Wednesday, 16 January 2019

नासूर

जख्मों को कुरेद कर
नासूर कर रही हूँ,
दर्द के नशे में
खुद को चूर कर रही हूँ,
सूरज की खता नहीं है,
वो तो रोज निकलता है,
आँखे बंद करके मैं ही
रोशनी को दूर कर रही हूँ,...

प्रीति सुराना

Tuesday, 15 January 2019

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा

          सुकृति ने कुछ देर प्रतीक्षा की कि सुहास उसका पक्ष भी सुनेगा पर कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि उसे जो कहना था वो कहकर वहाँ से चला गया।
           सुकृति ने एक नोट लिखा और सुहास के सिरहाने रख दिया। अपना जरूरी सामान समेटा और गेस्ट हाउस में आ गई।
           सुहास शाम को ऑफिस से लौटा तो सुकृति नज़र नहीं आई। सोच कुछ देर में आ जाएगी और पंलग पर लेटते ही उसे सुसाइड नोट मिला जिसमें लिखा था
           'अब मैं जीना नहीं चाहती!
           इसकी जिम्मेदार मैं खुद हूँ क्योंकि मैंने अपनी आत्मनिर्भरता खोकर निर्भरता स्वीकार की थी।'
                                                       सुकृति

          सुहास को एक पल में सुकृति के बिना जीवन व्यर्थ लगने लगा। छटपटाहट में सुकृति को घर भर में ढूंढता रहा। अचानक गेस्ट हाउस का दरवाजा खुला दिखा। वो दरवाज़े की ओर भागा और सुकृति को झकझोरता हुआ बोला 'सुकृति तुम मरी नहीं, जिंदा हो तो ये सब क्या था?'
        सुकृति ने शांत भाव से जवाब दिया 'ये कब कहा कि मर रही हूँ, बस जीना नहीं चाहती। चलो तुमने ये तो समझा कि 'जीने की ललक को खत्म  कर देना भी आत्महत्या ही होता है।'
        सुकृति ने खुद को कमरे और दायित्वों तक सीमित कर लिया सुहास आज भी अपनी गलतियों पर पछताने के सिवाय कुछ नहीं कर पाता।
         मौन और नितांत अकेली सुकृति की जिंदा लाश को देखकर खुद को सबकी नजरों में उसकी आत्महत्या का दोषी पाता है।
           अंतर्मन से मर चुकी सुकृति के लिए अतीत को बदलना संभव नहीं और सुहास को वर्तमान में किसी संजीवनी की तलाश है पर समझ नहीं पा रहा कैसे ढूंढे वो पल जो मृतप्राय सुकृति को फिर जीवित कर दे।         
                                                 प्रीति सुराना

मेले में,..!

मेले में,..

मैं रोई बहुत अकेले में।
हँसना ही था जो मेले में।।

अपनी खुशियाँ ही भूल गई।
बीते दिन रात झमेले में।।

इस मन से मन ही जो न मिला।
अनमोल बिका मन ढेले में।।

कोशिश चाहे जितनी कर ली।
हारे किसमत के खेले में।।

'प्रीत' जरा समझा अब मन को।
घुट-घुट जीना न अकेले में,...।।

प्रीति सुराना

Monday, 14 January 2019

आ अब लौट चलें,..! (दिल्ली से घर की ओर लौटते हुए)

