Wednesday, 22 March 2017

"सोनचिरैय्या उड़ गई"

सीने में तेज़ सा दर्द उठा अचानक पसीने से लथपथ तनुजा वहीं पास रखी कुर्सी पर धम्म से बैठ गई। पास ही काम करती  शक्कु बाई घबराकर पड़ोस के शर्मा जी की पत्नी को बुला लाई। मिसेस शर्मा और उनकी बहू ने पडोसी धर्म निभाते हुए तनुजा को सिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया। डॉ ने कहा दिल का दौरा पड़ा है इनके परिवार में से किसी को बुला लीजिये।
मिसेस शर्मा के पास तनुजा के पति का मोबाइल नंबर ही नहीं था। तनूजा के फोन पर अरुण के नाम से तलाश किया, उन्हें आश्चर्य हुआ कोई नंबर नहीं था। फिर कॉल डिटेल में देखा, वंदना की तबीयत बिगड़ने के 10 मिनट पहले 'दर्द' नाम के किसी नंबर पर 3 बार कॉल किया था उसने। उत्सुकतावश उसने उसी नम्बर पर उसी के फोन से कॉल कर लिया। तीसरी बार घंटी जाने से पहले ही लगभग चीखती हुई सी आवाज़ आई "तुम्हे कहा था न की फोन करके परेशान मत करो मेरा एक एक मिनट कीमती है", और फोन कट गया। आवाज़ अरुण की थी पहचानने में कोई गलती नहीं हुई क्योंकि अकसर ये आवाज़ें तनुजा के घर की दीवार से होकर उन तक पहुँचती है। जैसे तैसे खुद को संभाला तभी तनुजा को होश आने लगा वो डॉ को बुलाने के लिए मुड़ ही रही थी कि तनुजा ने उनका हाथ थाम लिया और लड़खड़ाती जुबान से कहा "बातों की चुभन, सूनी कोख और अकेलापन सालता है , सोने के पिंजरे में बिना प्रेम दम घुटता है मेरा, अब 'दर्द' के साथ जीना नहीं होगा मुझसे।" शर्मा जी की बहु के साथ डॉ कमरे में आए ही थे की तनुजा ने दम तोड़ दिया।
मिसेस शर्मा को अचानक तनुजा के पिता का चेहरा याद आया जो पिछली बार जाते हुए दरवाजे पर कहकर गए थे "सोन चिरैय्या अब नातियों का मुंह और दिखा दे 4 साल हो गए इस इंतज़ार में अगली बार आऊं तो अपने नाती को गोद में खिलाकर ही जाऊंगा"।
    वो सोच में थी 'दर्द' को फिर फोन कैसे करे ? नहीं उठाया तो? कुछ सोचकर अपने फोन से अरुण का नंबर डायल किया और फोन उठते ही कहा "सोनचिरैय्या तो उड़ गई अब दर्द किसे दोगे?"
पता नहीं उसकी बात अरुण ने सुनी भी या नहीं और फोन काट दिया।
अगले ही पल तनुजा के फोन पर 'दर्द' की घंटी बजी । स्तब्ध हो सास-बहू सोचने लगी क्या अरुण को तनुजा का दर्द पता था??

प्रीति सुराना

Monday, 20 March 2017

पागलपन

घाव मिला जब भी कोई ,ये मन हँसकर टाल गया।
मेरा ये पागलपन ही, इस दुनिया को साल गया।।

मैं चुप ही रह लेती हूं , लोगों की सुनकर बातें।
मुझको अकसर अपनों से, दर्द की मिलती सौगातें।
रुक कर पलकों पर आंसू, आदत अपनी डाल गया।
घाव मिला जब भी कोई ,ये मन हँसकर टाल गया।
मेरा ये पागलपन ही, इस दुनिया को साल गया।।

कदम बढ़े आगे जब भी,सबने बीच डगर रोका।
जो शामिल न रहा गम में, उसने खुशियों को रोका।
इन बिन मोल झमेलों में,अनमोल अनूठा काल गया।
घाव मिला जब भी कोई ,ये मन हँसकर टाल गया।
मेरा ये पागलपन ही, इस दुनिया को साल गया।।

रीतेपन में जीवन के,रंग अलग से भर लेती।
सपने अपने अपनों के, जुटकर पूरे कर लेती।
भाग्य मगर चकमा देकर,सूनापन सा ढाल गया।
घाव मिला जब भी कोई ,ये मन हँसकर टाल गया।
मेरा ये पागलपन ही, इस दुनिया को साल गया।।

टूटे कुछ सपने मेरे,मन के आंगन में बिखरे।
जितना टूटे जीवन में, उतना ही फिर से निखरे।
आशाओं का एक दीया,अरमानों को पाल गया।
घाव मिला जब भी कोई ,ये मन हँसकर टाल गया।
मेरा ये पागलपन ही, इस दुनिया को साल गया।।

प्रीति सुराना

Wednesday, 15 March 2017

घडी खो गई

हरदम समय कीमती होने का उलाहना देते रहे वो जब भी मिले,
आज मैंने देरी की वजह जो पूछ ली तो झेंपकर कहा घड़ी खो गई,..

