Tuesday, 18 June 2019

देखते हैं,...!

देखते हैं,..

जो  कह  लिया, वो  कर के  देखते  हैं,
रोज बनते रहे, अब बिखर के देखते हैं,
जो  मिला  है, उसका खोना भी तय है,
जी  लिए बहुत, अब  मर  के देखते हैं।

प्रीति सुराना

Sunday, 16 June 2019

तपन

सोचा था कि बादल उमड़े हैं तो धरा की तपन कम होगी
सोचा न था उमस इतनी बढ़ जाएगी और घुटन होगी
सूरज तो हमेशा से स्थिर है और धरा भी घूमती है सतत अपनी धुरी पर
पर मौसम की रुसवाई जाने कहाँ शुरू कहाँ ख़तम होगी?

प्रीति सुराना

रिश्ते जीवंत हो

रिश्ते दिखाने या फिर जताने के लिए नहीं
रिश्ते मेरा-तेरा क्या ये बताने के लिए नहीं
रिश्ते तन-मन-धन से नहीं आत्मा से निभें
रिश्ते जीवंत हो, मजबूरी में निभाने के लिए नहीं,..!

प्रीति सुराना

जरा संभलना

बहुत मुश्किल से मिलते है रिश्ते,
बहुत मुश्किल से बनते हैं रिश्ते,
कोई और न कर सके कमजोर,
जरा संभलना!
बहुत मुश्किल से निभते है रिश्ते।

प्रीति सुराना

पापा और मैं

Happy fathers day

पापा और मैं

एक ऐसा रिश्ता
जिसमें अपेक्षा कम सुरक्षा ज्यादा
एक ऐसा रिश्ता
जिसमें पारदर्शिता ही पारदर्शिता
एक ऐसा रिश्ता
जो हौसला भी देता है और दिशा भी
एक ऐसा रिश्ता
जिसने जन्म भी दिया और जीवन भी
हर बेटी के जीवन का
सबसे पहला पुरुष होता है पिता
जिससे मिलते हैं जिंदगी के तमाम रिश्ते
और भाई, दोस्त, प्रेमी, पति , बेटा
हर रिश्ते में एक बेटी
पूरी जिंदगी तलाशती है एक पिता की छवि
क्योंकि
इससे सुरक्षित, समर्पित और स्नेहिल
कोई रिश्ता एक लड़की को पूरी जिंदगी में कहीं नहीं मिलता।

मम्मी-पापा ही
जीवन की आधारशिला हैं
एक बेटी
जीवन की कितने ही पड़ाव पूरे कर ले
ऊंचाइयों को छू ले
स्वप्नों के महल खड़े कर ले
जिये पूरी जिंदगी मम्मी-पापा का घर छोड़कर
पर उसके जीवन में संस्कारों की नींव
मम्मी-पापा की रखी हुई ही होती है।
सिर्फ मातृ-पितृ दिवस पर नहीं
बल्कि
अंतिम सांस तक
नमन और स्नेह के तार जुड़े रहेंगे
मम्मी-पापा से
ये वो ऋण है जिससे उऋण कभी नहीं हुआ जा सकता,...

हाँ! मैं चिर ऋणी हूँ आपकी

प्रीति सुराना

Saturday, 15 June 2019

स्वेद श्रम जल बिंदु

नगण्य ही सही किंतु हूँ मैं
बूंदों से बना पर सिंधु हूँ मैं!

न मेरा कोई धर्म, न मजहब
न सिक्ख, ईसाई, न हिन्दू हूँ मैं!

किस काल से हूँ ये भी न जानूँ
न कबीर, तुलसी न भारतेंदु हूँ मैं!

कर्म करके स्वभाग्य गढ़ता
बस स्वेद श्रम जल बिंदु हूँ मैं!

