Wednesday, 20 September 2017

सिर्फ दर्द

गीत ग़ज़ल कविता
शेर छंद या लेख
क्या होता है मेरा लिखा
विधा तो मुझे नहीं पता
पर लिखती हूँ
स्वान्तः सुखाय
*शब्द शब्द में सिर्फ दर्द*
क्योंकि
मेरे पास वही बचता है
अपनी हर खुशी
अपनों से बांट लेने के बाद,..

प्रीति सुराना

Tuesday, 19 September 2017

लोग जलने लगे हैं

जाने क्यों इन दिनों हम इस कदर
सबको को खलने लगे हैं
पलकों पर नमी भी खुशी की हैं
ये सोचकर लोग जलने लगे हैं,...

प्रीति सुराना

कुंठा

आंसू बन अपनी पीड़ा को ढलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो

घाव लगा कोई तो थोड़ा सा रो लो
अपने आंसू से ही घावों को धो लो
घावों को नासूर बना मत गलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो
आंसू बन,..

जलते दुखते टीस भरे मन को थामो
अपना और पराया खुद ही पहचानो
अपना ही मन अपनों को मत छलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो
आंसू बन,..

आघात अगर मन पर कोई दे जाये
सुख का कोई पल भी रास नही आये
शांत रखो मन को यूँ ही मत जलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो
आंसू बन,..

कौन कभी अपनी नियति बदल पाया
जीवन भर कठपुतली सा नाच नचाया
डोर न टूटे काल बुरा ये टलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो
आंसू बन,..

धीरज से लो काम समय ये बदलेगा
हो सकता है थोड़ा और समय लेगा
खेल समय का जैसा भी है चलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो
आंसू बन,..

आंसू बन अपनी पीड़ा को ढलने दो
मन ही मन कोई कुंठा मत पलने दो

प्रीति सुराना

Monday, 18 September 2017

न रखना अब वास्ता

समझकर भी न समझें उसे क्या वाकिफ़ कराना फ़र्ज़ से,
जाओ किया आज़ाद अपने रिश्ते के हर कर्ज़ से
बहुत रोए बहुत तड़पे बहुत की कोशिशें मनाने की
न रखना अब वास्ता कोई मेरे दर्द से या मर्ज़ से,...

प्रीति सुराना

एक कटी पतंग सी मैं

एक कटी पतंग सी मैं

हाँ
एक कटी
छत विछत पतंग
खुश थी
मैं गिरी तुम्हारे ही आंगन में,...
अचानक तब्दील हुई खुशियां
तुम्हें हँसते देखकर आंसुओं में,...

हुई मैं आहत ये देखकर
जिन हाथों के भरोसे
अपनी डोर छोड़ रखी थी
वो हाथ मांजे की धार से
कट जाने के डर से
मांजा नहीं चकरी पकड़े हुए था,
जिसमें लिपटी हुई थी
मेरी जीवन डोर
जो तुमने कभी संभाली ही नहीं
हवा अनुकूल रही इसलिये उड़ती रही मैं,..
और मौसम के बदलते ही मेरा मिट जाना
मेरी नियति नहीं तुम्हारा विश्वासघात था,...

खैर!
मुझे चार कंधों में जाता देख
अनेक आँखे खुलेंगी
ये देखने के लिए कि
प्यार आँखों के होते हुए भी अपने अंधेपन के कारण
ये कभी नहीं देख पाता
विश्वास वहीं टूटता है जहाँ विश्वास होता है
विश्वासघात वहां संभव ही नहीं जहाँ विश्वास न हो,...

सुनो!
अब अंधविश्वास की
कोई नई कहानी मत गढ़ लेना
क्योंकि
विश्वास या तो होता है या नही होता,
इसका आंखों से कोई लेना देना नहीं,
रहने दो तुम,...
मन की बातें तुम्हारा मष्तिष्क नही समझेगा,..
जाओ
तुम्हारी चकरी के शेष मांजे को
इंतजार है एक नई पतंग का,...

प्रीति सुराना

Friday, 15 September 2017

"साथी"

आज का विषय
"साथी"

सुनो!!
साथी हैं हम
इस मुश्किल दौर में
और जारी है
वेदनाओं का सिलसिला
जाने कल
मौका मिला न मिला
न मिला
तो जो समझ लिया
वही सच मान लेना,...

