Sunday, 28 May 2017

मुश्किल

अंतस में रख पाना मुश्किल,
राज लबों तक लाना मुश्किल।

राग सुनाएं गम का किसको,
बहुत कठिन ये गाना मुश्किल।

धूप बहुत है सावन बीता,
छांव घटा की छाना मुश्किल।

सुख की राह बहुत कंटीली,
मंजिल तक है जाना मुश्किल।

लौट चलें फिर घर तक वापस,
इतना साहस आना मुश्किल।

आ भी जाएं बीच सफर से
सुनना सबका ताना मुश्किल।

सब कुछ मिलता है किश्तों में,
मिलना अन्न का दाना मुश्किल।

काम भला कितना भी कर लो,
सबके मन को भाना मुश्किल।

प्रीत सभी के मन में बसकर,
जीवन पार लगाना मुश्किल।

प्रीति सुराना

आ गई रात चांद तारों की...

आ गई रात चांद तारों की,
याद है साथ आज वादों की,

प्यार की बात प्यार के लमहे,
और सौगात रात नगमों की।

गीत छेड़े वही सभी जिसमें,
बात मुझसे जुड़े सवालों की।

आज रोके नही रुके आंसू,
फिर हुई बात बस मुरादों की।

चोंट का दर्द नही रहा लेकिन,
है जलन आज भी खराशों की।

छोड़ आए शहर गुलों के पर,
आ गई साथ चुभन कांटों की।

प्रीत कसमें भुला सको सारी,
है दुआ आज राजदारों की,...

प्रीति सुराना

Saturday, 27 May 2017

कह मुकरी

पीड़ा मुझसे न सही जाए
उस बिन इक पल चैन न आए
कोई खुशी भी रास न आई
क्या सखि साजन? न री दवाई।।

सर पर लेकर घूमूं अकसर
या काम करुं कमर पर कसकर
साथ बिना लांघूं न देहरी
क्या सखि साजन?? न सखि चुनरी।।

बेरुखी

निकालो वक्त कभी कि
             सुन सको मेरी परेशानी
क्यों रहती है सिलवटों भरी
             अकसर मेरी पेशानी,
छोड़कर मिलो मुझसे
             अपनी बेरुखी कुछ पल,
ये यादें बन जाए शायद
             बाद मेरे मेरी निशानी।

प्रीति सुराना

सच पत्थरों को लगता है,..

पत्थर को लगता है
बहुत मजबूत है
किसी को भी
चोट पहुंचा सकता है
इसलिए
उससे डरकर लोग कुछ पत्थरों को
भगवान का रूप देकर पूजने लगते है
पर
चोट यदि कर्मफल ही हो
तो कैसे भी मिलेगी ही
फिर शुरू होगा
अपने ही बनाए भगवान को
पत्थर कहकार कोसना,...
जो पत्थर
ज्यादा कठोर होते हैं
और छेनी हथौड़ी की मार
नही सह पाते
वो खंडित होकर पड़े होते हैं
ठोकरों में
जब तक ठोकरों से ज्यादा
पत्थर कठोर हो
तब तक
बार-बार चोट देते हैं
पर एक वक्त के बाद
वह भी कमजोर होकर
टूटकर
रेत-रेत होकर बिखर जाते है...
फिर
जाने कौन सी नदी बहा ले जाए
या कौन सी हवा उड़ा ले जाए
अंततः
खत्म कठोर पत्थर का वजूद,..
काश
होता पत्थर भी मोम का,.
टूटकर, पिघलकर, जलकर
रहता किसी भी आकृति में मोम ही
मुलायम और मौलिक,..
काश
हम सीख पाते
पत्थर नही मोम बनना,..
ठोस होकर भी
बिखरने से बेहतर
पिघलकर नए रूप में ढलकर
अपने वजूद को बचा पाते,...
सुनो
पत्थर दिलों
अभी भी वक़्त है
बन जाओ मोम,...

