Tuesday, 3 December 2019

आगाज़

आगाज़

मैं चाहती हूँ 
अब भी कुछ सार्थक कर गुजारना,
तमाम संसाधनों की कमी के बाद भी,
अनेक असुविधाओं के बाद भी,
सारी रुकावटों के बाद भी,
क्योंकि
मेरा कुछ करके गुजारना
मेरे गुजर जाने के बाद भी
जिन्दा रख सकेगा,
उन तमाम पीड़िताओं के भीतर मुझे
जो कुछ करना तो चाहती थी
पर कर गुजरने का हौसला न जुटा सकी।
शायद मेरी एक आहुति
एक अश्वमेध यज्ञ का आगाज़ बन जाए
जो नाश कर सके
दुनिया से स्त्री पर उंगली उठा कर
सद्चरित्र बनने वाले दुःशासनों की जमात।
क्रांति का सूत्रधार किसी को तो बनना होगा
तो मैं क्यों नहीं?

सुनो स्त्रियों!!!

काश हम सब 
अपनी-अपनी लाज को बचाने की क्रांति के लिए
रखें ये मजबूत इरादा
तो हो सकता है अपने हिस्से की ठोस धरती के साथ-साथ
जीत लें अपने हिस्से का आसमान भी और उड़ान भी।

उठो! जागो! अब वक्त है क्रांति का!

प्रीति सुराना

शुभाशीष

प्यारी बेटियों को
यही शुभाशीष
पढ़ो और बढ़ो
किसी से न डरो
वक्त तुम्हारा है,..!

भवि और पलक दोनों को
जन्मदिन की ढेर सारी बधाई

समकित, प्रीति, तन्मय, जयति, जैनम की ओर से।
💐🎁🎼🎉🍦🍫🎈❤️

अभ्यास



मैं
शिकायतें, दुख, उलाहने,
बुराई, डर, नफरत, गुस्सा,
सब कुछ भूलना चाहती हूँ

अमन, प्रेम, खुशियाँ,
अच्छाई, हिम्मत, दोस्ती, रिश्ते
कण-कण में, 
जिस्म से रुह तक
रट लेना चाहती हूँ
ताकि
बदल सकूँ अपने आसपास का दायरा
या गढ़ना चाहती हूँ 
एक सकारात्मक औरा अपने चारों ओर।

जो भी आए इस दायरे में महसूस करे
सुरक्षित, शांत और खुश खुद को,
तमाम विकृतियां इस दायरे के बाहर छोड़कर,
भीतर सिर्फ और सिर्फ सकरात्मता,

हाँ!
आज याद आ रहा है बचपन
जब टीचर होमवर्क में दिया करते थे 
सौ-सौ बार लिखने को वो तमाम शब्द
जो हम गलत लिखते थे
और सच! 
आज भी दोबारा वो गलती नहीं होती लिखने में।

सुलेख लेखन की तरह
जिंदगी में भी बुराई को अच्छाई में बदलने का एक तरीका
ये भी तो हो सकता है न??

क्यों दें महत्व बुराई की बात को
दोहरा कर उसको बार-बार चर्चा में क्यों रखें
बुराई को नकारना भी
अच्छाई का स्वागत हो सकता है न???

आओ न करें एक कोशिश 
बचपन की तरह फिर से
गलतियों को सुधारने के लिए
सुलेखन का अभ्यास करके,...!

प्रीति सुराना

तेरी-मेरी यारियाँ

प्रिय उषा

ये तेरी-मेरी यारियाँ
रब की मेहरबानियाँ
22 साल की यादें
अनगिनत किस्से और कहानियाँ,..!

चलता रहे ये सफर यूँ ही 
सिर्फ fb पर 8 साल की नहीं 
जिंदगी के 22 साल की दोस्ती की भी 
ढेर सारी शुभकामनाएँ और बधाइयाँ।
😘🎉🎈🎁🎼💐

अन्तरा शब्दशक्ति के बढ़ते कदम

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*अन्तरा शब्दशक्ति संस्था पंजीयन क्रमांक  (04/21/05/207665/19)*
अन्तरा शब्द शक्ति के प्रकल्प एवं अब तक किये कार्य
1. व्हाट्सअप समूह 2 फरवरी 2016 से।
2. फेसबुक समूह 2 फरवरी 2016 से।
3. लोकजंग दैनिक संध्या समाचार पत्र में अन्तरा शब्दशक्ति के पेज पर 7-8 रचनाओं का सोमवार से शुक्रवार तक प्रकाशन 1 नवंबर 2016 से।
4. फेसबुक पेज 16 फरवरी 2017 से।
5. मासिक वेब पत्रिका 1 जुलाई 2017 से।
6. अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन 25 मार्च 2018 से।
7. ईबुक प्रकाशन 15 जनवरी 2019 से।
8. अब तक लगभग 300 से अधिक पुस्तकों और 15 साझा संग्रहों का प्रकाशन, विमोचन और 550 सम्मान अन्तरा शब्दशक्ति द्वारा किये गए।
9. 1 जून 2019 से अन्तरा शब्द शक्ति एक पंजीकृत सेवा संस्था के रूप में भी कार्यरत है।
10. 21 सितंबर 2019 से बहुभाषा समन्वय प्रकल्प कार्यरत है।
11. 1 अक्टूबर 2019 से अन्तरा शब्दशक्ति की रचनाओं का वेब पृष्ठ 'सृजन शब्द से शक्ति का' संपादित एवं प्रकाशित।
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सार्थकता

हमारे शहर की प्रतिभा अंतु झकास के साथ भुवन सिंह धांसू जी एवं वी के वर्मा जी घर पर आए। चाय पर छोटी सी साहित्यिक चर्चा हुई। अच्छा लगता है जब हिन्दी और साहित्य से जुड़े लोग मिलते हैं ऐसे में सार्थक लगता है साहित्य और भाषा के लिए कुछ करना।

क्या करुँ?

क्या करुँ?

घावों को सी लूं?
आँसू पी लूं?
या छालों पर 
दवा लगा लूं?
सोच रही हूँ बिखरे मन को 
किस तरह और कैसे संभालूं?

बंधन जोडूं?
नाते तोडूं?
या अंतस की
गिरहें खोलूं?
मेरा मन है, मर्जी भी मेरी
जोडूं, तोडूं या फिर खोलूं?

सहती रहूँ?
रोती रहूँ?
मौन रहूँ
या चुप्पी तोडूं?
सारे निर्णय मैं खुद लूँगी
क्यों और किसी से किस्से जोडूं?

राज़ छुपाऊं?
सबको बताऊं
रोकूँ खुद को?
या बहने दूँ?
समय की धारा से सीखूंगी
दोमुहों से डर, जीना क्यों छोडूं?

अबला नहीं हूँ
न हूँ अनपढ़
न ही मेरे 
संस्कार है अनगढ़
हूँ सक्षम, कमजोर नहीं हूँ
किसी के लिए क्यों खुद को तोडूं?

मुझे पता है
सब है दिखावा
अपनापन है
एक छलावा
जिस राह चलने की ठानी है
हिम्मत से चलूं क्यों राहें मोडूं?

