Friday, 24 November 2017

सुरक्षित कुछ भी नहीं,..

कहाँ रख पाती हूँ 
मैं
तमाम कोशिशों के बाद भी
खुश
छत, दर और दीवार को साथ-साथ
दर खुले
तो दीवारों पर गर्द,
और दीवार न हो
तो छत के ढहने का डर,
हौसला छोड़ दूं,
तो सब कुछ बिखर जाने का खतरा,..
मैं छत बनकर ढंकती आई हूं
दरो दीवार को हमेशा
पर मुश्किल में हूं,
ये सोचकर
न जमाना खुश,
न तुम खुश,
न मैं खुश,
किस काम का आखिर
ये मकान,
जिसमें
छत भी है ,
दर भी है,
दीवारें भी,..
पर सुरक्षित कुछ भी नहीं,..

प्रीति सुराना

*असमंजस*

मुश्किल है तुम बिन रहना,
उससे भी मुश्किल है कहना,
*असमंजस* में पल-पल बीते,
और दर्द जुदाई का है सहना।

प्रीति सुराना

मैं बस तुम्हारी हूँ

मैं जब भी कभी हारी हूँ बस अपनों से हारी हूँ,
नदी होकर भी लगती मैं सबको ही खारी हूँ
माना हो तुम सागर और नही पूछोगे मेरा स्वाद
है मुझमें लाखों कमियां मगर मैं बस तुम्हारी हूँ

प्रीति सुराना

पहरा

सिसकते दर्द को मैंने अभी बरबस छुपाया है
बरसती आंखों पर काजल बड़ा गहरा लगाया है
दिखलाना ही नही मुझको जख्मों का यूं रिसना
बस ये सोचकर ही तो हंसी का पहरा लगाया है,...

प्रीति

आलम

सिहर सी जाती हूँ मैं सोचकर दूरी का आलम
उभर आता है पेशानी पर सारा का सारा गम
फिर यकायक याद आता है तुम्हारा किया वादा
कोई भी हालात आ जाए जुदा नहीं होंगे हम

प्रीति सुराना

सिसकती रात

सिसकती रात बीतेगी जो तुम न पास आओगे,
बेचैन हर सांस बिखरेगी जो तुम न पास आओगे,
बिस्तर की सिलवटों को फिर कोई इलज़ाम मत देना,
अब तो बस जान जाएगी जो तुम न पास आओगे,...

प्रीति सुराना

सिराहना

सिराहना तुम्हारे कांधे हों आदत डाल ली मैंने,
बने बाहें तुम्हारी चादर ये जिद भी ठान ली मैंने,
तुम्हारी महक, तुम्हारा स्पर्श सब है नींद के साधन,
मेरे ख्वाबों के रखवाले तुम हो बात ये जान ली मैंने,...

प्रीति सुराना

आहों में

नींद तब तक नहीं आती जब तक न लो तुम बाहों में,
सुकून तब तक नहीं मिलता जो न रहूं तुम्हारी पनाहों में,
मुझे महसूस करते हो या नहीं मालूम नहीं है ये मुझको,
मैं हरपल महसूस करती हूं तुम्हें अपनी चाहों और आहों में,...

प्रीति सुराना

Thursday, 23 November 2017

मुश्किल जब जब भी आती है

मुश्किल जब-जब भी आती है,
बातें कितनी सिखलाती है।

कौन भला या फिर है भोला,
या किसने पहना है चोला,
कौन पराया या है अपना ,
पहचान वही करवाती है।
मुश्किल जब-जब भी आती है,
बातें कितनी सिखलाती है।

सच-झूठ उजागर कर देती,
तब राज कई खुल जाते हैं,
कितनी क्षमता है किस किस में,
समय समय पर दिखलाती है।
मुश्किल जब-जब भी आती है,
बातें कितनी सिखलाती है।

ठोकर खाकर कौन गिरेगा,
कौन उठेगा साहस करके,
कौन कहाँ कितने पानी में,
हद कद सब कुछ समझाती है।
मुश्किल जब-जब भी आती है,
बातें कितनी सिखलाती है,..।