प्रीति सुराना

Thursday, 25 May 2017

बहने दो जिंदगी को

बहने दो जिंदगी को, 
रुकी
तो बहने वाले आंसू कौन पोंछेगा।
दर्द कोई नही देखेगा,
और
उस पर सवाल कई पूछेगा,... प्रीति सुराना

नाता

तुझसे जाने कैसा है नाता
ये मन राधा जैसा इतराता
स्वीकार समर्पण तुझको हो तो
मन भी वृंदावन सा हो जाता,.. प्रीति सुराना

रब रूठ गया

जो था अपना सब छूट गया
हालात कठिन रब रूठ गया।

बचपन यौवन सपनें यादें
कोई अपना ही लूट गया।

प्यासा मन मांगे कुछ शीतल
भीतर जहरीला घूंट गया।

सच को ढूंढ रहे थे दर दर
लेकिन था पकड़ा झूठ गया।

सजते दीवारों पर सपनें
वो घर तो मेरा टूट गया।

कांटे राहों में बाकी हैं
गुलशन उजड़ा रह ठूंठ गया।

खार जड़ो में डाला ऐसा
प्रीत सुफल भी सूख गया।

प्रीति सुराना

मंजूर

यारी है उन फूलों से मेरी
सुख से भर देते जो क्यारी
बन कंटक जो पाठ पढ़ाते
मंजूर चुभन जो हितकारी

प्रीति सुराना

नई कोपलें

मौसम फिर से बदलेंगे,
नई कोपलें फिर फूटेंगी,
आज सहें चुभन कांटों की
कल फिर सुंदर सेज सजेंगी,.. प्रीति सुराना