प्रीति सुराना

अलीना-अफशान 28 नवम्बर 2019

कुदरत रहे सदा मेहरबान
बनी रहे चेहरे की मुस्कान
खुशियों से भरा रहे दामन
आबाद रहो अलीना-अफशान

प्रीति समकित सुराना

दादी बनने का सुख



सारे सुख एक तरफ
और दादी बनने का सुख एक तरफ
मासी दादी की गोद में 'छुटकू'
और साथ बैठी दादी(मेरी दीदी)
और सेवा करती मम्मी(बहु)
कितना सुखद सब कुछ
और साथ ही वक़्त की रफ्तार पर अचरज
कल तक हम बहने बच्ची हुआ करती थीं
आज हमारे बच्चे इतने बड़े हो गए
कि एक के बाद एक 
भतीजे-भतीजियों और भानजे-की शादियाँ 
नाती-पोते की किलकारियाँ
और तन्मय जयति जैनम के लिए जागते अरमान
आखिर ये तीनों भी 18 जो पार कर गए।
सपने अनचाहे ही आँखों में तैर जाते हैं,..!😊

प्रीति सुराना

निक्की की शादी 27-28 नवम्बर 2019

निकिता को हमारा   ढेर    सारा आशीर्वाद
अंकित संग  रहो   सदा   खुश और आबाद
परिवार का नेह  और   मायके की दहलीज
तुम्हे करते हुए विदा आज आ रहा सब याद

प्रीति सुराना

आन्या और अन्तरा

बड़ी   मम्मा  की  गोद  में
बैठे आन्या  और   अन्तरा
याद आया कुछ ही पल में
जैनम-जयति  का बचपन

प्रीति सुराना

ग्वालियर में आयोजित "ग्लोबल कॉन्क्लेव" में "ग्लोबल अचीवमेंट अवार्ड 2019"

ग्वालियर में आयोजित "ग्लोबल कॉन्क्लेव" में "ग्लोबल अचीवमेंट अवार्ड 2019" 

ग्वालियर में आयोजित "ग्लोबल कॉन्क्लेव" में "ग्लोबल अचीवमेंट अवार्ड 2019" से अंतरा शब्दशक्ति संस्था के चार सदस्य सम्मानित हुये एवं संस्था की ओर से सक्रिय सहयोग भी दिया।

गोपाल किरन समाज सेवी संस्था  ग्वालियर (मध्यप्रदेश) के तत्वावधान में ग्लोबल कॉन्क्लेव देश विदेश के साहित्यकार एवं समाजसेवियों सर्वश्री सरन घई कनाडा, डॉ. कामराज संधू कुरुक्षेत्र, कपिल कुमार बेलजियम, रमा शर्मा जापान, डॉ प्रीति सुराना, वारासिवनी (मप्र), सुएता डी चौधरी फिजी आदि प्रबुद्ध जनों के आतिथ्य में सम्पन्न हुआ अतिथियों सहित अनेक समाज सेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को ग्लोबल अचीवमेंट अवार्ड 2019 में को मिला सम्मान से सम्मानित किया गया।
दो दिवसीय इस कार्यक्रम में अन्तरा शब्द शक्ति की सक्रिय सहभागिता से हुए ग्लोबल कॉन्क्लेव में डॉ. प्रीति समकित सुराना (संस्थापक:- अन्तरा शब्द शक्ति), ब्रजेश विफल (संरक्षक), कीर्ति प्रदीप वर्मा (महासचिव), वंदना दुबे कार्यकारणी सदस्य की साहित्यिक उपलब्धियों  के लिए सम्मानित  किया गया।

सच्चे रिश्ते अभासी दुनिया के

गुलशन कहता है भुआ हम तो दिल से रिश्ता निभाते हैं पर रिश्ते निभते तब हैं जब जिससे हम निभा रहे हैं वो भी रिश्ते को लेकर वही सम्मान और भावनाएँ रखता हो। तभी तो fb पर मुकेश भैय्या का लाडला बेटा आज भतीजा बनकर इतना प्यार देता है, और सच गुलशन की बुआ होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
साक्षी और बच्चों और श्वेता का स्नेह साथ बाँध लाई हूँ। 
घर की बुआ को जितना सम्मान और प्यार मिलता है उससे भी बहुत ज्यादा इन सबसे मुझे मिला।
दिनभर साथ घूमना, खाना-पीना, मस्ती, बातें जो खत्म ही नहीं हो रही थी। गुलशन-साक्षी मुझे बारां तक छोड़ने आए।
भीगी पलकों से फिर जल्दी मिलने का वादा करके लौट तो आए पर बहुत मुश्किल था।
गुलशन की आंखों की नमी द्रवित करती है और उसका ये कहना कि भुआ ये रिश्ते ही हमारी पूँजी हैं आज के ज़माने में भी रिश्तों पर यकीन करने को विवश करता है।
लव यू ऑल, मिस यू ऑल😘❤️🙏🏼

केशोरायपाटन की नौका यात्रा और सेवन वंडर्स पार्क के फोटोज़ अगली पोस्ट में :)

केशवरायपाटन का इतिहास एवं महत्व

केशवरायपाटन का इतिहास एवं महत्व

केशवरायपाटन प्राचीन नगर राजस्थान के कोटा शहर से 20 किलोमीटर दूर चम्बल नदी के तट पर स्थित है। वर्तमान पाटन ही प्राचीन आश्रम पट्टन है।
यह कस्बा मुख्यतः अनादि निधन सनातन जैन धर्म के 20 में तीर्थंकर भगवान मुनीसुव्रत नाथ जी के प्रसिद्ध जैन मंदिर तीर्थ क्षेत्र और केशवराय जी महाराज, भगवान विष्णु के मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है जो चम्बल नदी के तट पर स्थित है।

कुछ प्राचीन मतों के अनुसार चन्द्रवंशी राजा हस्ती (जिन्होंने हस्तिनापुर बसाया) के चचेरे भाई रंतिदेव ने इसे बसाया था। यहाँ पाण्डवों के द्वारा अज्ञातवास में कुछ समय शरण लेने का उल्लेख भी मिला है।

वास्तुकला

हम्मीर महाकाव्य से ज्ञात होता है कि रणथम्भौर के चौहान राजा जेत्रसिंह वृद्धावस्था में अपने पुत्र हम्मीर को राज्य देकर पत्नी सहित यहाँ मंदिर की पूजा हेतु आये थे। यहाँ के प्राचीन मंदिर के गिर जाने पर बूँदी नरेश राजा शत्रुसाल हाड़ा ने एक बड़ा मंदिर 1641 ई. में फिर बनवाया था। इस मंदिर में केशवराय (विष्णु) की चतुर्भुजी सफ़ेद पाषाण की मूर्ति प्रतिष्ठित है, जिसको शत्रुसाल मथुरा से लाये थे। यह मंदिर वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है।
पत्थर की बारीक कटाई, तक्षणकला का श्रेष्ठ नमूना मण्डोवर व शिखर पर उकेरी आकृतियाँ मनमोहक हैं। मंदिर के गर्भगृह में, बड़ी संख्या में मंदिर से भी प्राचीन प्रतिमाओं का संकलन है। इसकी बाहरी दीवारों पर प्राचीन प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। यह चम्बल नदी का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यहाँ कार्तिक माह में प्रसिद्ध मेला लगता है। केशवराय का यह मंदिर बाहर से देखने पर अलौकिक दिखाई देता है। मंदिर निर्माण की शैली उत्कृष्ट एवं तक्षण कला बेजोड़ है। यहाँ राजराजेश्वर मंदिर (शैव) भी प्राचीनकालीन महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।

जैन तीर्थ

इस नगर में जैन मुनि सुव्रतनाथ की 2500 वर्ष प्राचीन एक चमत्कारिक प्रतिमा है, जो सम्वत 336 में प्रतिष्ठित की गई थी। यह एक शिला फलक पर है। इसकी पॉलिश मौर्य व मध्यवर्ती कुषाण काल की सिद्ध होती है। इसके अलावा यहाँ तेरहवीं शताब्दी की और भी प्रतिमायें हैं। यह मंदिर भूमिदेवरा नामक जैन मंदिर भी कहलाता है। इसमें स्थित मूर्ति को मोहम्मद गौरी द्वारा क्षतिग्रस्त किया गया था। जिसकी पुष्टि कर्नल टॉड, दशरथ शर्मा इत्यादि विद्वान करते हैं। एक अन्य श्वेत शिला फलक पर पद्मप्रभु की खड़गासन मूर्ति है, जो मूर्तिकला की दृष्टि से बहुत आकर्षक है।