पर
कल रहे तो कहेंगे
कहें तो सुनना
सुनो तो समझना
समझो तो सोचना
फर्क सिर्फ सोच का था
मैं और तुम में फर्क
वजूद की लड़ाई
सवाल ये झुकेगा कौन??
जवाब दोनों के बीच पसरा मौन,
सबकी वजह सिर्फ दृष्टिकोण
बाकि हर बात गौण,..

पर न रहूं
तो गर्व से देखना
सर उठाकर
ऊपर आकाश का
वो सबसे चमकता सितारा
नतमस्तक मुस्कुराता हुआ
छोड़कर अपना दृष्टिकोण
और
अपने भीतर का मैं भी
जो टूटना चाहता है
सिर्फ इसलिये
ताकि तुम ख्वाहिश में
मांग लो वो सबकुछ
जो तुम्हे चाहिए,...

प्रीति सुराना

सनद रहे मैं कमज़ोर नही हूँ,...

सनद रहे
मैं कमज़ोर नही हूँ,...
क्योंकि
जब तक रिश्ते मेरी कमजोरी हैं
तब तक रिश्तों की ख़ातिर
कुछ भी कर गुजरने की ताकत है मुझमें,..
पर जिस दिन रिश्ते कमज़ोर हुए
उस दिन उस पल यकीनन
जिंदगी में सब कुछ अस्त व्यस्त ध्वस्त,....
प्रीति सुराना

Thursday, 14 September 2017

बुनावट

मजबूत बुनावट वाला एक रिश्ता ढूंढ रही हूं
खूबसूरत बनावट वाले रिश्ते तो खूब मिले,...
प्रीति सुराना

लक्ष्य पूरा कर

हाँ!
मुझे ज्यादा
सुख-सुविधाओं की आदत नही है
मैंने अपने घर की
चाहरदीवारी में
रजनीगंधा, रातरानी ,
गुलमुहर या पलाश नही लगवाए,...

अकसर गुजरती हूँ
जब ऐसे मकानों के बाहर से
खुशबू के झोंके मुझे भी ललचाते हैं
पर उन्हीं घरों में लोग चैन से नही सोते
करवटें बदलते रात बिताते हैं,..
हर मौसम में कुछ खो जाने के
कुछ लुट जाने के डर से,..

मैंने बो रखे हैं अपने ही आसपास बबूल
जिसके कांटे बिंधते है
पल प्रतिपल मेरे मन को
और याद दिलाते हैं
खुशबू से ललचाकर कोई लुटेरा
लूट ले जाए खुशी
या फूलों की सेज पर गहरा जाए आलस्य,...

उससे बेहतर
उठ,...चल,...भूल जा दर्द सारे
निकाल फेंक फिलहाल चुभे सारे कांटे
बहुत सारी जिम्मेदारियां है आज
भागने की आदत नहीं इसी पर कर नाज
अभी तो लक्ष्य पूरा कर फिर कभी सोचेंगे
इस चुभन की दवा और इस दर्द का इलाज,...

प्रीति सुराना

"रोओगे जब भी खोओगे"

"रोओगे जब भी खोओगे"

सुनो!!
मिलने से साथ चलने तक का
एक एक लम्हा
जिंदगी होता है
जो सुख देता है
सिर्फ जिंदगी को,..

क्योंकि
जब सुख होता है
तब सिर्फ सुख याद होता है
कहाँ याद होता है
कुछ और
सिवाय सुखद साथ के???

और
साथ चलने से
साथ छूटने तक के सफ़र को
शायद मौत कहते हैं
मौत वो सच्चाई
सब अनदेखा करते है,..

साथ छोड़ने वाला
आख़री उम्मीद तक
आख़री विश्वास तक
आख़री सांस तक
आख़री धड़कन तक
आखरी दम तक,...

शरीर और मन को ही नहीं
आत्मा को भी
पल-पल
तिल-तिल
मारता ही जाता है
मारता ही जाता है,..

दुख की कालिमा में,
नहीं महसूस होता
क्रूरतम व्यवहार,
जो किसी के अस्तित्व की
मृत्यु की वजह बन जाता है
बिना पूर्वानुभूति के,...

इसलिए अध्यात्म कहता है
अकेले चलो
बेसहारा चलो
अपने एक हाथ की आदत
दूसरे हाथ को भी मत डालो
"रोओगे जब भी खोओगे"

कुछ नही होने का दर्द
आदत बन जाएगा
पर खोने का दर्द मौत
इसलिए ज़ियों तो अकेले
मरो तो बस मर जाओ
साथ की लत से मत मरो,...