*किसी से हुई पहली लड़ाई या मनमुटाव : कारण और निवारण*

आज अंतरा में गद्य का शीर्षक

*किसी से हुई पहली लड़ाई या मनमुटाव : कारण और निवारण*

सबसे पहली बात मेरे अपने जिनसे मेरा सच्चा रिश्ता है आभासी नही वो ये जानते हैं मैं स्वभाव से बहुत तेज़, गुस्से वाली और ज़िद की पक्की हूँ। जो बहुत ज्यादा करीब हैं वो ये भी कहते हैं तुम्हे बस लड़ना होता है मैं नही तो वो, वो नही तो कोई और,...। फिर पहली बात कब लड़ी ये याद रखना संभव नही क्योंकि *बुरे पलों की गांठ बांधी नही कभी, अच्छे लम्हों की तारीखें याद रहती है क्योंकि वो मेरी संचित ऊर्जा का स्रोत होती हैं जो निराशा के पलों में या किसी असहनीय दर्द को सहने में सहायक होती हैं।* ऐसा भी नही की सबकुछ भूल गई, मुझे दर्द याद रहते हैं तभी तो टीसते हैं पर जेहन पर जोर डालने पर भी तारीखें अक्सर खुशियों की याद आती है या फिर हादसों की,..
झगड़े को हादसा कभी बनने ही नही दिया इसलिए दर्द, चोटें, टीस सब याद है पर दर्द की तारीखें नही।
          यकीनन मेरे अपने ये भी जानते हैं कि न मैं बेवजह किसी से न संवाद रखती न किसी से विवाद। जब भी किसी से लड़ी हूँ किसी सही बात को सही साबित करने तक क्योंकि शुरू से गलत को स्वीकार लेना स्वभाव में नही रहा। गलत सहकर मौन वहीं धरा जब कोई अपनेपन की उस श्रेणी तक नहीं शामिल हुआ जो मेरे मन तक पहुंचे। मेरा सीधा सा फंडा जो मेरा है उसी पर मेरा अधिकार है जो दूसरे हैं उनसे किसी बात पर उलझ तो सकते है पर जो मन से जुड़ा ही नही तो मनमुटाव कैसा? वो अपने रास्ते हम अपने रास्ते।
        फ़ेसबुक और व्हाट्सअप पर मेरा पूरा परिवार है (मायका और ससुराल), मेरे स्कूल के मित्र हैं, साहित्यिक मित्र हैं, मेरे नगर के लोग हैं, इस आभासी दुनिया से मिले उंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद रिश्ते जो मेरी पूंजी हैं। और सभी जानते हैं कि मैं कब लड़ती हूँ किनसे लड़ती हूँ। जिनसे संवाद है विवाद भी उन्ही से है और अधिकार वहीं जहां अपनत्व । लगभग 5000 लोगों की मित्र हूँ, 13000 फॉलोवर्स हैं जो गवाह हैं कि संवाद या इनबॉक्स चैटिंग किसी अपरिचित से साहित्य के अलावा hi/hello का जवाब भी नही , किसी साहित्यिक गतिविधि से जुड़ी किसी भी बात का सीमित शब्दों में जवाब के अलावा में अपने रिश्तेदारों से भी चैटिंग पर बात नही करती जब तक बहुत आवश्यक न हो। जो बातें है वो सार्वजनिक मंच पर खुले तौर पर हैं। और *मेरी बात उन्ही से होती है जिनसे सीधे संवाद का अधिकार हो* खासकर वो जो वास्तविक जिंदगी में मुझसे मिले हों अजनबियों से एक फ़ासला हमेशा बनाए रखा ।
