Saturday, 29 April 2017

*इच्छामृत्यु की सुविधा*

हाँ !!!
महसूस कर सकती हूं
वो पीड़ा
जो तीरों की मृत्युशय्या पर
पड़े रहकर
इच्छामृत्यु के वरदान के बावजूद
अपनी आत्मा से प्रिय
परिवार को मिटते देखते हुए
पल-पल
महसूस की होगी
भीष्मपितामह ने,..
मरणांतक कष्ट उठाते हुए
किसी रिश्ते से एक एक भाव
प्रेम,निष्ठा, विश्वास, उम्मीद
आदि-आदि को
पल-पल मरते देखने की
विवशता के बावजूद
चुभती परिस्थितियों में पड़े
एक रिश्ते को
मृत्युपर्यन्त निभाने की
वचनबद्धता,..
अगाध प्रेम
और समर्पण,..
जबकि
*इच्छामृत्यु की सुविधा*
तो आजकल हर रिश्ते में है,..

प्रीति सुराना

*इच्छामृत्यु की सुविधा*

हाँ !!!
महसूस कर सकती हूं
वो पीड़ा
जो तीरों की मृत्युशय्या पर
पड़े रहकर
इच्छामृत्यु के वरदान के बावजूद
अपनी आत्मा से प्रिय
परिवार को मिटते देखते हुए
पल-पल
महसूस की होगी
भीष्मपितामह ने,..
मरणांतक कष्ट उठाते हुए
किसी रिश्ते से एक एक भाव
प्रेम,निष्ठा, विश्वास, उम्मीद
आदि-आदि को
पल-पल मरते देखने की
विवशता के बावजूद
चुभती परिस्थितियों में पड़े
एक रिश्ते को
मृत्युपर्यन्त निभाने की
वचनबद्धता,..
अगाध प्रेम
और समर्पण,..
जबकि
*इच्छामृत्यु की सुविधा*
तो आजकल हर रिश्ते में है,..

प्रीति सुराना

Friday, 28 April 2017

बिखरे शब्द

एकता, प्रेम और भरोसा अपनेपन की सारी कड़ियाँ,
बिखर रही है धीरे-धीरे मृदु रिश्तों की सारी लड़ियाँ,
बिखरे शब्द सहेज रही हूं मैं भी भावों को कहने को,
बिखर न जाए ऐसे ही खुशियों वाली सारी घड़ियां।

प्रीति सुराना

Wednesday, 26 April 2017

जन्मसिद्ध रचनाकार

सुनो!!
रचती हूँ मैं
हर परिस्थिति में
रोज कुछ नया,..
रचना
मेरी नियति ही नही
बल्कि मेरे लिए
प्रकृति का दिया
चमत्कारी उपहार भी है,..
अपने अंश से वंश को रचने की योग्यता
जब नियति ने दी है मुझे
तब अपने भावों को
शब्दों में रचना भी
मेरा अधिकार है *गुनाह* नही,..।
हाँ!
स्त्री रूप में जन्म देकर
स्वयं
सृष्टि के नियंता ने
बना दिया मुझे
जन्मसिद्ध रचनाकार !!!

प्रीति सुराना

प्रेम लौटता है

हाँ !
मानती हूं मैं
प्रेम लौटता है
हमेशा बढ़कर लौटता है
पर कभी सोचा
बीता हुआ समय
कभी नही लौटता
टीसते हुए घावों के दर्द
स्नेहलेप की तभी अपेक्षा करता है
है जब दर्द असहनीय हो,..
घाव के सूखने के बाद
सहलाना सुखद भले ही हो
पर संक्रमण का
भय बना रहता है,..
संक्रमित होने के बाद घाव नासूर बनता है
जैसे बार बार कुरेदे जाने पर,..
माना जग प्रतिध्वनि की तरह
सबकुछ लौटाता है,
पर सब कुछ लौटकर आना
सार्थक तभी
जब सबसे अधिक
आवश्यकता हो,..
और
कब रही मेरी ये कामना
प्रेम के बदले
तुम रूठो,
दूर जाओ,
लौट आओ,
मैंने तो हमेशा चाहा
तुम लड़ो
झगड़ो
पर साथ रहो
देह में आत्मा की तरह,..
जो बिछड़े तो परिणाम
सिर्फ "मृत्यु"

प्रीति सुराना

अड़चनें

गिनती हूं हर रोज बीत रहे लम्हे, सांसे और धड़कने
निपटाती हूं जिंदगी और मौत के बीच की अड़चनें
फासले मिटते ही नही है तमाम कोशिशों के बाद भी
बस मिट रही हैं पल पल मेरी ख्वाहिशें, तमन्नाएं, हसरतें,.. प्रीति सुराना

Friday, 7 April 2017

पिटारा

मैं यूं ही इत उत डोलूं
या खुद ही खुद से बोलूं
महकी महकी रहूं मैं जब
सुधियों का *पिटारा* खोलूं

प्रीति सुराना

खज़ाने

गाने को तराने बहुत हैं
हँसने के बहाने बहुत हैं
रोने से मिले जो फुरसत
यादों के *खज़ाने* बहुत हैं

प्रीति सुराना

संदूक

संदूक दादी नानी वाला रखा है घर के कोने में
कीमत कोई पूछे उसकी तो तुलता है सोने में
मोल वही जाने है उसका जो यादों में जीता है
या जीया हो जीवन जिसने रिश्ते नाते संजोने में

प्रीति सुराना

पेटी

है पालने में लेटी
जो प्यारी सी बेटी
दिल का वो टुकड़ा
है खुशियों की पेटी

प्रीति सुराना

Wednesday, 5 April 2017

My Movie

Monday, 3 April 2017

'अच्छे दिन तो आने दो'