प्रीति सुराना

आइनों पर परदे क्यूं

अकसर
अपने आसपास
देखा है
ऐसे लोगों को
जो दूसरों को
आईना दिखाकर
पूरे तन और मन से
समाज सेवा
और
समाज सुधार में लगे होते हैं।
आज गई थी
उलझी सी जिंदगी के धागे सुलझाने,..
एक बड़े सामाजिक सलाहकार के पास,
सुन रखा था सलाह बहुत अच्छी देते हैं वो भी मुफ्त में,..
पर सच कहूं
मन के शोर से ज्यादा
सुनाई दे रहा था उनके आंगन का शोर,..
और भी एक बात समझ नहीं आई अब तक,...
सुनो!!
तुम्ही बताओ ना,.
क्या तुम्हे पता है
उनकी तिजोरियों में ताले
और खुद के घरों में
आइनों पर परदे क्यूं लगे होते हैं???

प्रीति सुराना

Saturday, 11 March 2017

रह लोगे तुम

हां!
सच कहा था तुमने
नहीं बदल पाई
नए जमाने के साथ,..
सफलता और सुख
साझा न करने के ज़माने में
सिर्फ
दुःख में,
दर्द में,
तन्हाई में,
अँधेरे में,
अकसर लोगों को देखा
तलाश करते किसी कंधे की,..
टटोलते कोई हाथ
जो थाम ले मुश्किल समय में,..
पर मैं
खुश भी अकेले नहीं हो पाती,
पहले ही डर जाती हूं
उजालों के बाद के अंधेरों से,
ख़ुशी के बाद की तकलीफ से,
भीड़ में अपनी तन्हाई से,
इसलिए अच्छे दिनों में भी
मैं चलती हूँ
हाथ पकड़कर अपनों का
समय
और समय के साथ परिस्थितियां
कब बदल जाए कौन जाने,..
इसलिए
तुमसे नहीं पूछूँगी
*रह लोगे मेरे बिन*
क्योंकि तुमने हां कह भी दिया
तो नहीं रह पाऊँगी मैं
*तुम बिन*
सुनो!
रहना हमेशा तुम साथ
मैं सचमुच खुशियों से डरती हूं,..
संभालना मुझे,..
डरपोक हूँ मैं,...

प्रीति सुराना

Friday, 10 March 2017

जी लूं??

अपने होठों को सी लूं?

सारे आंसू भी पी लूँ?

या है आज इजाज़त ये

मरने से पहले जी लूं????


प्रीति सुराना

Sunday, 5 March 2017

रंग फाल्गुनी बसंत बहार

मौसम में घुला है प्यार ही प्यार,
खुशबू फैलाती शीतल सी बयार,
अब इंतजार बस सजन तुम्हारा,..
छाया रंग फाल्गुनी बसंत बहार
प्रीति सुराना

लाचारी

शोर बहुत है मन के घर में
पीर उठी है ऊंचे स्वर में

मन मानस उलझे आपस में
जाने जीते कौन समर में

टूट गया है मन का आंगन
गम ही गम है मेरे दर में

सड़कों पर दिखती लाचारी
कौन नहीं मजबूर शहर में

साथ नहीं कोई चल पाया
छोड़ गये सब प्रीत डगर में

प्रीति सुराना








Thursday, 2 March 2017

मन की चुभन

हां! *मन की चुभन* बहुत तकलीफ देती है, टीसता है भीतर ही भीतर कुछ बहुत पैना नश्तर  सा जो भावनाओं को लहूलुहान करने की क्षमता रखता है। दरकता है भीतर ही भीतर मानो धरती के नीचे कुछ दरक रहा जो भूकंप का कारण बनता है,.. पर क्या, क्यों, कैसे?? क्या इस चुभन को मिटाने या कम करने का कोई तरीका कोई उपचार नहीं????
बैठी हूँ यही सोचती कबसे, क्रमशः लिखती गई कई बिंदु इस विषय पर।

*क्या है जो चुभता है मन को*
मुझे चुभता है अपने अस्तित्व का नकारा जाना।
मुझे चुभता है मेरे अस्तिवत पर किसी का हावी होना।
मुझे अपनों का पास होकर साथ न होना।
मुझे चुभता है जरुरत पड़ने पर थामे हुए हाथों का छूट जाना।
मुझे चुभता है जब शब्दों की जरुरत हो तभी संवादहीनता का पसर जाना।
मुझे चुभता है जब ख़ामोशी बिखराव को रोक सकती हो तब मुखरता से तिल का ताड़ बन जाना।
मुझे चुभता है किसी के लिए जरिया बनकर उपेक्षित होना।
मुझे चुभता है मेरी मदद करके जताया जाना।
मुझे चुभता है कहकर बिना जवाब सुने चले जाना।
मुझे चुभता है पूछने पर भी जवाब न दिया जाना।
दरअसल हमारे मन के विपरीत कुछ भी होना हमें चुभता है और ऐसी ही अनेकानेक अलग अलग परिस्थितियों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू चुभते हैं।