प्रीति सुराना

Thursday, 13 June 2019

खुशियाँ बड़ी चंचल होती हैं

खुशियाँ बड़ी चंचल होती हैं

हाँ!
समेट लेना चाहती हूँ
अपने दामन में
हर वो पल
जो खुशी दे गया
छूटना ही है कुछ
तो छोड़ देना चाहती हूँ
हर वो पल
जो दर्द दे गया।
खुशनसीब हूँ
तमाम कोशिशों के बाद भी
कोई रोक नहीं पाता
मेरे प्रारब्ध में लिखे
मेरे कर्मफल को।
यादों के पन्ने जब भी पलटती हूँ
पाती हूँ बेहिसाब हौसला
ताकि फिर निर्धारित कर सकूँ
एक नया लक्ष्य
एक नया उद्देश्य
एक नई दिशा
जीवनरथ को भवपार ले जाने के लिए,..!

शुक्रिया जिंदगी!
हर बार रुलाकर फिर हँसाने के लिए,..!

प्रीति सुराना

रिश्ते वही सोच नई!

परिभाषाएँ बदलती हैं
एक वो वक्त था
जब लोग कहते थे
जो दुख में साथ आकर खड़ा हो जाए
वो ही आपके सच्चे मित्रों की पहचान है
आज ये वक्त है
जब लोग समझते हैं
सुख में बिना किसी ईर्ष्या, द्वेष या अपेक्षा के
जो आप के साथ खड़ा हो सके
वही आपकी खुशियो की वजह भी होगा
और दुआएं भी देगा,...!

रिश्ते वही सोच नई!