जंबू अरण्य

विजयेन्द्र कुमार माथुर ने लिखा है...। जंबू अरण्य, कोटा ज़िला, राजस्थान में स्थित प्राचीन अरण्य है। चंबल नदी के तट पर कोटा से लगभग 5 मील (लगभग 8 कि.मी.) की दूरी पर स्थित वर्तमान केशवराय पाटण ही प्राचीन जंबू अरण्य है। किंवदंती है कि अज्ञातवास के समय विराट नगर जाते समय पांडव कुछ दिनों तक यहाँ ठहरे थे। वर्तमान केशवराय का मंदिर कोटा नरेश शत्रुशल्य ने बनवाया था। यह भी लोकश्रुति है कि आदि मंदिर राजा रंतिदेव का बनवाया हुआ था। महाभारत तथा विष्णु पुराण में वर्णित 'जंबूमार्ग' सम्भवत: यही हो सकता है।

नौका विहार का आनंद लेते हुए गुलशन साक्षी श्वेता मैं और बच्चे। यात्रा आनंद केवल शब्दों में नहीं चित्रों में झलकेगा।

संकलनकर्ता
प्रीति समकित सुराना
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति

दुनिया के सात अजूबों को देखें...सेवेन वंडर्स इन कोटा में।

दुनिया के सात अजूबों को देखें...सेवेन वंडर्स इन कोटा में।
  
दुनिया के सात अजूबो से कौन वाकिफ नहीं है...हर किसी की चाहत होती है कि, वह इन अजूबो की सैर करें। हालांकि इस ख्वाहिश को पूरा कर पाना सबके लिए संभव नहीं है। पर मैं खुशकिस्मत हूँ कि गुलशन-साक्षी, श्वेता और बावच्चों के साथ यह सौभाग्य मुझे आसानी से मिल गया।

आप भी दुनिया के सात अजूबो की सैर भारत के राज्य राजस्थान के कोटा शहर में देख सकते हैं। बता दें, इन अजूबो को कोटा में असली सात अजूबो की हुबुहू नकल करके बनाया गया है।

जी हां संसार में यूं तो इन्सान ने द्वारा बनाई गयी हजारो ऐसी कृतियां है, जिन्हें देख आप अचंभे में पड़ जायेंगें। लेकिन दुनिया के सात अजूबो की बात ही अलग है। अपनी शिल्प कला, वास्तु कला और भवन निर्माण कला के लिए दुनिया के सात अजूबे हमेशा चर्चा का विषय बने रहते हैं।दुनिया के सात अजूबो में से एक अजूबा यानी ताजमहल हमारे भारत यानी आगरा में स्थित है, जिसे लोग दूर देश विदेश से देखने आते हैं। ठीक ऐसा ही ताजमहल आपको कोटा के "सेवन वंडर्स ऑफ़ वर्ल्ड पार्क में देखने को मिल जायेगा।

एफिल टावर

पेरिस के एफिल टावर को कौन नहीं जानता।लेकिन अगर आप नजदीक से उसकी खासियत को निहारना चाहते हैं तो कोटा के किशोर सागर तालाब के पास बने पार्क में हूबहू वैसा ही आसमान को छूता टावर आपको नजर आ जायेगा। 

पिरामिड

पेरिस के एफिल टावर के पास ही आपको पिरामिड में सोते हुए तूतेनखामेन भी मिल जाएंगे। उस जमाने में अद्धुत कलाकृति का नमूना जहां इतने बड़े पत्थरों को इतनी ऊंचाई तक ले जाना भी पहेली ही थी। लेकिन यहां इस इमारत को आकार देने में दिक्कत नहीं महसूस हुई।

पीसा की झुकी हुई मीनार

जब आप पिरामिड से थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो आपको पीसा की झुकी हुई मीनार नजर आएगी देखने को मिल जाएगी। इटली में पीसा की मीनार तो बनने के बाद झुकी थी। बता दें, पीसा इटली का एक छोटा-सा शहर है जहां विश्‍व प्रसिद्ध झुकी हुई मीनार है। पीसा की यह झुकी हुई मीनार सैकड़ों सालों से सैलानियों की उत्‍सकुता का केंद्र बनी हुई है।

कोलेजियम

रोम का कोलेजियम भी यहीं अपनी ऊंची और टूटी दीवारों के साथ स्वागत करता दिख जाएगा।

स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी

जब बात सात अजूबो की हो रही है तो स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी की जिक्र न हो ये भला कैसे हो सकता है। यहां न्यूयॉर्क के किनारे का फैला समंदर भले ही न हो लेकिन किशोर सागर के किनारे बनी हाथ में मशाल लिए स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी अहसास दिलाती है कि शायद न्यूयॉर्क यहीं कहीं हैं।

क्राइस्ट द रिडीमर

इतना ही आपको इस पार्क में ब्राजील स्थित क्राइस्ट द रिडीमर की हाथ फैलाए विशालकाय मूर्ति में दिखाई देगी जो ब्राजील की बड़ी पहाड़ी पर स्थापित है। हालांकि यहां पहाड़ जैसी ऊंचाई तो नहीं लेकिन क्राइस्ट द रिडीमर की विशालकाय प्रतिमा यहां आने वाले पर्यटकों को जरूर रोमांचित करेगी।

ताजमहल

दुनिया के इन अजूबों में एक अजूबा हिंदुस्तान में भी है, जिसे काफी लोग करीब से भी देख चुके होंगे। जी हां, मोहब्बत की बेमिसाल निशानी ताजमहल। हिंदुस्तान के शहंशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल के लिए आगरा' में इस खूबसूरत इमारत का निर्माण कराया था। कोटा में भी ऐसा ही एक प्रतीकात्मक ताजमहल देखने को मिल जाएगा।

अनुभव का निष्कर्ष

सपनों को मन में न रखें, जब समय ने चाहा प्रत्यक्ष हैम सातों अजूबों के दर्शन कर लेंगे पर आज यह मुराद क्यों न कोटा के सेवन वंडर्स पार्क में पूरा कर लें। मैंने तो किया आप भी जरूर आएं एक बार। अकल्पनीय आंनद मिलेगा।

संकलनकर्ता
प्रीति समकित सुराना
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति

ग्वालियर : मध्य प्रदेश का एक शहर(यात्रा संस्मरण)

ग्वालियर : मध्य प्रदेश का एक शहर
(यात्रा संस्मरण)

ग्वालियर भारत के मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है। भौगोलिक दृष्टि से ग्वालियर म.प्र. राज्य के उत्तर में स्थित है। यह शहर और इसका प्रसिद्ध दुर्ग उत्तर भारत के प्राचीन शहरोँ के केन्द्र रहे हैं। यह शहर गुर्जर प्रतिहार राजवंश, तोमर तथा बघेल कछवाहों की राजधानी रहा है। इनके द्वारा छोड़े गये प्राचीन चिन्ह स्मारकों, किलों, महलों के रूप में मिल जाएंगे। सहेज कर रखे गए अतीत के भव्य स्मृति चिन्ह इस शहर को पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।

आज ग्वालियर एक आधुनिक शहर है और एक जाना-माना औद्योगिक केन्द्र है। ग्वालियर को गालव ऋषि की तपोभूमि भी कहा जाता है।

ग्वालियर को पीएम नरेंद्र मोदी के प्रमुख स्मार्ट सिटीज मिशन के तहत स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित होने वाले सौ भारतीय शहरों में से एक के रूप में चुना गया है। 

नामकरण

ग्वालियर शहर के नाम के पीछे एक इतिहास छिपा है। छठी शताब्दी में एक राजा हुए सूरजसेन पाल कछवाह, एक बार वे एक अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हो मृत्युशैया पर थे, तब ग्वालिपा नामक सन्त ने उन्हें ठीक कर जीवनदान दिया। उन्हीं के सम्मान में इस शहर की नींव पडी और इसे नाम दिया ग्वालियर।