प्रीति सुराना

Wednesday, 13 September 2017

मदारी का खेल

कभी मदारी का खेल देखा है??
बंदर मार खा खाकर
इतना सीख जाता है
कि
मदारी के इशारों पर नाचने लगता है,
उसे लगता है
यही प्यार है
उसका
जिसे वो अपना मालिक
और
अपना सबकुछ समझता है।
रिश्तों में अतिभावुकता
और
अति विश्वास और समर्पण
इंसान को वही बंदर बना देता है
और जिससे हमें प्रेम हो उसे
*मदारी*
मदारी लाख दुख पहुंचाए
न बंदर भगता है
न उबता है
इसे ही अपनी नियति मानकर
मदारी के इशारों पर
दिखाता है तमाशे
दुनिया को,..
कितने ही रिश्ते होंगे
हमारे ही आसपास ऐसे ,...
हो सकता है
हम खुद भी जी रहे हो
दुनियादारी की खातिर,
दिखावे की खातिर
या
अपनी
बेवकूफियों की खातिर,....
ऐसा ही कोई रिश्ता

जस्ट लाइक अ इमोशनल फूल
पर हिम्मत नही कि कर लें कबूल,....

प्रीति सुराना

फीलिंग लाइक नाच मेरे बंदर तुझे पैसा मिलेगा,.... 🤣🤡😭🤔🤗😔😡⚠

Tuesday, 12 September 2017

समर्पण

                     समर्पण
         दृष्टि सभी के पास है। कोई सिर्फ आंखों से, कोई मन की आंखों से , कोई मष्तिष्क की आंखों से देखता है। आंखों का देखना दूरदृष्टि या निकटदृष्टि से प्रभावित होता है, मन से देखना संवेदनाओं से प्रभावित होता है और मष्तिष्क से देखना व्यवहार से प्रभावित होता है।
         वस्तु, परिस्थिति और विषय सिर्फ समय और आवश्यकता ही नहीं अपितु विवेक से भी अलग-अलग पात्र के लिए अलग-अलग रूप भाव और महत्व का निर्माण करती है। बस भेद इतना ही होता है किसी बात को किस तरह से देखा जा रहा है।
        इस संकलन में प्रस्तुत है कुछ सामाजिक, पारिवारिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों में मेरा 'दृष्टिकोण'
         हांलाकि समय की लाठियाँ अनुभवों के कई नए सबक देकर सोच में, भाषा में, शैली में, प्रस्तुतिकरण में कई बदलाव लाती है, पर संवाद शैली में लिखे गए सारे आलेख एक संकलन के रूप में बिना किसी परिवर्तन के जैसा का तैसा स्मृतियों में संजोने भर के लिए नहीं बल्कि अपनी सोच अपनों के सामने बिना बनावट या नवीन साज सज्जा के समर्पित कर रही हूं। आशा है आप सभी का आशीर्वाद और मंथन से निकला नवनीत समीक्षा के रूप में प्राप्त होगा।

प्रीति समकित सुराना

सोशल मीडिया

आज सोशल मीडिया ने ये बताया
आप सबसे मैंने कितना प्यार पाया
आभार पसंद के लिए क्षमा भूलों के 
निवेदन बना रहे अपनेपन का साया

प्रीति सुराना

पहिया

सुनो!

मैंने हर रिश्ते को
दो पहियों पर चलते देखा है,
एक पहिया साथ न चले तो रिश्ता
या रुकता है या खिंचता है,

रुका
तो जिंदगी भर खोने का दर्द
खिंचा
तो पल-पल ढोने का दर्द

और दोनों में समानता ये
दोनों ही पहियों को रुलाता है ये दर्द
बस कोई आंखों से बहा देता है
कोई सीने में दफन कर लेता है

पर ऐसे हर रिश्ते का
हासिल तय है
ये दर्द
तो समझो न !!!

कुछ तुम कुछ मैं मिलकर
बिना रोये बिना ढोए,
मिटाकर दर्द
चलें मंजिल की ओर,...साथ साथ

प्रीति सुराना

मरहम

*ठोकरों* ने सिखा दिया आंसू मत बहा खुद ही मरहम लगा,
जिस पत्थर से लगी है चोट उस पत्थर को रास्ते से उठा,
तुझे तो लगा ही है घाव पर कोई और न हो जाए घायल,
अगर पत्थर रखने वाले का पता है तो उसे भी रास्ते से हटा,..