      जब मन मिले तो विचारों के आदान प्रदान हो, और विचार जाने तो मतभेद होने भी स्वाभाविक है पर *मनभेद बहुत पीड़ादायक अवस्था* जो कभी किसी से मेरी तरफ से नही होता। यकीन मानिए गुस्से में कही हर बात का मुझे सबसे ज्यादा दुख होता है, कोई अपना मुझसे नाराज रहे ये बर्दाश्त के बाहर है। भले ही बेवजह गलती मानकर माफी मांगनी पड़ी हो पर अबोलापन मुझसे कभी सहन नही हुआ। पारिवारिक रिश्तों में भी कई बार मतभेद होता है कोई मुझे ये समझाए कि जाने दे मन पर मत ले तब भी मेरा जवाब यही होता है कि नही लूंगी मन पर जिस दिन मान लूंगी कि वे पराए हैं। *जब तक अपने हैं हर बात का मन पर गहरा असर होगा।*
         मैं गुस्सा करती हूं उसका सबसे ज्यादा असर मुझपर होता है। मेरी शारीरिक मानसिक वेदनाओं ने मुझे चिड़चिड़ा बना दिया है पर सच मानिए मेरी लड़ाई सिर्फ मुझसे,... । *मैं कोशिश करती हूं मोह के धागों को लपेट लूं अपने मन के चरखे पर। जितना खुलेंगे उतना उलझेंगे और जितना सुलझाने की कोशिश करो उतना ही टूटने का डर,.. उतना ही दर्द।* मतभेदों से परे मनभेद किसी से नही, दुश्मनी किसी से नही। अपनों का बुरा तो दूर की बात कभी किसी पराए को भी जानबूझ कर नुकसान पहुंचाने की भावना मन मे नहीं आने दी। अनजाने में  किसी को ठेस लगाई भी तो अंतर्मन हमेशा रोया है।
        किसी खरी खरी बात के लिए जब जब अपनों से लड़ती हूँ, यहां तक कि बच्चों के भले के लिए बच्चों को भी डांटा है तो *अंतरद्वंद सहती हूँ, मंथन और उद्वेलन की पीड़ा सहती हूँ।* कभी किसी को जाने या अनजाने दुख पहुंचाकर खुश रहना कभी भी नही आया। सबसे बड़ा दुख ये सब कुछ सिर्फ अपनो के साथ, नितांत अपनों से झगड़ कर खुश रहना सीख ही नही पाई।
          *ज्यादा परिचय के बीच कम रिश्ते रखना तो आया मुझे पर रिश्तों के बीच निर्लिप्त रहना नही सीख पाई* क्योंकि सच का हारना नही सह पाती। पर जानती हूं अपने ही शरीर के कई हिस्सों जैसे दिल दिमाग पर नियंत्रण रखना हमारे बस में नही होता तो खुद जुड़े रिश्तों को अपनी सोच से नियंत्रित करना असंभव है और इसी बात को महसूस करते हुए हर बार शुरू होती है खुद से खुद की वो लड़ाई जो आज तक जारी है। *न खुद हारी न मेरा 'मैं' हारा।*
     *कारण मोह* निवारण जिस दिन मिल सका और बताने की हालत में रही जरूर बताऊंगी। फिलहाल जिनसे औपचारिक परिचय है उनसे क्षमायाचना की संवाद नही किया ताकि विवाद कभी न हो। जो अपने हैं उनसे क्षमायाचना की उनपर अपनी सोच लादने की कोशिश की और कभी भी पीड़ा पहुँचाई हो तो दिल से शर्मिंदा हूँ और मतभेदों के चलते मन से दूर मत करियेगा यही याचना है।
       *मेरी लड़ाई सिर्फ मुझसे*, मेरी दुश्मनी भी सिर्फ मुझसे और मनमुटाव भी सिर्फ मेरे मन से बाकी सब कुछ सिर्फ तात्कालिक प्रतिक्रिया जो गलत लगा वो कहकर भूल गई। नही भूल पाती तो सिर्फ अंतर्द्वंद, और ये भी जानती हूं मोह के फंदे ही कारण जो रहेंगे अंतिम सांस तक,.. यानि *निवारण अंतिम सांस* क्योंकि दुनिया मे रहकर पूर्णतः विरक्त होना मेरे लिए संभव नही।