प्रीति सुराना

Wednesday, 12 June 2019

अवसर

        पर्यावरण दिवस था, वृक्षारोपण का कार्यक्रम जगह-जगह चल रहा था।
       एक जगह 10-20 लोगों का समूह 10-20 गड्ढे खोदकर हर गड्ढे में मुट्ठी भर-भर कर अलग-अलग गड्ढों में अलग-अलग प्रकार के बीज डाल रहे थे, कुछ लोग उन बीजों पर मिट्टी डाल रहे थे और कुछ लोग झारी में पानी भरकर उन गढ्ढों के ऊपर पानी डाल रहे थे। एक बड़े ही सयाने व्यक्ति ने जिन्हें इस अवसर पर अतिथि के रूप में बुलाया गया था, पूछा कि इस पूरी प्रक्रिया से लाभ क्या होगा।
          संस्था के पदाधिकारियों ने कहा- महोदय ये जगह घरों के जल निकासी मार्ग के बिल्कुल पास है जो नहर मार्ग तक हमेशा नमीयुक्त होती है। जिससे इन बीजों में कोई न कोई बीज हर गड्ढे में अंकुरित होकर बढ़ ही जाएगा। और हर गड्ढे में अलग प्रजाति का बीज है तो विविध प्रकार के वृक्ष पल्लवित होंगे जिन्हें विशेष देखभाल की जरूरत भी नहीं होगी। महोदय चुपचाप सुनते रहे। सभी साथियों को योगदान के लिए सम्मानित किया। महोदय का विशेष सम्मान हुआ।
         अगले एक अन्य आयोजन में भी वे अतिथि थे। वहाँ पहुँचे तो देखा। 70 लोग अपने-अपने हाथ में गोबर और मिट्टी की गेंद सरीखी कोई वस्तु पकड़े खड़े थे। सबने अपने-अपने गड्ढे खोदे। गेंदनुमा मिट्टी और खाद में एक-एक मनपसंद बीज डाला। और मिट्टी से ढककर छोड़ दिया। संस्था के संस्थापक ने गोलाई में लगाए इन बीजों के करीब एक पाइपलाइन बिछा दी जिसमे बहुत ही महीन छिद्र थे। और वह पाइप एक बहुत बड़े सहित्यभवन के मूल जल निकास से जोड़ दिया जिसे भवन के व्यवस्थापकों ने जल संरक्षण के उद्देश्य से पास के ही तालाब तक लाकर छोड़ दिया।
       अतिथि महोदय फिर अचंभित। उनका सम्मान, फिर वृक्ष और वृक्षारोपण पर व्याख्यान, सभी सदस्यों का सम्मान पर्यावरण प्रेमी के रूप में हुआ। महोदय ने संस्थापक से पूछा इन सब का उद्देश्य। संस्थापक ने बताया 70 लोगों को हमनें प्रेरणा दी, वृक्ष लगाने की, एक भवन के पीछे खाली पड़े मैदान को 70 बीजों से घेरा गया, ताकि वृक्ष पनपे तो उद्यान का रूप ले ले। खुली जगह में जल निकास का उपयोग पौधों की सिंचाई के काम आएगा। हर व्यक्ति ने अपने लगाए पेड़ की जिम्मेदारी खुद लेते हुए उसके पास ही अपने नाम की तख्ती गड़ा ढ़ी है जिसमे वृक्ष की प्रजाति और लगाने की तिथि भी लिखी है।
        अब महोदय से रहा नहीं गया। क्योंकि कभी न देखा, न सुना, न समझा केवल सरकारी खर्चों पर होने वाले अभियानों के हिस्सा रहे जिसका बाद में क्या हुआ किसी को कोई मतलब नहीं। ऐसे में ये सारी गतिविधि भी व्यर्थ लगी।
           महोदय इसकी उसकी करने में भी माहिर थे। बोलना शुरू किया, अभी एक जगह और गया था। मुठ्ठी भर बीज लगाए, कौन सा पनपेगा कौन सा मरेगा पता नहीं लेकिन प्रमाणपत्र सबको पकड़ा दिया। अभी यहां एक नया खेल 70 बीज अभी बोये ही हैं। लगेगा नहीं लगेगा कोई ठिकाना नहीं। जल संरक्षण का बहाना करके सिंचाई के काम से भी बच गए और अपने नाम का झंडा अलग गाड़ दिया। और उद्यान बने या न बने, अपना अपना फ़ोटो चिपका हुआ सम्मान प्रतीक चिन्ह अलग ले गए, अजीब चोचले हैं? बीज फूटा नहीं और पेड़ उगाने का तमगा? ऐसे चोचले समाज में करके ऐसे आयोजनों से वृक्षारोपण की महत्ता का निरादर करके धूम-धड़क्का करके, मीडिया में प्रचार प्रसार करेंगे, खूब फ़ोटोसेशन होंगे और बन गए बड़े-बड़े सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी। ये है आजकल की कहानी।
          एक नवयुवक पास ही खड़ा सब देखसुन रहा था। वो पास आया और बोला, आदरणीय इस अवसर पर आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ क्योंकि आपकी बातों ने प्रभावित किया।
महोदय खुश हुए- नवयुवक ने पूछा आप समाजसेवा के अग्रणी है, आपका बहुत नाम है और आपको सरकार से 200000 रु का पुरुस्कार भी मिला था। क्या आप बताएंगे जो पेड़ आपने लगाया था वो किस प्रजाति का, कहाँ और कितना बड़ा है और पिछली बार आप वहाँ कब गए थे, गए थे तो क्या आपने वृक्ष को देखा या सींचा?
         अब अवसर था सभी सम्मानित सदस्यों के चेहरे पर मुस्कान का और महोदय के बगले झाँकने का।

और लोग सोच रहे थे:-
अभी तो
पुस्तक की ज़िल्द सूखी ही नहीं
और पहुँचने गए लोग पन्ने फाड़ने
काश!
दूसरों के सम्मान से कुढ़ने की बजाय
कोई बेहतर पैगाम दुनिया के नाम लिख दिया होता।

प्रीति सुराना

Tuesday, 11 June 2019

शानदार रहा अन्तरा शब्दशक्ति का दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन।