प्रीति सुराना

एक संपादक नही एक इंसान की नज़र से

आज चलन है fb की रचनाओं के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में संपादक खुद चयन कर लेता है, पर अफसोस तब होता है जब अच्छी रचनाएँ कई बार इसलिए प्रकाशन से वंचित रहती हैं क्योंकि लोग अपना dp नही लगाते,..
        परिवार है मित्र हैं , सिक्योरिटी के ऑप्शन्स हैं फिर भी अपने ही चेहरे से परहेज? वो भी इसलिए की कहीं कुछ गलत न हो जाए।
         बच्चे, स्त्री, और आम आदमी की सुरक्षा की कोई गारंटी नही कम से कम अपनों के भरोसे की वारंटी पर तो जी लो अपने चेहरे के साथ।
         दुर्घटनाएं सावधानी से टाली जा सकती है और खुशफहमियां तो गलतफहमी में भी पाली जा सकती है। तो फिर डर डर कर क्यों लड़कर हालातों से, हँसकर फेसबुक पर फेस दिखाकर मुस्कान को चिकनगुनिया से ज्यादा संक्रामक बनाकर देखो।
      अच्छा लगेगा, सच का सामना दिल से। और बुरी शक्ल के साथ सबके सामने आती हूँ तो यकीनन dp न लगाने वाले तो खूबसूरत चेहरे होंगे।
       अगली मुहीम यही हो कि जहां भी आई डी बने कुदरत का दिया उपहार यानि अपने चेहरे के साथ, पूरे आत्मविश्वास से न कि फूल पत्तों और अन्य साज सज्जा से छुपा बनावटी चेहरा हो।
आज के लिए इतना ही।
शुभरात्रि🙏🏼

बारी

सफर जिंदगी का अभी तो जारी है
पता नही किस पल किसकी बारी है
याद रखना मुझे मेरे बाद मेरे दोस्तों
हर रिश्ते में दोस्ती और दोस्ती जान से प्यारी है

प्रीति सुराना

रिश्वत


        सुहानी आज भ्रष्टाचार विरोधी संस्था के अध्यक्ष मुरारी जी रिश्वत लेते हुए रेंज हाथों पकड़े गए, शहर में हंगामा है, कर्फ्यू भी लग सकता है आज राहुल को स्कूल मत भेजो, और में भी छुट्टी ले रहा।
राहुल की तो चांदी हो गई है पर सवालों की  झड़ी ने सुहानी की क्लास लगा दी।
"मम्मी ये भ्रष्टाचार क्या होता है?"
सुहानी टालने वलए अंदाज़ में बोली "गलत काम"
"रिश्वत मतलब??"
"गलत काम करवाने के लिए किसी को पैसे या गिफ्ट देना"
और कर्फ्यू??
"और ये कर्फ्यू क्या होता है?"
सडकपर आना जाना बंद क्योंकि आज इसके विरोध में बहुत तोड़फोड़ और हंगामा होगा।
"ओह अब समझा।"
ये कहकर वो बगल में चाचा के घर खेलने चला गया।
          दो दिन बाद रविवार सुबह-सुबह राहुल कुछ सहमा सा भागता हुआ आया और चुपचाप अपने कमरे में जाकर सो गया।
सुहानी-शेखर को अजीब लगा, दोनों कमरे में पहुँचे , उसे छूकर देखा बुखार तो नही था।
       शेखर ने पास बैठकर पूछा क्या हुआ?? पहले तो राहुल झिझका फिर कहा आज चाचा के घर मत जाना कर्फ्यू लगा है??
"क्या हुआ बताओ तो?" सुहानी घबराकर बोली।
          चाचा दादी के पोटली छीन रहे थे, दादी रो रही थी कि दादाजी की की एक निशानी ये अंगूठी में नही दूंगी। चाचा गुस्से में चिल्ला रहे थे और समान तोड़ रहे थे कह रहे थे बुढ़िया को बच्चे की देखभाल के लिए साथ रखा आज ही वृद्धाश्रम भेज दूंगा।
             मैंने ये भ्रष्टाचार देख लिया तो चाची ने चॉकलेट दी और कहा किसी से मत कहना।
"मैंने वो रिश्वत नही ली माँ-पापा। मुझे जेल नही जाना।"
राहुल जोर से सुहानी से लिपट गया।

भ्रष्टाचार की जड़ें घरों से समाज मे फैली ये बात मान में पुख्ता हो गई।

प्रीति सुराना

आराम

आगाज़ को अब अंजाम चाहिए
सफर को बस विराम चाहिए
थक गया है दुखते दुखते
इस मन को भी आराम चाहिए

प्रीति सुराना