शीत लहर
विश्व पुस्तक मेला
रंग बहार
              नववर्ष आया और 2019 की शुरुआत कड़कड़ाती ठंड के साथ हुई नए सपनों, नए लक्ष्यों और नए संकल्पों के साथ। ठंड ने देश को जकड़ा पर अन्तरा-शब्दशक्ति ने शुरुआत ही धुआंधार कार्यक्रमों के साथ की।
              विश्व पुस्तक मेला 2019, प्रगति मैदान, दिल्ली में 5 जनवरी को अपने तंबू तान चुका था देशभर के अनेक प्रकाशनों ने बहुत उत्साह से हिस्सा लिया। पुस्तक, प्रकाशक, लेखक और पाठकों का यह संगम गंगाघाट पर कुम्भ के मेले सरीखा लगता है।
     अन्तरा शब्दशक्ति ने पहले ही दिन यानि 5 जनवरी को ही एन डी तिवारी भवन में 91 पुस्तकों का विमोचन कर बेहतरीन शुरुआत की। लगभग सभी उम्र और देश के विभिन्य राज्यों से रचनाकार शामिल हुए। 17 साल की जयति सुराना द्वारा बनाए चित्रों से सजी (राजेन्द्र श्रीवास्तव जी की गिलहरी और डॉ चेतना उपाध्याय की बालकों की अदालत) दो बाल कविताओं की पुस्तकें, 18 साल की आस्था दीपाली की बाल कविताओं की पुस्तक सहित 70 साल के रक्षित दवे 'मौन' के गुजराती अनुवादों (काश! कभी सोचा होता,..-डॉ प्रीति सुराना व काव्यपथ-डॉ अर्पण जैन अविचल) की दो पुस्तकें, डॉ. अर्पण जैन अविचल के संपादन में मातृभाषा-भाग 2 का नि:शुल्क प्रकाशन से लेकर नवांकुरों और वरिष्ठ रचनाकारों की विविध विधाओं से सजी पुस्तिकाओं के साथ, नरेंद्रपाल की प्यासे नग़मे और मेरी खुद की सुनो! (बात मन की मन से) का प्रकाशन जिसका विमोचन डॉ वेदप्रताप वैदिक जी,लक्ष्मीशंकर वाजपेयी जी, अतुल प्रभाकर जी एवं उर्मिला माधव जैसे वरिष्ठ हस्ताक्षरों द्वारा सम्पन्न हुआ।
       पहले 10 महीनों में ही अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन द्वारा 230 से अधिक किताबों सहित "विश्व पुस्तक मेला 2019" में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मिलित होना और "168 पुस्तकों का राष्ट्रीय पुस्तकालय- कोलकाता 27" में शामिल होना अन्तरा-शब्दशक्ति परिवार के लिए भी त्योहार, उत्सव या मेले से कम नहीं।
           मकरसंक्रांति अपने नेपथ्य में अन्तरा शब्दशक्ति परिवार सहित समस्त सृष्टि को सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य-सद्बुद्धि और सद्कर्मों से सदमार्गो की ओर अग्रसर करे, सब मंगल हो यही कामना करती हूँ।

डॉ. प्रीति सुराना
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति

Saturday, 12 January 2019

"विवेकानंद" सा आदर्श बने जीवन तुम्हारा,..

"विवेकानंद" सा आदर्श बने जीवन तुम्हारा,..

जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएँ💐🎂😊

हाँ! मैं आश्चर्यचकित रह जाती हूँ!

जब मेरी ही भूलों पर मुझे टोकता है
मेरी बेवकूफियों पर मुझे डाँटता है
मुझे असमंजस की स्थिति से बाहर निकालता है
अभावों को स्वीकारना सीख लिया है
पर मुझसे ही
आज भी अपनी सारी ज़िद मनवाता है,

अपने लक्ष्य पर से ध्यान हटने नहीं देता
बिना थके बस चलता चला जाता है
खून में जोश है पर जाने होश कहाँ से लाता है
परिस्थितियों में ढलना सीख लिया है
पर मुझसे ही
आज भी अपने सारे राज बतलाता है,

जब कभी लगता है बहुत बड़ा हो गया है
बस तभी किसी बात पर बच्चा बन जाता है
पापा से अपनी सारी जरूरतें बतलाता
सारी फरमाइशें और शौक मुझसे पूरे करवाता है
सब ठीक होगा
ये आजकल मैं उसे नहीं वो मुझे समझाता है,

माना मेरा बच्चा बड़ा हो गया
पर माँ-बेटे का अलग सा ही नाता है
दोस्ती का खुलापन और बेटे का सहारा,
इसी से कट्टी-बट्टी और यही है दुलारा
बीसवें जन्मदिन पर
'तन्मय' तुम्हें असीम स्नेह हमारा
*विवेकानंद* सा आदर्श बने जीवन तुम्हारा,..
यही दुआ मम्मी-पापा,
और जैनम जयति द्वारा,...!