'अच्छे दिन तो आने दो'


हम गीत विजय के गा लेंगे

अच्छे दिन तो आने दो।

सबने जो देखे थे सपने 

सच वो सब हो जाने दो।।


साफ रहे भारत इस खातिर

कितनों ने झाड़ू थामे।

फिर सड़कों पर वो काम किया 

जो न किया अपने घर में।

मन का कूड़ा कौन समेटे

बात समझ मे आने दो।

हम गीत विजय के गा लेंगे

अच्छे दिन तो आने दो।

सबने जो देखे थे सपने 

सच वो सब हो जाने दो।


धरती को दें माँ का दरजा

इसका कोई मान नही।

नारी की लाज नही रखते 

मन में भी सम्मान नही।

नज़रें और नीयत साफ रखें 

अब ये पाठ पढ़ाने दो।

हम गीत विजय के गा लेंगे

अच्छे दिन तो आने दो।

सबने जो देखे थे सपने 

सच वो सब हो जाने दो।।


भ्रष्टाचार मिटाना हो तो 

खुद ही कदम उठाना है।

कालेधन की कोठरियों का 

मन से मोह भगाना है।

ज्ञान नही देना दूजों को 

सीख अमल में लाने दो।

हम गीत विजय के गा लेंगे 

अच्छे दिन तो आने दो।

सबने जो देखे थे सपने 

सच वो सब हो जाने दो।।


प्रीति सुराना

Thursday, 30 March 2017

संभावनाएं अभी बाकी है,...

संभावनाएं अभी बाकी है,...   
     मनीष की आदत थी रोज सुबह उठते ही एफ एम चालू करके ही अपनी दिनचर्या शुरू करते हैं। उनके और शालू के बीच पसरी संवादहीनता से घर में फैला सन्नाटा और मन में बिखरते रिश्तों की पीड़ा के बीच कभी कभी कोई ऐसा गीत बज उठता मानो दोनों की नज़र भर मिल जाए तो बात हो जाए।
      बच्चों के हॉस्टल जाने के बाद बड़े से घर में वो दो ही लोग तो थे पर बीस साल पहले शुरू किया हुआ सफर आज इस मोड़ पर था कि चहकते रहने वाले तोता मैना मानो अपने स्वर खो बैठे हों। समय के साथ दोनों परिपक्व हुए तो सोच ने भी अलग अलग राह पकड़ ली प्रेम विवाह के सपने जब सच के धरातल पर उतरे तो कब क़दमों ने दिशाएं बदल ली पता ही नहीं चला।
     शालू यही सब सोच रही थी कि एफएम पर साहिर लुधयानवी का गीत बज उठा।  'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों,...।'
        मनीष नहा कर निकले ही थे सामने पड़ते ही दोनों की नज़र मिली मानो गीत के बोल मुखरित हो उठे हों। मन ही मन शालू की तरह ही मनीष भी सोचने लगे कि आज बात कर ही ली जाए। सोचते सोचते गीत के अंतिम बंद तक पहुँच गए,..
तारूफ रोग हो जाये, तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लूक बोझ बन जाये तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा,...
          दोनों के भीतर एक द्वन्द चल रहा था कि क्या दोनों को गीत के इस अंतिम बंद को अमल में लाते हुए एक दूजे का बरसों का साथ छोड़ देना चाहिए। प्रेम विवाह की काल्पनिक दुनिया जब जिम्मेदारियों की वास्तविकता से रूबरू होती है तो क्या दिल के रिश्ते अपनी प्रासंगिकता खो बैठते हैं,..?
      क्या जीवन के उस मोड़ पर मनीष और शालू को सोच न बदल कर राह बदलने का निर्णय सही कदम होगा?
शायद नहीं,.. एक रिश्ते से जुड़े तमाम रिश्तों के बिखराव का डर रिश्ते के महत्व और प्रासंगिकता को परिभाषित करता है।
         एक बार फिर दोनों की नज़र टकराई। अचानक मनीष एफ एम बंद करता हुआ बोला शालू आज चाय के साथ पकौड़े बना लो साथ नाश्ता करेंगे।
सन्नाटा टूटते ही मानो शालू की ऊर्जा कई गुना बढ़ गई। फटाफट नाश्ते की टेबल पर चाय और पकौड़े ले आई। दोनों ने एक दूसरे को ऐसे देखा जैसे कह रहे हों,.. संभावनाएं अभी बाकी है,...।

प्रीति सुराना

ताकाझांकी

खुशियों ने की ताकाझांकी आज हमारे आँगन में।

बदला बदला सा कुछ तो है आज हमारे जीवन में।।


हाथों में हाथ रहा उनका, और कदम भी साथ बढ़ें।

ढलती शामों के साये में, सपने भी परवान चढ़े।

लगता है महका सा कोई, फूल खिला है गुलशन में।

खुशियों ने की ताकाझांकी आज हमारे आँगन में।।


आँखों आंखों में रात कटी, बातों में बीत गया दिन।

अधरों पर मुसकान टिकी हो, कम आते है ये पलछिन।

आशा का इक दीप जला है , सूने सूने से मन में।

खुशियों ने की ताकाझांकी, आज हमारे आँगन में।।


मंदिर की घंटी जैसा स्वर, गूंज रहा है कानों में,

नव संचार हुआ हो जैसे , अब ऊर्जा का प्राणों में।

रंगत बदली ऐसी जैसे, मिल गया हो केसर चंदन में।

खुशियों ने की ताकाझांकी आज हमारे आँगन में।।


बदला बदला सा कुछ तो है आज हमारे जीवन में।।


प्रीति सुराना