*सतत एक चिंतन*

अंतर्द्वंद इस मन का
मुझे जाने न दें आगे
जितना रोकूं खुद को
मन उतना ही भागे।
अपनों से ही उलझे
अपनपना भी मांगे
कोई जतन बतलाओ
जो अंतर्मन ये जागे।
न बैर भाव मैं बांधूं
न दाग द्वेष का लागे
तोड़ सकूं बस इक दिन
ये मोह-मोह के धागे,...

प्रीति सुराना

कैंसर अब लाइलाज़ नही है,...

तीखी सी टीस
जो किसी से भी
साझा न की जा सके
और
छुपाते छुपाते
ले लेती है
एक गंभीर रोग का रूप
फिर जांच-परीक्षण
शरीर पर बार बार
*कांटे* सी चुभती सुई की नोंक
दवाओं से शरीर में होने वाली जलन
जुबान पर मानों उढेल दिया हो
मनभर *खार*
कैमरा, रेडिएशन लाइट्स,
दर्द के पल पल की रिकार्डिंग
कम होती क्षमताएं
बिखरते हुए सपने
क्षीण होता तन
टूटता हुआ मन
लुटता हुआ धन
अपनी ही आंखों के सामने
मिटता हुआ एक इंसान,..
हाँ
पहले होती थी दहशत
सुनकर नाम भी बीमारी का,..
लेकिन
अब चारों तरफ फैले दिखते हैं
मनोरोगियों, अपराधियों, बलात्कारियों, भष्टाचारियों के हाथों
रोज मरते रिश्ते,
रिसते हुए नासूर,
तड़पती हुई भावनाएं,
जिंदा लाश जैसी जिंदगियां
और इन सबको देखते हुए लगता है
समाज मे फैली विकृतियों के विषाणु
कैंसर के कीड़ों से भी ज्यादा
पीड़ादायक है,..
बड़े बड़े विशेषज्ञों ने किए प्रयास
ढूंढने का इलाज़ वैचारिक विकृतियों का,..
अंततः
आसान लगा शरीर के कैंसर का इलाज ढूंढना,..
सुना है
कैंसर अब लाइलाज़ नही है,...
लाख तकलीफों के बाद भी
ठीक होने की तमाम संभावनाएं जिंदा हैं,...