ग्वालियर का क़िला

ग्वालियर किले का निर्माण गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज ने 840 ई. मे किया था।

इतिहास

राजा मिहिरकुल का सिक्का, जो लगभग सन 520 में ग्वालियर पर राज करते थे।

ग्वालियर शिलालेख में शून्य, जैसा कि दो संख्याओं (50 और 270) में देखा जा सकता है। अनुमान लगाया जाता है कि ये अंक 9वी शताब्दी में अंकित किए गए थे।
ग्वालियर किले में चतुर्भुज मंदिर एक लिखित संख्या के रूप में शून्य की दुनिया की पहली घटना का दावा करता है। हालाँकि पाकिस्तान में भकशाली शिलालेख की खोज होने के बाद यह दूसरे स्थान पर आ गया। ग्वालियर का सबसे पुराना शिलालेख हूण शासक मिहिरकुल की देन है, जो छठी सदी में यहाँ राज किया करते थे। इस प्रशस्ति में उन्होंने अपने पिता तोरमाण (493-515) की प्रशंसा की है।

ग्वालियर किले के अंदर सिद्धांचल गुफाओं में जैन प्रतिमाएँ।

1231 में इल्तुतमिश ने 11 महीने के लंबे प्रयास के बाद ग्वालियर पर कब्जा कर लिया और तब से 13 वीं शताब्दी तक यह मुस्लिम शासन के अधीन रहा। 1375 में राजा वीर सिंह को ग्वालियर का शासक बनाया गया और उन्होंने तोमरवंश की स्थापना की। उन वर्षों के दौरान, ग्वालियर ने अपना स्वर्णिम काल देखा। इसी तोमर वंश के शासन के दौरान ग्वालियर किले में जैन मूर्तियां बनाई गई थीं।

ग्वालियर किले में मान मंदिर महल

राजा मान सिंह तोमर ने अपने सपनों का महल, मान मंदिर पैलेस बनाया जो अब ग्वालियर किले में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। बाबर ने इसे " भारत के किलों के हार में मोती" और "हवा भी इसके मस्तक को नहीं छू सकती" के रूप में वर्णित किया था। बाद में 1730 के दशक में, सिंधियों ने ग्वालियर पर कब्जा कर लिया और ब्रिटिश शासन के दौरान यह एक रियासत बना रहा।

5 वीं शताब्दी तक, शहर में एक प्रसिद्ध गायन स्कूल था जिसमें तानसेन ने भाग लिया था।ग्वालियर पर मुगलों ने सबसे लंबे समय तक शासन किया और फिर मराठों ने।
क़िले पर आयोजित दैनिक लाइट एंड साउंड शो ग्वालियर किले और मैन मंदिर पैलेस के इतिहास के बारे में बताता है।

1857 का विद्रोह

1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ग्वालियर ने भाग नहीं लिया था। बल्कि यहाँ के सिंधिया शासक ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था। झाँसी के अंग्रेज़ों के हाथ में पड़ने के बाद रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर भागकर आ पहुँचीं और वहाँ के शासक से उन्होंने पनाह माँगी। अंग्रेज़ों के सहयोगी होने के कारण सिंधिया ने पनाह देने से इंकार कर दिया, किंतु उनके सैनिकों ने बग़ावत कर दी और क़िले को अपने क़ब्ज़े में ले लिया। कुछ ही समय में अंग्रेज़ भी वहाँ पहुँच गए और भीषण युद्ध हुआ। महाराजा सिंधिया के समर्थन के साथ अंग्रेज़ 1,600 थे, जबकि हिंदुस्तानी 20,000। फिर भी बेहतर तकनीक और प्रशिक्षण के चलते अंग्रेज़ हिन्दुस्तानियों पर हावी हो गए। मार्च 1858 में रानी लक्ष्मीबाई भी अंग्रेज़ों से लड़ते हुए ग्वालियर में वीरगति को प्राप्त हो गईं। वहीं तात्या टोपे और नाना साहिब वहाँ से फ़रार होने में कामयाब रहे। रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान आज भी पूरे भारत में याद किया जाता है।

ग्वालियर रियासत

ग्वालियर पर आज़ादी से पहले सिंधिया वंश का राज था, जो मराठा समूहों में से एक थे।इसमें 18वीं और 19वीं शताब्दी में ग्वालियर राज्य शासक, 19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार के सहयोगी और स्वतंत्र भारत में राजनेता शामिल थे।

ग्वालियर के ऐतिहासिक स्थल

मुरार: 

पहले यह सैन्य क्षेत्र हुआ करता था, जिसे मिलिट्री ऑफिसर्स रेजिडेंशियल एरिया रिजर्व्ड (M.O.R.A.R.) कहा जाता था और संक्षेप में मोरार। मोरार शब्द का लोप होकर मुरार हो गया।

थाटीपुर: 

रियासत काल में यहाँ सेना के सरकारी आवास थे, जिस का नाम थर्टी फोर लांसर था। आज़ादी के बाद यह आवास मध्य प्रदेश शासन के अधीन आ गए, जिसे थर्टी फोर की जगह थाटीपुर कहा गया।

सहस्त्रबाहु मंदिर या सासबहू का मंदिर :

ग्वालियर दुर्ग पर इस मंदिर के बारे में मान्यता है की यह सहत्रबाहु अर्थात हजार भुजाओं वाले भगवन विष्णु को समर्पित है। बाद में धीरे-धीरे सासबहू का मंदिर कहा जाने लगा।

गोरखी: 

पुराने रजिस्ट्रार ऑफिस से गजराराजा स्कूल तक सिंधियावंश ने रहने का स्थान बनाया था। यही उनकी कुल देवी गोराक्षी का मंदिर बनाया गया। बाद में यह गोरखी बन गई।

पिछड़ी ड्योढ़ी: 

स्टेट टाइम में महल बनने से पहले सफ़ेद झंडा गाड़ा जाता था। जब महल बना तो इसके पीछे की ड्योढ़ी और बाद में पिछड़ी ड्योढ़ी कहलाने लगी।

तेली का मंदिर: 

८ वी शताब्दी में गुर्जर राजा के सेनापति तेल्प ने दुर्ग पर दक्षिण और उत्तर भारतीय शैली का मंदिर बनवाया था, जिसे तेल्प का मंदिर कहा जाता था। आज इसे तेली का मंदिर कहा जाता है।

पान पत्ते की गोठ: 

पूना की मराठा सेना जब पानीपत युद्ध से पराजित होकर लौट रही थी, तब उसने यहीं अपना डेरा डाल लिया। पहले इसे पानीपत की गोठ कहा जाता था। बाद में यह पान पत्ते की गोठ हो गई।

डफरिन सराय: 

१८ वी शताब्दी में यहां कचहरी लगाई जाती थी। यहां ग्वालियर अंचल के करीब ८०० लोगों को लार्ड डफरिन ने फांसी की सजा सुनाई थी, इसी के चलते इसे डफरिन सराय कहा जाता है।

गुरुद्वारा बंदी छोड़:

गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ 6 वें सिख गुरु हरगोबिंद साहिब का स्मारक है। इतिहास के अनुसार राजा जहाँगीर ने गुरु गोबिंद साहिब को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया था। उन्हें लगभग दो साल तक कैद में रखा गया। उन्हें उनकी सैन्य गतिविधियों के लिए कैद किया गया था।
जब उन्हें कैद से मुक्त किया गया तो उन्होंने अपने साथ 52 कैदियों को छोड़ने की प्रार्थना की जो हिंदू राजा थे। जहाँगीर ने आदेश दिया कि जो भी गुरु का जामा पहनेगा उसे छोड़ दिया जायेगा।
अत: गुरु का नाम दाता बंदी छोड़ पड़ा। गुरु हरगोबिंद सिंह की याद में वर्ष 1970 में गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ बनाया गया। यह देश भर के सिखों के लिए महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है।