प्रीति सुराना
23/12/2017

Tuesday, 21 November 2017

संगति

अविरल नदी सी थी वो, बांधो में बांधकर जिसकी चंचलता खत्म कर दी गई। एक दिन कोई आया जिसने गलती से,.. हां! हां! गलती से ही बांध खोल दिया और नदी ने कृतज्ञता जाहिर करते हुए उस अजनबी के साथ नदी और किनारों का संबंध जीते हुए प्रवाह शुरू किया।
सच यामिनी के सब्र के बांध विहान ने खोल तो दिए, यामिनी अपनी गति से गतिमान भी हो गई, पर किनारों की सुरक्षा और अपनत्व का मोह न छोड़ सकी।
दो छोटे बच्चों की जवाबदारियों और उदासीनता वाले दाम्पत्य ने भीतर ही भीतर घुटन पैदा कर दी थी। एक दिन कार्यालय में विहान से मुलाकात हुई, यामिनी के विभाग से ही जुड़ा काम दोनों को मित्रता में जोड़ गया। अक्सर विहान लंच टाइम में आने लगा, दोस्ती प्यार में बदली। और धीरे - धीरे यामिनी भावनात्मक रूप से विहान पर निर्भर होने लगी। सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभाते हुए भी जाने क्यों विहान को देखते ही बच्चों सा उसका मन उसे देखने तक को मचल जाता, फिर फोन पर जिद और रोना।
सब कुछ सही था पर विहान का गुस्सा बहुत तेज था। यामिनी की जरा-जरा सी बात पर उसका साथ छोड़ देने की बात अंदर तक दहला देती। ऐसे में अपने मर्ज, फर्ज या भावनाओं की कोई भी बात उसके मुंह से निकल भी जाए तो विहान जवाब देता 'तुम्हें कोई काम नही है, तुम्हारा गुलाम नही हूँ जो दिनभर के काम के बाद तुम्हारा रोना सुनू या दिन भर तुम्हारी तारीफों के के कसीदे पढूं।'
धीरे-धीरे संगति का असर था या नियति यामिनी भी गुस्से में प्रतिक्रिया देने लगी, स्वभाव के विपरीत होने के कारण यही गुस्सा उसकी सेहत को लीलने लगा।
मानसिक असंतुलन में एक दिन सपरिवार जान तक देने की ठान ली। पर समय रहते खुद को रोक लिया।
कुछ परेशानियों के बाद सामान्य होने की कोशिश करने लगी। गलतियों और अपेक्षाओं के गड्ढों से बाहर निकल फिर निर्बाध जीने की उम्मीद में विहान से माफी मांगी, खुद के बांध खुद बनाकर गतिमान होने का निश्चय किया।
हिम्मत करके विहान से फ़ोन पर कहा ' विहान मुझे माफ़ कर दो, और एक बार फिर सबकुछ भूलकर साथ चलो मुझसे अकेले नहीं चल जाएगा।'
विहान ने कहा 'मैं साथ रहूंगा पर अब मैं प्यार नहीं कर पाऊंगा' ।
स्तब्ध यामिनी सशर्त विहान के साथ आगे बढ़ने के लिए खुद को तैयार कर रही उस समय उसके आखरी शब्द ये थे कि
'मैं, अब मैं नहीं हूं, समय ने सब कुछ बदल दिया।'
"जिंदा लाश सी यामिनी सांसों और समय संगति में अब भी जिंदा तो है" - पर कब तक?