शानदार रहा अन्तरा शब्दशक्ति का दो दिवसीय साहित्य सम्मेलन।

दो दिनों में देश के विभिन्न राज्यों महाराष्ट्र, गुजरात, हैदराबाद, दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड, पंजाब, उत्तरप्रदेश आदि से आए हुए रचनाकारों का ऐतिहासिक आयोजन वारासिवनी (मप्र) में सम्पन्न हुआ।
तीन सत्रों में आयोजित कार्यक्रम साहित्य समाज मित्रता और परिवार के समिश्रण की तरह सहिष्णुता और सौहार्द्र से परिपूर्ण रहा।
प्रथम सत्र में (1 जून 2019 दोपहर 1 बजे से 4:30 बजे तक) नगरपालिका अध्यक्ष विवेक पटेल, प्रखर वक्ता एवं कवि नरेंद्र अटल (महेश्वर), समकित सुराना, संजय रूसिया, राकेश बौड़ाई, कीर्ति वर्मा, पिंकी परुथी, ब्रजेश विफल के आतिथ्य एवं अलका चौधरी के संचालन में, परिचय एवं परिचर्चा के रूप में सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात सभी गौशाला भ्रमण के लिए गए।
द्वितीय सत्र (1 जून2019 शाम 7:30 से 12:30 तक) बहुत ही अनूठा था। मंचपर एक साथ सात वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. बख्शीश दुबे (गायनकोलोजिस्ट), बिलासपुर, डॉ. गुरजीत रैखी(गायनकोलोजिस्ट), संगरूर, डॉ. सुनीता सिन्हा (सर्जन) दिल्ली, डॉ. संतोष बंसल (फीजिशियन) दिल्ली, डॉ. अमिता वर्मा (गायनकोलोजिस्ट) भोपाल, डॉ. प्रीति राठौर (गायनकोलोजिस्ट) रायपुर, डॉ अर्चना लोकरे(गायनकोलोजिस्ट) बालाघाट उपस्थित रहे। सर्वप्रथम अतिथि सत्कार के बाद साहित्यिक, पारिवारिक एवं बचपन के अभिन्न मित्रों को 'दोस्ती है जिंदगी' का स्मृति चिन्ह भेंट करने के पश्चात नरेंद अटल जी के संचालन में रात 12:30 बजे तक काव्य गोष्ठी चलती रही।
तीसरा सत्र (2 जून 2019 सुबह 11:30 से 2:30 तक) आ. दिनेश देहाती के संचालन में आ. प्रदीप जायसवाल (केबिनेट मंत्री) आ. योगेंद्र निर्मल (भूतपूर्व विधायक), आ. नंदकिशोर जी सुराना (अध्यक्ष-जैन श्वेताम्बर श्री संघ वारासिवनी), आ. सोहन वैद्य (वरिष्ठ संपादक एवं पत्रकार), डॉ. भारती सुराना (संरक्षक- अन्तरा शब्दशक्ति संस्था), डॉ रामकुमार वर्मा(वरिष्ठ नागरिक), आ. विनोद कोचर(वरिष्ठ नागरिक), आ. ज्ञानचंद जी बाफना (वरिष्ठ साहित्यकार की उपस्थिति में 70 पुस्तकों का विमोचन एवं 70 अन्तरा शब्दशक्ति साहित्यकार स्वाभिमान सम्मान। अन्तरा शब्दशक्ति 11 गौरव सम्मान। अन्तरा शब्दशक्ति डॉ भारती वर्मा बौड़ाई को अन्तरा शब्दशक्ति भूषण सम्मान। 7 अन्तरा सहयोगी सम्मान के भव्यतम रूप में सानंद सम्पन्न हुआ। केबीनेट मंत्री प्रदीप जायसवाल सहित सभी अतिथियों में शुभकामना वक्तव्य दिया। उत्तम भोजन एवं आवास सुविधाओं के साथ अभूतपूर्व प्रेमपूर्ण वातावरण में अन्तरा शब्दशक्ति का आयोजन, आयोजक प्रीति-समकित सुराना द्वारा आयोजित, संयोजित एवं सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। साहित्यकारों और पारिवारिक मित्रों सहित नगर के गणमान्य नागरिकों सहित लगभग 300 लोगों की उपस्थिति रही।
डॉ प्रीति सुराना ने अन्तरा-शब्दशक्ति के तीनों सत्रों में स्वागत भाषण में अन्तरा शब्दशक्ति की सम्पूर्ण गतिविधियों एवं संस्था के पंजीकरण की जानकारी दी। प्रीति-समकित सुराना ने मानवीय स्वभाव या परिस्थितिजन्य कमियों या त्रुटियों के लिए क्षमायाचना एवं सभी को विशिष्ट आयोजन में पधारने हेतु आभार व्यक्त किया।