सूर्य मंदिर:

भारत के प्रसिद्ध सूर्य देवता के मंदिर में एक है मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्तिथ सूर्य मंदिर। हर वर्ष लाखो की संख्या में भक्त यहा भगवान सूर्य के दर्शन करने आते है।

मंदिर का निर्माण और इतिहास

इस मंदिर का निर्माण उड़ीसा के सूर्य मंदिर कोणार्क के रूप में ही किया गया है। 1988 में जी. डी. बिरला के प्रयासों से यह भव्य निर्माण हुआ। मंदिर की वास्तुकला कोणार्क मंदिर की तरह ही है जिसमे लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग किया गया है। मंदिर परिसर में देवी देवताओ की सुन्दर और आकर्षित नक्काशी की गयी है। यहाँ अति शांति और स्वच्छ वातावरण मन को हर लेता है।

सूर्य मंदिर की विशेषता

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है की जब सूर्य पूर्व से उदय होता है तब सबसे पहले उसकी किरण यहा लगी सूर्य प्रतिमा पर गिरती है। इससे यह मंदिर और मूर्ति अत्यंत जाग्रत हो जाती है।

सूर्य के सात घोड़े खीच रहे है रथ

मंदिर को सामने से देखने पर लाल बलुआ पत्थर में सात घोड़े मंदिर रूपी रथ को पहियों के माध्यम से खिंच रहे है। मंदिर के आगे सुन्दर बगीचा बना हुआ है।

अनोखा घंटा नाद

भगवान सूर्य को पूर्व में पर्वत के समान और पश्चिम में अग्र के समान बताया गया है। भगवान सूर्य ज्योतिष गण के सम्राट बताए गए हैं। भगवान कौंशुमान के इस मंदिर में घंटा नाद विशेष प्रकार से किया जाता है। घंटानाद करने के लिए घंटा काफी उंचाई पर लगाया गया है। घंटे को हल्की चेन के माध्यम से खींचा जाता है और घंटा बजता है। यह घंटानाद मंदिर में विशेष शक्ति का निर्माण करता है।

मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा ग्वालियर

ग्वालियर में स्तिथ तानसेन का मकबरा ही वो जगह है जहाँ अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक मियाँ तानसेन 400 साल से आराम कर रहे है, यानि के यंहा दफ़न है. अकबरनामा के मुताबिक सन 1562 से 1586 तक तानसेन उनके दरबार में संगीतकार थे और ये समय मुग़ल इतिहास का सबसे स्वर्णिम समय था। संगीत सम्राट रहे तानसेन की नगरी ग्वालियर के बारे में कहा जाता है की यंहा बच्चे रोते है तो सुर में, पत्थर लुढ़कते है तो ताल में।
ग्वालियर शहर इन्ही एतिहासिक धरोहर के कारण लोगो में प्रचलित है यंहा भारतीय और इस्लामिक शैली में बनी कई प्राचीन इमारते है। मोहम्मद गौस और तानसेन का मकबरा दोनों एक ही जगह पर है, इसका कारण है मरते समय उनकी आखरी इच्छा थी की उनको वहीँ दफनाया जाए जहां उनके गुरु दफ़न है।

यात्रा अनुभव सार

कुल मिलाकर ग्वालियर एक ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है जहाँ का भ्रमण भारतीय संस्कृति और इतिहास के साथ-साथ नैसर्गिक सौंदर्य दर्शन जीवन को आनंद से भर सकता है।

संकलनकर्ता
प्रीति समकित सुराना
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति

Sunday, 1 December 2019

क्या करुँ?



घावों को सी लूं?
आँसू पी लूं?
या छालों पर 
दवा लगा लूं?
सोच रही हूँ बिखरे मन को 
किस तरह और कैसे संभालूं?

बंधन जोडूं?
नाते तोडूं?
या अंतस की
गिरहें खोलूं?
मेरा मन है, मर्जी भी मेरी
जोडूं, तोडूं या फिर खोलूं?

सहती रहूँ?
रोती रहूँ?
मौन रहूँ
या चुप्पी तोडूं?
सारे निर्णय मैं खुद लूँगी
क्यों और किसी से किस्से जोडूं?

राज़ छुपाऊं?
सबको बताऊं
रोकूँ खुद को?
या बहने दूँ?
समय की धारा से सीखूंगी
दोमुहों से डर, जीना क्यों छोडूं?

अबला नहीं हूँ
न हूँ अनपढ़
न ही मेरे 
संस्कार है अनगढ़
हूँ सक्षम, कमजोर नहीं हूँ
किसी के लिए क्यों खुद को तोडूं?

मुझे पता है
सब है दिखावा
अपनापन है
एक छलावा
जिस राह चलने की ठानी है
हिम्मत से चलूं क्यों राहें मोडूं?

प्रीति सुराना

Saturday, 30 November 2019

किसकी बात करती हो साहिबा??

किसकी बात करती हो साहिबा??

स्त्री तो सतयुग से बदनाम है
त्रिया चरित्र के नाम पर संसार के निर्माण से आज तक
राम के युग मे अग्निपरीक्षा दी तब से,..!

और स्त्री आज अर्धनग्न वस्त्रों के लिए बदनाम नहीं
वो तो बदनाम है रजस्वला द्रौपदी का 
राजदरबार में बुजुर्गों के सामने चीरहरण हुआ तब से,..!

स्त्री आज चौराहे पर बलात नहीं जलाई गई
स्त्री तो सती होती आई है सदियों से,.!
आज स्त्री नोची जाती है, ठगी जाती है, 
मार डाली जाती है सरेआम,..!

सुनो स्त्री,..!
अपने दुख दर्द मत बताना किसी को,
जिस पर यकीन करोगी वो साबित कर देगा चरित्रहीन,
जिससे मदद मांगोगी वो कहेगा 
आदरणीया इससे आपकी ही बदनामी होगी 
क्योंकि आप महिला हैं।

हाँ स्त्री,..!
तुम जान लो कि तुम जब तक उपयोगी सामान हो तन मन या धन से,
सिर्फ तब तक आदरणीया, माँ, बहन, पत्नी, संगिनी या जिंदगी हो।
तुमने आवाज़ उठाई या उपयोगिता खत्म हुई
बसस्स रिश्ता खत्म,...!

और तुम
किसकी बात करती हो साहिबा
किससे मंगोगी न्याय???
हाथ जोड़े आदरणीय से
सफेद पोश नेताओं से
या खाकी पहने पुलिस कर्मी से????

किससे मंगोगी कांधा, 
हाथ थामने का अधिकार, 
सुरक्षा हेतु मदद की गुहार,
हर सफेद के पीछे काला है,
हर कंधा देने वाला 
दरअसल मतलबपरस्त है,..!

धिक्कार है,..!
ऐसे हर पुरुष पर जो ये कहता है
चुप रहो बदनाम हो जाओगी,..!
अच्छा हुआ हवस की शिकार उस स्त्री को जला दिया गया,..
समानाधिकार की बात करता दोगला समाज वैसे भी जीने नहीं देता।

देखा है सुना है भोगा है हश्र 
इस मिट्टी की हर स्त्री ने पुरुष सत्ता का दर्द
सीता, द्रौपदी, मीरा, लक्ष्मीबाई जैसी अनेक स्त्रियों से लेकर 
निर्भया, दामिनी, नवजनमी अबोध बालिका 
या बाल उम्र की कन्याओं से प्रियंका जैसी सुशिक्षित स्त्री ने,...!

भोगा है 
डर, पीड़ा, दाह की जलन, सबकुछ
परिवार, पत्रकार, पुलिस, नेता, समाज के ठेकेदार,
सबकी नजर में स्त्री सिर्फ भोग्या है या चरित्रहीन
जिसे जीते जी नर्क ही भोगना है।

बस 
आज का नर्क आधुनिक है सर्व सुविधायुक्त
अब मर्जी तुम्हारी
स्त्री तुम्हें जीते जी जलना है
या
मरकर जलना चाहती हो।

यदि
मरकर जलना चाहती हो
तो चुप रहो और सहो, 
देवी के रूप में पूजी जाओ 
और उसी पुण्य भूमि में रौंदी जाओ,..!