प्रीति सुराना

Thursday, 10 January 2019

मेरी याद में

बहुत हादसों से गुज़रा है जीवन मेरा,
मौत के करीब जाकर भी मरती नहीं,
लोग हँसकर आपस में बातें करते हैं,
अरे! ये अभी भी जिंदा है, मरी नहीं,..!

जब भी सोचती हूँ वजह सारी बातों की,..

बस एक दुआ करती हूँ मेरे सरपरस्त से,
अगर सचमुच मेरा ईमान सच्चा है,
जो जितना हँसा है आज मुझपर,
वो उतना रोये मेरी याद में मेरे बाद,...!

Monday, 31 December 2018

नववर्ष शुभ हो,..

जो भी दिल में गर्द है
उसे साफ करें
जो भी हुआ या किया
उसे माफ करें
हमारे बाद होंगे
सिर्फ दर्द और आंसू
तो क्यों न आज
खुशियों के साथ इंसाफ करें,..!

प्रीति सुराना

मैं कह रही हूँ

अनवरत मैं कह रही हूँ
मैं सतत ही ढह रही हूँ

ज्वार या भाटे बनी मैं
उठ रही या बह रही हूँ

बिखरते अरमान मन के
ऊपर से तह रही हूँ

वाकिफ हूँ हर सितम से
रोज़ पीड़ा सह रही हूँ

'प्रीत' जीवन कठिन है पर
मैं जिंदा तो रह रही हूँ!!

प्रीति सुराना

गलबहियाँ

किलकारियों से खिलखिलाहट तक,
खिलखिलाहट से मुस्कुराहट तक,
और अब मुस्कुराहटों के मायने समझाने
और
मुस्कुराकर बार-बार आंखों की नमी
चुपके से छुपा लेने तक की उम्र में,
आज यूँ
बिंदास होकर मिलना,
और किलकारियों और खिलखिलाहटों वाला बचपन न सही,
बचपन वाली यादों की गलियों से गलबहियाँ,
शब्दों में न बंधी जा सकने वाली खुशी और संतुष्टि,...
हाँ!
वादा रहा दोस्तों
मिले
फिर मिलेंगे
मिलते रहेंगे,..
जीवन में बचपन के इस अंश से
जिंदगी जीने का हौसला मिलता है,... है न!!!

प्रीति सुराना

मैं कह रही हूँ

अनवरत मैं कह रही हूँ
मैं सतत ही ढह रही हूँ

ज्वार या भाटे बनी मैं
उठ रही या बह रही हूँ

बिखरते अरमान मन के
ऊपर से तह रही हूँ

वाकिफ हूँ हर सितम से
रोज़ पीड़ा सह रही हूँ

'प्रीत' जीवन कठिन है पर
मैं जिंदा तो रह रही हूँ!!

प्रीति सुराना

Saturday, 29 December 2018

औकात

वफ़ा मिली
चाहत मिली
भरोसा मिला
पर लौटाने की औकात नहीं रही
नीयत खराब थी
सब रख लिया छुपाकर
लो
आज दिवालिया घोषित किया
खुद को
सरे बाज़ार हमनें,...!

प्रीति सुराना

चलो अच्छा है

चलो अच्छा है
सीख लिया तुमने
जीना मेरे बिना
कम से कम
मेरी जां को जाते-जाते
ये सुकून तो रहेगा
कि जी लोगे मेरे बिना,...!
मेरे बाद,...!