थोड़ा सा आराम

थोड़ा सा आराम

थक गई हूँ
अब चाहिए थोड़ा सा आराम
बहुत रह ली
ऐसे लोगों के बीच
जो साथ रहकर भी
इतनी फुरसत में होते हैं
कि
इसकी उससे
उसकी उससे
और
उसकी इससे करते करते थके नहीं,..!
पर सच मैं थक गई
साहित्य, समर्पण, साथ, समन्वय, सहृदयता
मेरा जुनून है,
जीने की वजह है,
करती रहती हूँ कुछ न कुछ अलग सा,
और सौभाग्य है
रहते है साथ
सुरक्षा कवच की तरह
मेरा परिवार, मेरे दोस्त, मेरे साथी,..!
और हर सफलता के बाद सारा श्रेय जाता है
मेरे अपनों को,..!
लेकिन सच कहूँ
कुछ करने की जिद और जुनून
उन लोगों से मिलता है
जिन्हें तकलीफ है मेरे कुछ भी करने से
साम, दाम, दंड, भेद, भी जब काम नहीं आते
तो फिर शुरू करते हैं कांटे बोना,
और मैं फिर जुट जाती हूँ इस तैयारी में
मुझे अगले मौसम
फिर चुनना है इन्हीं कांटों से फूल,...!
पर फिलहाल
मन चाहता हैं थोड़ा सा आराम,
खुद से थोड़े सवालों के जवाब,
क्योंकि
थकान ने छीन ली है सुकून भरी नींद
और नींद की गोलियों ने छीन लिए हैं ख्वाब,...!

प्रीति सुराना

Saturday, 8 June 2019

नई सी रीत

सुख में सब नाता जोड़े पर,
दर्द में न कोई अपनाये,..!
चलो आज से ही जीने की,
एक नई सी रीत बनायें,..!

खुश होकर मिलना है सबसे
सच सबका जाना है तब से,
कदम-कदम पर मिले फरेबी
मीठी बातों से भरमाये,

लूटा सबने अपना बनकर
फिर मुकरे और ऐंठे तनकर,
ढोल पीट-पीट कर सबको
खुद के ही गुणगान सुनाये,

सुख में सब नाता जोड़े पर,
दर्द में न कोई अपनाये,..!
चलो आज से ही जीने की,
एक नई सी रीत बनायें,..!

दस्तावेज लिखे रक्खे हैं
जितने छल या झूठ रचे हैं,
पन्नों में इतिहास लिखा है
जो खुद ही सब राज बताये,

चुप रहना है केवल तब तक
पानी पहुँचे न जब सिर तक,
लोक-लाज सब जाने समझें
समय सदा कुछ और सिखाये,

सुख में सब नाता जोड़े पर,
दर्द में न कोई अपनाये,..!
चलो आज से ही जीने की,
एक नई सी रीत बनायें,..!

अपशब्दों के बाण है झेले
लड़ना हक के लिये अकेले,
लेकिन सच का दामन थामे
वो ही सच्ची राह दिखाये,

आत्मसाक्षी से सच्चे रहकर
झांसो या वादों से बचकर,
बड़ी-बड़ी बातें मत करके
जो सोचा करके दिखलायें,

सुख में सब नाता जोड़े पर,
दर्द में न कोई अपनाये,..!
चलो आज से ही जीने की,
एक नई सी रीत बनायें,..!

प्रीति सुराना