अच्छा हुआ प्रियंका 
तुम जला दी गई
रोंगटे खड़े होते हैं सोचकर 
अगर तुम जिंदा होती तो??????

प्रीति सुराना

Friday, 29 November 2019

बैसाखी नहीं मेरे अपने

अपने

हमेशा रहता है दर्द मेरे पावों में,
तीखी सी जलन है भी घावों में
बैसाखी नहीं, कुछ अपने हैं मेरे
जो थामे रहते हैं मुझे राहों में,.!

प्रीति सुराना

जंगल



यादों का एक घना-सा जंगल बसा हुआ है मेरे आस-पास,
सुख-दुख, साथ-धोखे और अनेक अनुभवों से फला-फूला
जीने के लिये सतत शुद्ध प्राणवायु तो मिलती रहती है यहाँ 
पर मानव के रूप में वन्य प्राणियों का डर जीने नहीं देता।

प्रीति सुराना

Tuesday, 26 November 2019

बारां (यात्रा संस्मरण)

कुछ रिश्ते स्वतः ही बिना किसी अपेक्षा के प्रगाढ़ होते चले जाते हैं। शायद इसलिए कि अपेक्षाएं नहीं प्रेम और विश्वास इनकी नींव होते हैं। Pinky जी के यहाँ जाना एक सुखद अनुभूति से भर गया। घर का एकदम सात्विक माहौल, प्यार और सम्मान से भरा स्वागत, भोजन, शिव और हनुमान मंदिर जो उनके घर के प्रांगण में ही है उनके दर्शन। अलौकिक अनुभव। खूब सारा प्यार, दुलार और उपहार मिला पिंकी जी, जीजू और बिटिया से। 
दिल से आभार 😘🙏🏼💐❤️

यात्रा

यात्रा

सतत यात्रा में हूँ
सांसें जब तक चलेंगी
ये यात्रा चलती रहेगी
जब भी किसी पड़ाव पर
पहुँचती हूँ,
ठहरती हूँ,
आत्मिक संतुष्टि तो मिलती ही है
साथ ही
पैरों के छाले
मन के फाले
चलते रहने की इच्छाशक्ति
प्रेरित करती है
एक बार लौटूं
उस जगह पर जहाँ से चली थी
जहाँ कभी ठोकरें लगी
कभी काँटे चुभे
कभी फूलों ने कदम चूमें
लौट कर चुन लेना चाहती हूँ
स्मृतियों के अवशेष
और बुहार दूँगी पथ
हटा दूँगी पत्थर और काँटे
ताकि मेरे बाद आने वाले
बच सकें ठोकरों और चुभन से
पर
समय और जीवन गतिमान है
कहाँ लौट पाते हैं हम चाहकर भी
लेकिन एक वादा है
आज खुद से
बुहारती चलूँगी अब
अपने पथ के काँटे और पत्थर
आगे बढ़ने के साथ-साथ
जब तक सांसों और मेरी गति थम न जाए।

प्रीति सुराना

Friday, 22 November 2019

हस्तिनापुर एक ऐतिहासिक भूमि

हस्तिनापुर एक ऐतिहासिक भूमि

मेरठ यात्रा के दौरान हस्तिनापुर में मंदिरों के दर्शन का सौभाग्य मिला। कुछ जानकारियाँ यात्रा के दौरान और अध्ययन में मिली उसे एक आलेख के रूप में संकलित करने का छोटा सा प्रयास है।

हस्तिनापुर, जिला मेरठ से 37 किमी एवं दिल्ली से 100 किमी की दूरी पर स्थित है, जो मेरठ-बिजनौर रोड से जुड़ा हुआ है। यह स्थान राजसी, भव्यता, शाही संघर्षों एवं महाभारत के पांडवों और कौरवों के रियासतों का सक्षात गवाह है। विदुर्र टीला, पांडेश्वर मंदिर, बारादरी, द्रोणादेश्वर मंदिर, कर्ण मंदिर, द्रौपदी घाट एवं कामा घाट आदि जैसे स्थल पूरे हस्तिनापुर में फैले हुए हैं। 

सिख समुदायों के लिए हस्तिनापुर का महत्व

 हस्तिनापुर सिख समुदायों के लिए भी एक बड़ा मान्यता का केंद्र है, क्योंकि यह पंच प्यारे भाई धर्म सिंह का जन्म स्थल भी है, जो गुरु गोविंद सिंह जी के पांच शिष्यों में से एक थें। सिख धर्म के लिए सैफपुर कर्मचनपुर का गुरुद्वारा श्रद्धालुओं के लिए बहुत बड़ा तीर्थ केंद्र है।
पवित्र एवं ऐतिहासिक स्थान होने के अतिरिक्त, हस्तिनापुर वन्यजीव के लिए भी काफी प्रख्यात है, क्योंकि यहां पास में अभ्यारण्य वनस्पति की विभिन्न प्रजातियों से सुसज्जित है एवं साथ ही वन्यजीव पर्यटन एवं एडवेंचर, ईको-टूरिज्म एवं संबंधित गतिविधियों का भी केंद्र है। हस्तिनापुर में रहने एवं खाने की बेहतर सुविधा भी उपलब्ध है। वन विभाग का रेस्ट हाउस एवं पी.डब्लू.डी. का अतिथि गृह भी यहां पर स्थित है, साथ ही जैन धर्मशाला भी स्थित है, जहां रुकने की बेहतर सुविधा उपलब्ध है।

जैन तीर्थ में हस्तिनापुर का महत्व

उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थाें में शुमार है हस्तिनापुर का जैन तीर्थ स्थल। कमल मंदिर में विराजमान कल्पवृक्ष भगवान महावीर की अतिशयकारी, मनोहारी एवं अवगाहना प्रमाण सवा दस फुट ऊंची खड़गासन प्रतिमा और नवग्रह शांति जिनंदिर में विराजमान भगवन्तों की नौ प्रतिमाओं के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालुगण आते हैं। इसके अलावा हस्तिनापुर स्थित जम्बूद्वीप तीर्थ में विराजमान 31-31 फुट उतुंग भगवान शांतिनाथ, कुंथनाथ और अरहनाथ की विशाल खड़गासन प्रतिमाएं जैन धर्मावलम्बियों के बीच आकर्षण का केंद्र हैं। डा. जीवन प्रकाश जैन के अनुसार तीर्थ जैन भूमियों के इतिहास में यह प्रथम अवसर हस्तिनापुर को प्राप्त है कि जब यहां पर भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ -अरहनाथ जैसे तीन-तीन पद के धारी महान तीर्थकरों की साक्षात जन्मभूमि जम्बूद्वीप स्थल पर ग्रेनाइट पाषाण की 31 फुट उतुंग तीन विशाल प्रतिमाएं राष्टीय स्तर के पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के साथ विराजमान की गई।
जैन तीर्थस्थलों में हस्तिनापुर का अपना अलग ही महत्व है। भगवान ऋषभदेव के प्रथम पुत्र, प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। राजा भरत की राजधानी हस्तिानपुर थी। इसके अलावा महाभारत से भी हस्तिनापुर का इतिहास जुड़ा हुआ है। जैन धर्म के 24 तीर्थकरों में से 16-17-18 वें तीन तीर्थकर श्री शांतिनाथ, कुुंथुनाथ और अरहनाथ का जन्म भी हस्तिनापुर में हुआ था। जैन धर्म के अनुसार करोड़ों वर्ष पूर्व यहां पर इन तीर्थकरों के चार-चार कल्याणक हुए थे और तीर्थंकर, चक्रवर्ती, कामदेव इन तीन पदों के धारक। इन तीनों महापुरूषों ने हस्तिनापुर को राजधानी बनाकर यहां से छह खंड का राज्य संचालित किया था। जैन धर्मावंबियों के अनुसार दिल्ली और हस्तिनापुर तब एक ही माना जाता था। जवाहर लाल नेहरू ने भी अपनी किताब डिस्कवरी आफ इंडिया के पृष्ठ 107 पर इसका उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि आज जिसे हम दिल्ली के नाम से जानते हैं वह कभी हस्तिनापुर एवं इंद्रप्रस्थ कहलाता था। अतः दिल्ली और हस्तिनापुर को ही एक दूसरे के पूरक ही समझा जाता हैै।
वास्तुकला के विभिन्न अद्भुत उदाहरण एवं जैन धर्म के विभिन्न मान्यताओं के केंद्र भी यहां पर भ्रमण योग्य हैं। जम्बूद्वीप परिसर में ओम मंदिर, सुमेरू पर्वत एवं कमल मंदिर एवं मंदिर का पूरा परिसर भ्रमण योग्य है, भगवान वासुुपूज्य मंदिर, भगवान शांतिनाथ मंदिर के अलावा विद्यमान बीस तीर्थंकर मंदिर, सहस्त्रकूट मंदिर, श्वेतांबर जैन मंदिर, प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर, अष्टापद जैन मंदिर एवं श्री कैलाश पर्वत जैन मंदिर आदि
भगवान ऋषभदेव मंदिर के दर्शन कर जैन धर्म के लोग अपने आप को धन्य मानते हैं।