प्रीति सुराना

Be aware for breast cancer

*किसी से हुई पहली लड़ाई या मनमुटाव : कारण और निवारण*

आज अंतरा में गद्य का शीर्षक

*किसी से हुई पहली लड़ाई या मनमुटाव : कारण और निवारण*

सबसे पहली बात मेरे अपने जिनसे मेरा सच्चा रिश्ता है आभासी नही वो ये जानते हैं मैं स्वभाव से बहुत तेज़, गुस्से वाली और ज़िद की पक्की हूँ। जो बहुत ज्यादा करीब हैं वो ये भी कहते हैं तुम्हे बस लड़ना होता है मैं नही तो वो, वो नही तो कोई और,...। फिर पहली बात कब लड़ी ये याद रखना संभव नही क्योंकि *बुरे पलों की गांठ बांधी नही कभी, अच्छे लम्हों की तारीखें याद रहती है क्योंकि वो मेरी संचित ऊर्जा का स्रोत होती हैं जो निराशा के पलों में या किसी असहनीय दर्द को सहने में सहायक होती हैं।* पर यकीनन मेरे अपने ये भी जानते हैं कि न में बेवजह किसी से न संवाद रखती न किसी से विवाद। जब भी किसी से लड़ी हूँ किसी सही बात को सही साबित करने तक क्योंकि शुरू से गलत को स्वीकार लेना स्वभाव में नही रहा। गलत सहकर मौन वहीं धरा जब कोई अपनेपन की उस श्रेणी तक नहीं शामिल हुआ जो मेरे मन तक पहुंचे। मेरा सीधा सा फंडा जो मेरा है उसी पर मेरा अधिकार है जो दूसरे हैं उनसे किसी बात पर उलझ तो सकते है पर जो मन से जुड़ा ही नही तो मनमुटाव कैसा? वो अपने रास्ते हम अपने रास्ते।
        फ़ेसबुक और व्हाट्सअप पर मेरा पूरा परिवार है (मायका और ससुराल), मेरे स्कूल के मित्र हैं, साहित्यिक मित्र हैं, मेरे नगर के लोग हैं, इस आभासी दुनिया से मिले उंगलियों पर गिने जा सकने वाले चंद रिश्ते जो मेरी पूंजी हैं। और सभी जानते हैं कि मैं कब लड़ती हूँ किनसे लड़ती हूँ। जिनसे संवाद है विवाद भी उन्ही से है और अधिकार वहीं जहां अपनत्व । लगभग 5000 लोगों की मित्र हूँ, 13000 फॉलोवर्स हैं जो गवाह हैं कि संवाद या इनबॉक्स चैटिंग किसी अपरिचित से साहित्य के अलावा hi/hello का जवाब भी नही , किसी साहित्यिक गतिविधि से जुड़ी किसी भी बात का सीमित शब्दों में जवाब के अलावा में अपने रिश्तेदारों से भी चैटिंग पर बात नही करती जब तक बहुत आवश्यक न हो।
*मेरी बात उन्ही से होती है जिनसे सीधे संवाद का अधिकार हो* खासकर वो जो वास्तविक जिंदगी में मुझसे मिले हों अजनबियों से एक फ़ासला हमेशा बनाए रखा ।
      जब मन मिले तो विचारों के आदान प्रदान हो, और विचार जाने तो मतभेद होने भी स्वाभाविक है पर *मनभेद बहुत पीड़ादायक अवस्था* जो कभी किसी से मेरी तरफ से नही होता। यकीन मानिए गुस्से में कही हर बात का मुझे सबसे ज्यादा दुख होता है, कोई अपना मुझसे नाराज रहे ये बर्दाश्त के बाहर है। भले ही बेवजह गलती मानकर माफी मांगनी पड़ी हो पर अबोलापन मुझसे कभी सहन नही हुआ। पारिवारिक रिश्तों में भी कई बार मतभेद होता है कोई मुझे ये समझाए कि जाने दे मन पर मत ले तब भी मेरा जवाब यही होता है कि नही लूंगी मन पर जिस दिन मान लूंगी कि वे पराए हैं। *जब तक अपने हैं हर बात का मन पर गहरा असर होगा।*
         मैं गुस्सा करती हूं उसका सबसे ज्यादा असर मुझपर होता है। मेरी शारीरिक मानसिक वेदनाओं ने मुझे चिड़चिड़ा बना दिया है पर सच मानिए मेरी लड़ाई सिर्फ मुझसे,... । *मैं कोशिश करती हूं मोह के धागों को लपेट लूं अपने मन के चरखे पर। जितना खुलेंगे उतना उलझेंगे और जितना सुलझाने की कोशिश करो उतना ही टूटने का डर,.. उतना ही दर्द।* मतभेदों से परे मनभेद किसी से नही, दुश्मनी किसी से नही। अपनों का बुरा तो दूर की बात कभी किसी पराए को भी जानबूझ कर नुकसान पहुंचाने की भावना मन मे नहीं आने दी। अनजाने में  किसी को ठेस लगाई भी तो अंतर्मन हमेशा रोया है।
        किसी खरी खरी बात के लिए जब जब अपनों से लड़ती हूँ, यहां तक कि बच्चों के भले के लिए बच्चों को भी डांटा है तो *अंतरद्वंद सहती हूँ, मंथन और उद्वेलन की पीड़ा सहती हूँ।* कभी किसी को जाने या अनजाने दुख पहुंचाकर खुश रहना कभी भी नही आया। सबसे बड़ा दुख ये सब कुछ सिर्फ अपनो के साथ, नितांत अपनों से झगड़ कर खुश रहना सीख ही नही पाई।
          *ज्यादा परिचय के बीच कम रिश्ते रखना तो आया मुझे पर रिश्तों के बीच निर्लिप्त रहना नही सीख पाई* क्योंकि सच का हारना नही सह पाती। पर जानती हूं अपने ही शरीर के कई हिस्सों जैसे दिल दिमाग पर नियंत्रण रखना हमारे बस में नही होता तो खुद जुड़े रिश्तों को अपनी सोच से नियंत्रित करना असंभव है और इसी बात को महसूस करते हुए हर बार शुरू होती है खुद से खुद की वो लड़ाई जो आज तक जारी है। *न खुद हारी न मेरा 'मैं' हारा।*
     *कारण मोह* निवारण जिस दिन मिल सका और बताने की हालत में रही जरूर बताऊंगी। फिलहाल जिनसे औपचारिक परिचय है उनसे क्षमायाचना की संवाद नही किया ताकि विवाद कभी न हो। जो अपने हैं उनसे क्षमायाचना की उनपर अपनी सोच लादने की कोशिश की और कभी भी पीड़ा पहुँचाई हो तो दिल से शर्मिंदा हूँ और मतभेदों के चलते मन से दूर मत करियेगा यही याचना है।
       *मेरी लड़ाई सिर्फ मुझसे*, मेरी दुश्मनी भी सिर्फ मुझसे और मनमुटाव भी सिर्फ मेरे मन से बाकी सब कुछ सिर्फ तात्कालिक प्रतिक्रिया जो गलत लगा वो कहकर भूल गई। नही भूल पाती तो सिर्फ अंतर्द्वंद, और ये भी जानती हूं मोह के फंदे ही कारण जो रहेंगे अंतिम सांस तक,.. यानि *निवारण अंतिम सांस* क्योंकि दुनिया मे रहकर पूर्णतः विरक्त होना मेरे लिए संभव नही।