प्रीति सुराना

Monday, 20 November 2017

मेरे बाद


वक्त को थमने मत देना कल मेरे बाद,
दर्द को रुकने मत देना तुम मेरे बाद,

रहने देना जो भी जैसा भी है आज,
बदल नहीं देना तुम सबकुछ मेरे बाद,

आज अगर खुशियां हो बैठी है नाराज,
लौटेगी फिर अपना लेना मेरे बाद,

समझा न सकी थी मैं ही तुमको हालात,
कोशिश करना समझ सको तो मेरे बाद,

जिस्म की बात नहीं हम जिसको जाते भूल
रुह का रुह से नाता होगा मेरे बाद

रह जाती है बाकी बस यादें ही पास
दिल की बातें दिल में रखना मेरे बाद

जरुरत होती तो पूरी हो जाती लेकिन,
'प्रीत' कमी तो रह जायेगी मेरे बाद।

प्रीति सुराना
20/11/2017

Sunday, 19 November 2017

कीर्तिमान

सुनो!
भावनाएं
शब्दों से खेलने में नहीं
शब्दों को नए रंग-रूप में...
गढ़ने के लिए हो,
तो हमेशा
सृजन
से होगा निर्मित
भावों का
अथाह और अगाध
स्वरूप,..
और उसी स्वरूप में
जीवन की तमाम
संभावनाएं निहित होंगी,..
और
तब
निश्छल भावों का
समर्पण,..
हमेशा देगा
शब्दों को ही नहीं
बल्कि जीवन को भी
नव दशा और नव दिशा,
हां!!!
मैं गढूंगी
एक दिन
इन्ही शब्दों से
अपने समर्पित भावों का
अद्वितीय कीर्तिमान,..

प्रीति सुराना

Saturday, 18 November 2017

दायरे

हर बार तुमसे लड़कर
मैं खुद से हार जाती हूँ,.
हर बार सोचती हूँ
अब नही हारना मुझे
इसलिए
कोई नयी लड़ाई
कोई नया विवाद
नहीं चाहिए हमारे बीच,..

पर दुनिया के प्रपंचों से
प्रभावित मन को
मिलती है राहत
सिर्फ तुम्हारी पनाहों में
क्योंकि
सिर्फ तुम
महसूस कर सकते हो
मेरी भावनाएँ मेरी आहों में,..

तुम्हे न खोने का
अटूट विश्वास
मुझे विवश कर देता है
अपनी सीमाओं
और अपने दायरे भूलकर
सब कुछ कह देने को
ये कोई मानसिक असंतुलन
या विक्षिप्तता नहीं,..

इसका कारण है
मुझ पर
तुम्हारा
एकाधिकार
जो एकमात्र वजह है
तुम्हीं से प्यार
और
तुम्हीं से तकरार की,..

पर सुनो!!!
अब मैंने मान लिया
सिर्फ तुम से तुम तक मेरी हदें
और तुम्ही मेरा सुरक्षाकवच
जो दुनिया की बुराईयों से करेगा मेरा संरक्षण
और
अपने दायरों में रहकर करती हूँ मैं तुम्हें अपना सर्वस्व समर्पण,.....

प्रीति सुराना
17/11/2017

હર સમય
ત્હારી સાથે ઝગડીને
હું હારી જાઉં છું ખુદથી..
દરેક વખતે વિચારું છું
હવે હારવું નથી
એટલે જ
કોઈ નવો ઝગડો
કઈ નવો વિવાદ
આપણી વચ્ચે
નહીં જોઈએ....
પરંતુ
જગતનાં પ્રપંચોથી
પ્રભાવિત મનને
શાતા મળે છે
કેવળ ત્હારા શરણમાં
કેમ કે
કેવળ તું જ
મહેસુસ કરી શકે છે
મ્હારી ભાવનાઓને
મ્હારી 'આહ'માં...
તને નહીં ખોવાનો
અતૂટ વિશ્વાસ
વિવશ કરી દે છે મને
મ્હારી મર્યાદાઓ
અને મ્હારા સીમાવર્તુળને
ભૂલીને
સઘળું કહી દેવાને
આ કોઈ માનસિક અસંતુલન કે વિક્ષિપ્તતા નથી....
એનું કારણ છે
મ્હારા ઉપર
ત્હારો
એકાધિકાર
જે એક માત્ર કારણ છે
ત્હારી સાથેનાં સ્નેહ અને
ત્હારી સાથેનાં ઝગડાનું...
પણ સાંભળ...!
હવે મેં સ્વીકારી લીધું છે કે
કેવળ ત્હારાથી ત્હારા સુધી જ છે મ્હારી સીમાઓ...
અને તું જ છે
મ્હારું સુરક્ષાકવચ
જે વિશ્વની બુરાઈઓથી
કરશે મ્હારું રક્ષણ
અને
મ્હારા સીમાક્ષેત્રમાં રહીને
કરું છું હું તને
મ્હારું સર્વસ્વ સમર્પણ..!