इतिहास में हस्तिनापुर का महत्व

हस्तिनापुर का इतिहास महाभारत के काल से शुरू होता है। यह भी शास्त्रों में गजपुर, हस्तिनापुर, नागपुर, असंदिवत, ब्रह्मस्थल, शांति नगर और कुंजरपुर आदि के रूप में वर्णित है। सम्राट अशोक के पौत्र, राजा सम्प्रति ने यहाँ अपने साम्राज्य के दौरान कई मंदिरों का निर्माण किया है। प्राचीन मंदिर और स्तूप आज यहाँ नहीं हैं। हस्तिनापुर शहर पवित्र नदी गंगा के किनारे पर स्थित था।
महाभारत काल में हस्तिनापुर कुरु वंश के राजाओं की राजधानी थी। हिंदू इतिहास में हस्तिनापुर के लिए पहला संदर्भ सम्राट भरत की राजधानी के रूप में आता है। महा काव्य महाभारत में वर्णित घटनाए हस्तिनापुर में घटी घटनाओ पर आधारित है।
हस्तिनापुर मुगल शासक बाबर ने भारत पर आक्रमण के दौरान हमला किया था और वहाँ के मंदिरों पर तोपों से बमबारी की थी। मुग़ल काल में हस्तिनापुर पर नैन सिंह का शासन था जिसने हस्तिनापुर में और चारों ओर कई मंदिरों का निर्माण किया।

यहां आज भी भूमि में दफन है पांडवों का किला, महल, मंदिर और अन्य अवशेष।
 
पौराणिक किंवदंती 

सम्राट भरत के समय में पुरुवंशी वृहत्क्षत्र के पुत्र राजा हस्तिन् हुए जिन्होंने अपनी राजधानी हस्तिनापुर बनाई। कहते हैं कि हस्तिनापुर से पहले उनके राज्य की राजधानी खांडवप्रस्थ हुआ करती थी। लेकिन जल प्रलय के कारण यह राजधानी उजाड़ हो गई तब राजा हस्ति ने नई राजधानी बनाकर उसका नाम हस्तिनापुर रखा।

हस्तिन् के पश्चात् अजामीढ़, दक्ष, संवरण और कुरु क्रमानुसार हस्तिनापुर में राज्य करते रहे। कुरु के वंश में ही आगे चलकर राजा शांतनु हुए जहां से इतिहास ने करवट ली। शांतनु के पौत्र पांडु तथा धृतराष्ट्र हुए जिनके पुत्र पांडव और कौरवों ने मिलकर राज्य के बंटवारे के लिए महाभारत का युद्ध किया। पुराणों में कहा गया है कि जब गंगा की बाढ़ के कारण यह राजधानी नष्ट हो गई तब  पाण्डव हस्तिनापुर को छोड़कर कौशाम्बी चले गए थे। 
पुराणों में राजा हस्तिन् के पुत्र अजमीढ़ को पंचाल का राजा कहा गया है। राजा अजमीढ़ के वंशज राजा संवरण जब हस्तिनापुर के राजा थे तो पंचाल में उनके समकालीन राजा सुदास का शासन था।
राजा सुदास का संवरण से युद्ध हुआ जिसे कुछ विद्वान ऋग्वेद में वर्णित 'दाशराज्ञ युद्ध' से जानते हैं। राजा सुदास के समय पंचाल राज्य का विस्तार हुआ। राजा सुदास के बाद संवरण के पुत्र कुरु ने शक्ति बढ़ाकर पंचाल राज्य को अपने अधीन कर लिया तभी यह राज्य संयुक्त रूप से 'कुरु-पंचाल' कहलाया। परन्तु कुछ समय बाद ही पंचाल पुन: स्वतन्त्र हो गया।
 
पुरातत्वों के उत्खनन से ज्ञात होता है कि हस्तिनापुर की प्राचीन बस्ती लगभग 1000 ईसा पूर्व से पहले की थी और यह कई सदियों तक स्थित रही। दूसरी बस्ती लगभग 90 ईसा पूर्व में बसाई गई थी, जो 300 ईसा पूर्व तक रही। तीसरी बस्ती 200 ई.पू. से लगभग 200 ईस्वी तक विद्धमान थी और अंतिम बस्ती 11वीं से 14वीं शती तक विद्यमान रही। अब यहां कहीं कहीं बस्ती के अवशेष हैं और प्राचीन हस्तिनापुर के अवशेष भी बिखरे पड़े हैं। वहां भूमि में दफन पांडवों का विशालकाय एक किला भी है जो देखरेख के अभाव में नष्ट होता जा रहा है। इस किले के अंदर ही महल, मंदिर और अन्य इमारते हैं।
हस्तिनापुर में खुदाई १९५० के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के बी.बी. लाल द्वारा किया गया।

संकलनकर्ता
डॉ प्रीति समकित सुराना
संस्थापक एवं संपादक
अन्तरा शब्दशक्ति

औघड़नाथ मंदिर, मेरठ एक अनूठा स्थान

औघड़नाथ मंदिर, मेरठ एक अनूठा स्थान

यहाँ आकर बहुत शांति तो मिलती है साथ ही मिलती है मंदिर से जुड़ी अनेक किवदंतिया, मान्यताएं और ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी। 

बाबा औंघड़नाथ का मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ महानगर में छावनी क्षेत्र में स्थित है चूंकि यहां भगवान शिव स्वरूप में विद्यमान हैं, इस कारण इसे औंघडनाथ मंदिर कहा जाता है।  

यह मान्यता है, कि इस मंदिर में शिवलिंग स्वयंभू है। यानि यह शिवलिंग स्वयं पृथ्वी से बाहर निकला है। तभी यह सद्य फलदाता है। भक्तों की मनोकामनाएं औंघड़दानी शिव स्वरूप में पूरी करने के साथ साथ ही शांति संदेश देते हैं। इसके साथ ही नटराज स्वरूप में क्रांति को भी प्रकाशित करते हैं।

इस मंदिर की स्थापना का कोई निश्चित समय ज्ञात नहीं है, लेकिन जनश्रुति के अनुसार यह प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले से शहर और आसपास के लोगों के बीच वंदनीय श्रद्धास्थल के रूप में विद्यमान था। वीर मराठाओं के इतिहास में अनेकों पेशवाओं की विजय यात्राओं का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने यहाँ भगवान शंकर की पूजा अर्चना की थी।