*सतत एक चिंतन*

अंतर्द्वंद इस मन का
मुझे जाने न दें आगे
जितना रोकूं खुद को
मन उतना ही भागे।
अपनों से ही उलझे
अपनपना भी मांगे
कोई जतन बतलाओ
जो अंतर्मन ये जागे।
न बैर भाव मैं बांधूं
न दाग द्वेष का लागे
तोड़ सकूं बस इक दिन
ये मोह-मोह के धागे,...

प्रीति सुराना

Tuesday, 23 May 2017

विषय:- गोकुल-वृंदावन-बरसाना-मथुरा

विषय:- गोकुल-वृंदावन-बरसाना-मथुरा

न तो मैं बरसाने की राधा,न है तू मथुरा का वासी।
न यमुना के तीर बसे हम, वृंदावन या गोकुल के वासी।।

प्रेम है राधाकृष्ण सरीखा,
और समर्पण भी मीरा सा,
हौले हौले पीना है जिसको,
वो विरह वेदना लगे गरल सी।
न तो मैं बरसाने की राधा,न है तू मथुरा का वासी।

हर गोपी के पास है कान्हा,
जिसको अपना जीवन माना,
फिर भी हंसकर रास रचाती
सुख ये भी तो है आभासी।
न तो मैं बरसाने की राधा,न है तू मथुरा का वासी।

मैंने भी स्वीकार किया अब
तुझमें ही ये मन रमता है
क्या करना अब तीरथ सारे
तुझमें मथुरा वृंदावन काशी।
न तो मैं बरसाने की राधा,न है तू मथुरा का वासी।

गोपियाँ मीरा राधा सबने
प्रेम आस्था और भक्ति की
अमरप्रेम के अमिट उदाहरण
बने समर्पण के परिभाषी।
न तो मैं बरसाने की राधा,न है तू मथुरा का वासी।

बस इतना ही स्वप्न संजोया,
ये मन तेरी ख़ातिर रोया,
तू पाए खुशियां जीवनभर,
प्रेम मेरा हो तभी अविनाशी।
न तो मैं बरसाने की राधा,न है तू मथुरा का वासी।
न यमुना के तीर बसे हम,वृंदावन या गोकुल के वासी।।

प्रीति सुराना

Monday, 22 May 2017

दर्पण ढूंढ रही

इलज़ाम लगाते औरों पर
है ऐब बहुत सबके भीतर
कबसे वो दर्पण ढूंढ रही
झांक सके जो मन के अंदर

स्वार्थ निहित जो जिसमें मेरा
संबंध नही ऐसे रखती
जो संबंध मिले किसमत से
उनसे द्वंद नहीं रखती
मुझको फर्क नही पड़ता है
कैसा माहौल बना बाहर

कबसे वो दर्पण ढूंढ रही
झांक सके जो मन के अंदर

आगे बढ़ते लोगों को मैं
पीछे न कभी खींचा करती
साथ जिसे चलना हो मेरे
मैं हाथ नहीं छोड़ा करती
मेरा ही हाथ पकड़ मुझको
कितनों ने ही मारी ठोकर

कबसे वो दर्पण ढूंढ रही
झांक सके जो मन के अंदर

लोग बहुत देखे हैं ऐसे
जो परखें दूजों के लेखे
लोग कहीं ऐसे भी हो जो
खुद के करमों को भी देखें
कोई जगह बनी हो ऐसी
ढूंढो ऐसा धरती *अंबर*

कबसे वो दर्पण ढूंढ रही
झांक सके जो मन के अंदर

प्रीति सुराना

Sunday, 21 May 2017

क्या आदमी इतना बड़ा होगा????

दर्द सामने जब भी खड़ा होगा,
नाजुक सही ये दिल कड़ा होगा।

यूं लाख सबसे ही छुपाया हो,
पर आंख में आंसू गड़ा होगा।

खामोश रहकर सुन लिया जो वो,
आरोप माथे पर जड़ा होगा।

जब घाव भी नोंचे गये होंगे,
अरमां कहीं बिखरा पड़ा होगा।

बेजान तन हो भी गया हो पर,
ये मन मस्तिष्क से तो लड़ा होगा।

आये खुशी की याद भी चाहे,
नासूर बन ज़ख्म भी सड़ा होगा।

दर्द भूल अपना प्रीत ही बांटे,
क्या आदमी इतना बड़ा होगा????

प्रीति सुराना

हृदय विदारक मौत

तुम्हारे लिए रिश्ता एक चीज़ थी,
समय समय पर उपयोग होता रहा,
चीजों की उपयोगिता और ह्रास के नियमानुसार
उसकी कीमत कम होती गई,..
और एक समय बाद
पूरी तरह ह्रास के बाद
उपयोगिता बिल्कुल खत्म,...

