Tuesday, 20 November 2018

रिश्तों के मकान

कहाँ रख पाते हैं
तमाम कोशिशों के बाद भी
खुश
छत, दर और दीवार को साथ-साथ
दर खुले
तो दीवारों पर गर्द,
और दीवार न हो
तो छत के ढहने का डर,
हौसला छोड़ दें,
तो सब कुछ बिखर जाने का खतरा,..

छत बनकर
ढकने की कोशिश करती रही
दरो दीवार को हमेशा
पर मुश्किल में हूं,
ये सोचकर
कि इसमें रहने वाले ही
जब खुश नहीं
तो
किस काम के आखिर
ये रिश्तों के मकान,
जिसमें
छत भी है ,
दर भी है,
दीवारें भी,..
पर सुरक्षित कुछ भी नहीं,..

"नींव में शायद विश्वास के पत्थर कम थे"

प्रीति सुराना

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