*पर क्यों चुभते हैं*
इसलिए कि संबंधों में अपेक्षा स्वतःजनित है। इसलिए कि हम अपनी सहूलियतों को प्राथमिकता देते है।
इसलिए कि संबंधों में तन मन धन या जन से संबंधित कोई न कोई स्वार्थ अनिवार्यतः निहित होता है।
इसलिए कि हम स्वीकार नहीं पाते की परजीविता का गुण हममें भी अनुवांशिक है।
हम माने या न माने पर मानव का स्वभाव है कि परिवार समाज या समूह से जुड़ा होता ही है क्योंकि एकाकी जीवन मनुष्य की प्रकृति नहीं है।

*कैसे चुभता है???*
कभी कलह, कभी द्वेष, कभी विद्रोह, कभी एकाकीपन, कभी उत्तेजना, कभी वैमनस्यता कभी असफलता, कभी नकारात्मकता, कभी नैराश्य बनकर पीड़ादायक परिस्थितियों का निर्मित होकर सामने खड़े हो जाना ही चुभता हैं।

*इस चुभन को कम करने के उपचार*
अकसर इस चुभन को कम करने के लिए सलाह मिलती है,.. *अपेक्षा मत करो, स्वावलंबी बनो, आत्मविश्वास बनाए रखो, अपनी राह खुद बनाओ आदि इत्यादि,...*
आंशिक रूप से सहमत हूँ सभी सलाहों से और कोशिश भी करती हूँ अपेक्षाएं काम और आत्मनिर्भरता अधिक हो, आत्मविश्वास बरक़रार रहे, बने बनाए रास्तों की बजाय अपने रास्ते खुद बनाऊं। पर अकसर मैंने महसूस किया कि परिणामस्वरुप हम अपने लिए अकेलापन, विरोध और प्रतिद्वंदिता स्थापित करते चले जाते हैं। ऐसे ही किसी मौके पर मैंने खुद को थोड़ा बदला।
*सबसे पहले मैंने इस चुभन से ध्यान हटाने के लिए खुद को प्रतिपक्ष जिसे मैं चुभन की वजह मानती हूँ उसकी जगह पर खुद को रखकर सोचना शुरू किया।* यकीन मानिए हर बार मैंने परिणाम में कुछ बेहतर ही पाया। हम अकसर अपनी अपेक्षाओं के चलते ये भूल जाते हैं कि सामने वाला उसी परिस्थिति में क्या सोचता है, चाहता है, महसूस करता है। प्रकृति-परिस्थिति, अपेक्षा-उपेक्षा, अनुकूलता-प्रतिकूलता, सबकुछ सिर्फ हमारे व्यवहार के लिए कारक नहीं होते ये सभी के लिए उतने ही उत्तरदायी होते हैं। जैसे ही हम सामने रहकर अपनी बात का अवलोकन करते हैं सबसे पहला असर ये होता है कि हम त्वरित प्रतिक्रिया से बच जाते हैं और जल्दबाजी के दुष्परिणामों से भी। ऐसे में यदि हमारा पक्ष अधिक सही और मजबूत है तो प्रतिक्रिया के ठोस आधार बनाना का समय मिल जाता है और यदि हम प्रतिपक्ष से कमजोर हैं तो खुद को सुधारने और संभालने का अवसर मिल जाता है।
*दूसरी बात मैंने खुद को टटोलने की आदत डाली कि क्या इसी परिस्थिति में मैं जो अपेक्षा करती हूँ वही अपेक्षा यदि मुझसे की जाए तो मैं वही अपेक्षाएं पूरी कर पाऊँगी जो मुझे हैं।* सचमुच चमत्कारिक तरीके से अपने ही व्यवहार में बदलाव महसूस होता है ये सोचते ही।
*तीसरी बात हम अपनों में अपनापन ढूंढते हैं क्योंकि ये हमारा हक़ है तो सारी बातें अपनों से अपेक्षित होनी चाहिए जहां अपनापन न हो वहां किसी भी अपेक्षा की गुंजाईश नहीं होती।* लेकिन यदि किसी को अपना बनाना है तो पहले उसकी अपेक्षाओं पर खरे उतरने की जरुरत है इससे बनने वाले रिश्ते अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत होंगे।
मैंने जो लिखा वो मेरी व्यक्तिगत सोच है जिसे मैंने *अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार* से प्रस्तुत किया लेकिन इसके लिए मेरी ये अपेक्षा कतई नहीं है कि जन मन इस बात से पूरी तरह सहमत हों। बस ये मेरे मन की चुभन को कम करने के लिए अपनाए गए तरीके हैं शायद बता देने से कभी किसी के काम आ जाएं,.. क्योंकि मैं जानती हूँ जब मन में कुछ चुभता है तो मन दुखता बहुत है। पर हर बार इसके लिए दूसरे ही जिम्मेदार नहीं होते।

*चुभन मन की हो जाए कम*
*कर लूँ मैं कुछ ऐसे जतन*
*वरना बिखर जाएंगे रिश्ते*
*फिर बिगड़ेंगे तन और मन* ,... प्रीति सुराना