और तब रिश्ता
जीवन के बड़े से मकान के
किसी कोने में पड़ा
वो फालतू सामान बना वो रिश्ता
बंद कर दिया गया
घर के कबाड़खाने में
जिसे अनुकूल समय आने पर
पीछे के दरवाज़े से कर किया जाएगा बाहर,..

सुना है
बड़े लोग कबाड़ बेचते नही
सड़क किनारे डाल देते हैं
ताकि
कोई कबाड़ी
या कचरा बीनने वाला उठा ले जाए,..
फिर बिकना,
तोड़कर उपयोगी हिस्सा निकाला जाना,
और पूर्णतः अनुपयोगी होने पर जलाया जाना,..

चीजों से सामान तक
सामान से कबाड़ तक का जीवन
फिर
मौत से पहले ही शव परीक्षण
और
हृदय विदारक मौत
एक रिश्ते की
जिसकी आत्मा
मुक्ति की चाह में
अब भी भटक रही है कहीं,... प्रीति सुराना

*अपनो से प्यार*

सुनो!
तुम शिखर पर हो
या तुम ही शिखर हो
और तुम मुझे बेहद पसंद हो,
पर नही पहुंचना मुझे तुम तक
क्योंकि
तुम झुकते या रुकते नही,
ऐसा नही कि मुझमें कोई अहम् है
या
तुम श्रेष्ठ नही इस बात का वहम् है,..

नहीं मैं बिल्कुल भी नही डरती ऊंचाई से
और
न डरती हूं वहां तक पहुंचने की चढ़ाई से,
पर
मुझे लगता है डर
ऊपर चढ़ते हुए
नीचे रह गए अपनों की गुहार से
आगे बढ़ते हुए
पीछे से लौट आने की आत्मीय पुकार से,...

मुझे लगता है डर
शिखर पर पहुंचकर
या
शिखर बनकर
नुकीली सी सीमित जगह पर
अपनों के बिना डसने वाली तन्हाई से,..
अपनों के लिए तड़प लिए
नीचे देखने पर
भयावह, निगल जाने वाली गहरी खाई से,...

हां!!
करता है मुझे शिखर
बार बार आकर्षित
पर शिखर के आधार पर बसे
मेरे अपनों का है मुझपर
मेरी सफलता से ज्यादा अधिकार
मैं कायर नही हूं जो बहाने करुं
बस मुझे है
मेरे सपनों से ज्यादा *अपनो से प्यार* ,..

प्रीति सुराना

Saturday, 20 May 2017

"तलाक, तलाक, तलाक"

हाँ !
मुझे जीने हैं रिश्ते
मुझे चाहिए प्रेम
मुझे जरूरत है भरोसे की
मुझे चाहिए अपनों का साथ

शिकायत है दाता से
क्यूं सिखाया सिर्फ
समर्पण???

नही होती सहन गलत बातें
नही सुने जाते ताने
नही मानी जाती मुझसे हार
नही कर सकती मैं पलायन

शिकायत है जन्मदाता से
क्यूं दी मुझे
सही गलत की समझ??

चुभती है बातें
दुखते हैं घाव
टीसती हैं खरोंचे
जलती है चोटें

शिकायत है विधाता से
क्यूं बनाया मुझे इतना
संवेदनशील??

थक गई अब
समझदारी संवेदनशीलता और समर्पण के साथ
निभाते-निभाते
रिश्तेदारी, जिम्मेदारी और दुनियादारी

सुना है
तीन तलाक पर फैसला आने को है
इससे पहले कि ख़ारिज हों
ये तीन शब्दों का मामला

आज मैं चाहती हूं छुटकारा
ऐसे तमाम बंधनो से
बेटी,पत्नी,बहू, माँ,दोस्त, सखी, प्रेमिका की
पवित्र भूमिका से नही,..

पर इनसे जुड़े अनावश्यक दबाव
और भावनात्मक बंधनो से चाहिए
मुझे भी आज
"तलाक, तलाक, तलाक"

प्रीति सुराना