाँट और कलम लाने के आदेश के साथ कॉपी में क्लास वर्क करवाया।
शाम को घर जाकर में खूब रोई पर माँ बोली जब तक कलम नहीं खाने की कसम नही खाऊँगी कलम नहीं मिलेगी। जिद्दी तो थी ही मैंने वादा नहीं किया रोते-रोते सो गई पर रात को नींद खुल गई। माँ जहां कलम रखती थी वहाँ से चुपचाप दो कलम मैंने निकाल ली और एक कलम खा ली और दूसरी पेटी में (अल्युमिनियम की पेटी जो स्कूल ले कर जाती थी उसमें) छुपा ली।
अगले दिन लौटी तो माँ ने पूछा होमवर्क नहीं किया तो डाँट नही पड़ी। मैंने कहा पूजा की कलम से मैंने जल्दी-जल्दी लिख लिया (शुरू से लिखने में आलसी मगर फ़ास्ट राइटर थी) और उसकी छोटी सी कलम (जो खाने के बाद छोटी हो गई थी) उसने दी है जिससे मैं लिख लूंगी।
ये क्रम लगभग हफ्ते भर चला तब तक माँ को पता चल गया कलम चोरी का राज तो उन्होंने जगह बदल दी क्योंकि डिब्बा खाली होने की कगार पर था।
अगले दिन मेरी हालत खराब क्योंकि डिब्बा नदारद और माँ सामने खड़ी थी।
और फिर जो डाँट और पिटाई की जिन्दगी में दोबारा अभाव में काम चला लिया पर चोरी नहीं की और एक सबक और सीखा की पूरा कभी मत खाओ थोड़ा सा बचा लो😝 क्योंकि छोटी कलम से भी a और A लिखा जा सकता है।
ये संस्मरण भी सुना सुना है क्योंकि आज भी परिवार में गाहे बगाहे यादों के पिटारे खुलते हैं और बड़े तो बड़े मेरे बच्चे भी मजे लेते हैं। 😊
कलम खाना बहुत सालों तक छूटी नहीं। और सच बताऊं तो अब वैसी कलम मिलती भी नहीं पर स्कूल, स्लेट, कलम, माँ और टीचर्स की यादें आज भी जेहन में बसी है।

*बहुत याद आती है बचपन की बातें।*
*वो डाँट गुस्सा पिटाई और चांटे।*
*अभी दूर है जिंदगी के किनारे,*
*अभी से करें क्यों पचपन की बातें,...*

*प्रीति सुराना*

Wednesday, 2 May 2018

सिसक सिसक कर रातें रोई

सिसक सिसक कर रातें रोई
आह न सुन पाया पर कोई,
तुमको खोया जिसपल मैंने
किसमत सोई,खुशियां खोई,..

बांधा था मिलजुलकर हमने
सुख-दुख दोनों का गठबंधन,
ढीले कैसे होने दें जो
मन से मन का है अवगुंठन,
चैन नहीं मिलता दिन रैना
बरसे नैना नींदें खोई,...

सिसक सिसक कर रातें रोई
आह न सुन पाया पर कोई,...

चमक दमक वाली दुनिया में
मन को पलभर चैन नहीं है,
फल कर्मों के भोग रहे सब
चिंतन बस दिन रैन यही है,
लेकिन नूर गया सूरत का
रंगत भी जीवन की खोई,...

सिसक सिसक कर रातें रोई
आह न सुन पाया पर कोई,...

तेरी ही आँखों में मैंने
डाले थे सपनों के डेरे,
मेरी सीमाएं थी हरदम
तेरी ही बाहों के घेरे,
घेरे तुमने जब से तोड़े
रात नहीं कोई मैं सोई,...

सिसक सिसक कर रातें रोई
आह न सुन पाया पर कोई,..

*डॉ.प्रीति सुराना*