ડૉ.પ્રીતિ સમકિત સુરાના
ગુજરાતી ભાવાનુવાદ:
રક્ષિત અરવિંદરાય દવે
તા.૧૭-૧૧-૧૭Al

Thursday, 16 November 2017

भारी बस्ते हल्की शिक्षा

"बस्तों में बोझ और विकृत होती संस्कृति"

किताबें सबसे अच्छी मित्र होती हैं पर यही किताबें बच्चों के लिए बोझ बन गई नवीन शिक्षा पद्धति के चलते। पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण करते हम यानि शिक्षक और अभिभावक ये भूल गए कि इसका औचित्य क्या?
शिक्षा से शिक्षक शिक्षित करे
और पाठ पढ़ाये पाठशाला
पग-पग सबक सिखाती जिंदगी
अगर हो कोई सीखने वाला,...
आज हम और आप केवल स्टेटस सिम्बल(प्रतिष्ठा के प्रतीक) के रूप में बच्चों के लिए स्कूल का चुनाव करते हैं। प्रतिष्ठा का प्रतीक इसलिए क्योंकि जितने सक्षम और समृद्ध परिवार का बच्चा उतना ज्यादा महंगा, बड़ा और सुविधायुक्त स्कूल। जहां एक बच्चा सीखता अपनी प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के गुर। जिसके लिए उसे विधार्थी से बनना पड़ता है प्रतियोगी। गुरु-शिष्य की परंपरा जब से विलुप्त हुई तब से अर्जुन और एकलव्य जैसे लक्ष्य साधकों के उदाहरण भी पुराना सा लगने लगा है।
बहुमखी विकास के लिए अब बच्चा किताबों के साथ-साथ, विविध उपकरणों और इंटेरनेट (अंतर्जाल) का भी इतना आदि हो गया है कि उसे दो और दो जोड़ने के लिए भी केल्कुलेटर (संगणक) और देश के प्रधानमंत्री का नाम तक इंटरनेट पर ढूंढता है। शिक्षा के व्यवसायीकरण के साथ हर बच्चा खुद को समय के साथ अपडेट करना सीखने लगा है लेकिन परंपराओं और व्यवहारिक पक्ष को पीछे छोड़कर।
वर्तमान पीढ़ी में माता-पिता , गुरु और मातृभाषा के प्रति तनिक ही सहीं पर भावनात्मक लगाव शेष है। पर जब बच्चे को पाला ही विदेशी संस्कृति के सहारे जाएगा तो वो दिन दूर नहीं जब इस देश में भी बच्चे बालिग होते ही पितृछाया से अलग अपनी दुनिया बसाने में सुविधा महसूस (कम्फर्ट फील) करेगा।
आज आवश्यकता है बच्चे को किताबों से भावनात्मक जुड़ाव के लिए प्रेरित करने का,.. जो पढ़ा उसे जीना चाहिए। जो रटा उसे बड़े-बड़े व्याख्यान (स्पीच) के रूप में लोगों के सामने बेस्ट परफॉर्मर बनकर प्रस्तुत करना सीख जाते हैं जो बच्चे क्या वही बच्चे उस किताब का एक अंश भी जीवन में उतारना सीख पाते है??
जितनी बड़ी समस्या पीढ़ियों का अंतराल (जनरेशन गैप) है उतनी ही बड़ी समस्या शिक्षा का बोझ बन जाना है। "सपनों के लिए अपनों से दूर होने की आधुनिकतम सभ्यता" की नींव उसी पल डाल दी जाती है जिस पल बच्चे को मिट्टी को गंदगी, मां को मॉम और हिंदी को पिछड़ी भाषा मानकर अंग्रेजी को ऊंचा दर्जा दिया जाता है फिर अपनी ही गलतियों के लिए दोषी कोई और क्यों ठहाराया जाए??
भारत के डिजिटल होते-होते और आधुनिक शिक्षा के चलते बस्तों का बोझ तो धीरे-धीरे कम हो ही जाएगा लेकिन विचारणीय पक्ष यह भी है कि जिन कंधों पर मातृभाषा की किताबें बोझ लगने लगे उन कंधों पर टिके मस्तिष्क में माँ और मातृभूमि के प्रति प्रेम कब तक टिकेगा,... ????

प्रीति सुराना