जिस से अब तक नहीं मिले,
उससे हों क्या भला गिले।
सावन-भादो कभी-कभी,
पीड़ा मन में सदा पले।
बारहमासी नहीं घटा,
आँखों से पर नमी ढले।
किसको मन की व्यथा कहें,
बैठे हैं हम अधर सिले।
उससे हों क्या भला गिले,
जिस से अब तक नहीं मिले।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना
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