यह मंदिर श्वेत संगमरमर से निर्मित है, जिस पर यथा स्थान उत्कृष्ट नक्काशी भी की गई है। बीच में मुख्य मंदिर बाबा भोलेनाथ एवं माँ पार्वती को समर्पित है, जिसका शिखर अत्यंत ऊँचा है। उस शिखर के ऊपर कलश स्थापित है। मंदिर के गर्भ गृह में भगवान एवं भगवती की सौम्य आदमकद मूर्तियाँ स्थापित हैं व बीच में नीचे शिव परिवार सिद्ध शिवलिंग के साथ विद्यमान है। इसके उत्तरी द्वार के बाहर ही इनके वाहन नंदी बैल की एक विशाल मूर्ति स्थापित है। गर्भ गृह के भीतर मंडप एवं छत पर भी काँच का अत्यंत ही सुंदर काम किया हुआ है।

*भगवान शिव के आशीर्वाद से शुरू हुई थी 1857 की क्रांति*

वैसे तो देश के बड़े-बड़े मंदिर किसी ना किसी एतिहासिक घटना से जुड़े हुए हैं। लेकिन इस शिव मंदिर से देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से सीधा जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों की मानें तो इसी मंदिर में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बीज पड़े थे। 

मंदिर में बना था क्रांति का सबसे बड़ा कारण

औघडऩाथ शिव मंदिर के बारे में वैसे तो देश के कोने-कोने में सभी लोग जानते हैं। लेकिन इस बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है कि इसी मंदिर से 1857 की क्रांति का बिगुल बजा था। जानकारों की मानें तो बंदूक की कारतूस में गाय की चर्बी का इस्तेमाल होने के बाद सिपाही उसे मुंह से खोलकर इस्तेमाल करने लगे थे। तब मंदिर के पुजारी ने उन जवानों को मंदिर में पानी पिलाने से मना कर दिया। ऐसे में पुजारी की बात सेना के जवानों को दिल पर लग गई। उन्होंने उत्तेजित होकर उन्होंने 10 मई, 1857 को यहां क्रांति का बिगुल बजा दिया। जानकारों के अनुसार औघडऩाथ शिव मंदिर में कुएं पर सेना के जवान आकर पानी पीते थे। इस ऐतिहासिक कुएं पर आज भी बांग्लादेश के विजेता तत्कालीन मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा द्वारा स्थापित शहीद स्मारक क्रांति के गौरवमय अतीत का प्रतीक उल्लेखित है। इस मंदिर के आसपास के शांत वातावरण और गोपनीयता को देखकर अंग्रेजों ने यहां अपना आर्मी ट्रेनिंग सेंटर बनाया था। भारतीय पल्टनों के समीप होने की वजह से अनेक स्वतंत्रता सेनानी यहां आकर ठहरते थे। यहीं पर भारतीय पल्टनों के अधिकारियों से उनकी गुप्त बैठक हुआ करती थीं। इनमें हाथी वाले बाबा अपना विशिष्ट स्थान रखते थे।

मराठा किया करते थे पूजा पाठ  

यह मंदिर वीर मराठाओं का पूजा स्थल भी रहा है। कई प्रमुख पेशवा अपनी विजय यात्रा से पहले इस मंदिर में जाकर भगवान शिव की उपासना करते थे। यहां स्थापित शिवलिंग की पूजा करने से उनकी मनोकामना पूरी होती थी। यही वजह है कि आज भी इस औघडऩाथ शिव मंदिर में दूर-दूर से लोग पूजा-अर्चना करने आते हैं।

फाल्गुन में शिवभक्त चढ़ाते हैं कांवड़

मान्यता है कि औघडऩाथ शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के दर्शन करने से भक्तों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी होती हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू हैं। यही कारण है कि सच्चे मन से की गई मनोकामना औघडऩाथ बाबा बहुत जल्द पूरी करते हैं। इस शिवलिंग की पूजा-अर्चना का कार्य प्राचीन काल से होता आ रहा है। श्रावण और फाल्गुन महीने में शिवरात्रि के दिन यहां बड़ी संख्या में शिवभक्त पहुंचकर कांवड़ चढ़ाते हैं। भगवान शिव का औघडऩाथ शिव मंदिर मेरठ के कैंटोन्मेंट क्षेत्र में स्थित है। औघडऩाथ शिव मंदिर एक प्राचीन सिद्ध पीठ है। अनंतकाल से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने वाले औघड़दानी शिवस्वरूप हैं। इसी कारण इसका नाम औघडऩाथ शिव मंदिर पड़ गया।

काली पल्टन के नाम से भी जाना जाता है मंदिर

औघडऩाथ मंदिर को काली पल्टन के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में भारतीय सेना को काली पल्टन कहा जाता था। यह मंदिर काली पल्टन क्षेत्र में होने के कारण काली पल्टन मंदिर के नाम से भी विख्यात है। मंदिर की स्थापना का कोई निश्चित समय उपलब्ध नहीं है, लेकिन माना जाता है कि यह मंदिर सन 1857 से पहले ख्याति प्राप्त वंदनीय स्थल के रूप में विद्यमान था। आज इस मंदिर में वर्ष भर में लाखों लोग दर्शन करने पहुंचते हैं। सबसे अधिक भीड़ फाल्गुन और श्रावण  माह में शिवरात्रि के दौरान यहां दिखाई देती है। सोमवार के दिन ही नहीं रोजाना यहां सुबह-शाम श्रद्धालु पहुंचते हैं।

हर मंदिर से मान्यताएं और ऐतिहासिक घटनाएं जुड़ी होती है पर कुछ अनूठी जानकारियाँ दर्शन करने पर और अधिक उत्सुकता से भर देती है ऐसा ही अनूठा मंदिर है काली पलटन/ औघड़नाथ का मंदिर।

संकलनकर्ता
डॉ प्रीति सुराना
संस्थापक एवं संपादक
अन्तरा शब्दशक्ति

Thursday, 21 November 2019

*स्मृति शेष होने से पहले का शेष जीवन,...!*

*स्मृति शेष होने से पहले का शेष जीवन,...!*

पंख थे
परवाज़ की हिम्मत भी थी
और
चाहत भी
सामने खुला आसमान भी था
और
आज़ादी भी
पर हौव्वे बहुत सारे थे,..!

जैसे
हवा में प्रदूषण है
ओज़ोन पर्त में छेद है
विमानों की उड़ान बढ़ने से उड़ान में भी हादसे का खतरा है
गिद्ध और चीलों ने कब्जा कर रखा है उन्मुक्त पंछियों के हिस्से के आसमान पर
दैव्य स्थानों पर दरिंदों और असुरों ने भेष बदल कर घुसपैठ कर रखी है,..!

बस फिर क्या था
कमज़ोर पैरों से
भागमभाग, रेलमपेल, 
और अपनों के बीच ही जीत की प्रतियोगिता में
शामिल होना नामुमकिन था,..!

खैर!
डरकर हार अब भी नहीं मानी है मैंने
मन कल्पनाओं की उड़ान भरता है
हवाएँ प्रदूषित भी हो तो बाधक नहीं है 
क्योंकि उसने हवाओं से निभाए निःस्वार्थ मधुर संबंध हमेशा
कलम अविरल भावों में बहती है
क्योंकि भावनाओं ने न कभी दूसरों का रास्ता रोका न खुद रुकी,..!

सुनो!
बरकरार है
रुह में आज भी पाकीज़गी
जो बाहरी प्रदूषणों से लड़कर 
जी लेना चाहती है
*स्मृति शेष होने से पहले का शेष जीवन,...!*

प्रीति सुराना

होनी

होनी  कभी भी  टलती  नहीं  है
ये  जिंदगी  हमें  छलती  यहीं है
और दुख जितने होते हैं पल्वित
खुशियाँ उतनी फलती नहीं है,..!

प्रीति सुराना