मेरा
बचपन याद है मुझे
पापा ने चलना सिखाते हुए
उंगली छोड़ी थी
इसलिए नहीं
कि मैं गिर जाऊँ
बल्कि इसलिए
कि मैं संभालना सीख जाऊँ,..!

सुनो!
परिस्थितियाँ सब कुछ सिखा देती है
देखों न!
आखिर सिखा ही दिया
तुम्हे जीना
और मुझे मर-मरकर जीना,...!

प्रीति सुराना

मोल

हाल या हालात
जब भी बिगड़ते हैं
गलती केवल एकतरफा नहीं होती
हाँ! मगर सच ये भी है
प्यार और समर्पण में
ये बातें लागू नहीं होती
क्योंकि उनका मोल ही तब है
जब स्वीकारा जाए,...!

प्रीति सुराना

सुनो! बात मन की मन से,..

अन्तरा शब्दशक्ति द्वारा प्रकाशित 91 पुस्तकों के शीर्षक से बनी एक विशेष कविता जिनका विमोचन 5 जनवरी 2019 को दिल्ली में होगा।

*सुनो! बात मन की मन से,...*

एक संकेतदीप के जरिये,...

मैं *आमोदिनी*
कभी *रिश्तों की धरोहर* संभालती
कभी दरिया की *लहरों में समन्दर* ढूँढती
कभी *लहरों में मोती* तलाशती
सोचती हूँ,... शायद *जीना इसी का नाम है*।

*मैं अपराजिता*,..
कभी *हमारा कश्मीर* कहकर
वादियों को *मेरी विरासत* बतलाती
कभी *गुफ़्तुगू-दिल की दिल से* करते हुए
*तूफानों से आशनाई* मोल ले लेती।

अकसर *खुद की तलाश* में
*कस्तूरी* के पीछे भटकती हुई सी
खुद को भूल जाती
फिर सोचती *मैं कहाँ हूँ?*
तभी *गूँज हृदय की* सुनाती एक *अजनबी अंतर्नाद*!

एक ऐसा *शब्द-नाद*
जो मुझे *चक्रव्यूह-अस्तित्व के कश्मकश की कहानी* में उलझाता
और *मैं एक कहानीकार की रचना प्रक्रिया* की तरह जीवन के *काव्यपथ* पर
रचने लगती हूँ ख्वाबों के *घरोंदे*,..

कभी *परिंदे खयालों के* भरते *सपनों की उड़ान*
*ओस के आँसू* सींचते *अंतर्मन के अंकुर*
और *नवांकुर* होते *नन्ही दुनिया* के *सुरमई उजाले* से रूबरू
दिल मे *काव्य दस्तक* देता *मेरो मन आनंद* की स्वर लहरियों के संग,...

*भीगा मन* का *आईना* दिखलाता
*जिंदगी के रंग* अनूठे,
*कुमकुम वाले पाँव* खड़े होते *ख्वाबों की दहलीज़* पर
और *बस तुम ही* दे जाते *अहसास अपनेपन का*,..
सच *लफ्ज़ लफ्ज़ सिर्फ तुम*,..
और हौले से समझा जाते *नैनन नीर न धर*

खुद को *परिवर्तन के चक्रवात* से संभालती
*संस्कारों के हवनकुंड* में आहुत होने से बचाती
*गिलहरी* से चंचल मन को
*बालकों की अदालत* में खड़ा कर पूछती कुछ अटपटे सवाल
*जादू की छड़ी* हाथों में थामे *जिद है मेरी*
कि जाना है *चाँद के आगे*,
हाँ! ठान लिया है *अब न रुकेंगे*,

सोचती हूँ अगले ही पल
*काश! तुम आसमां होते*, सच्ची *मिस यू कान्हा*
हाँ! मेरा मनबसिया,.... *उसकी नीलाभ आंखों में*
मेरे *मामूली से जज़्बात*
*अश्रुबिंदु* की तरह चमकते है
जिसे देख मेरे अंतस में अनगिनत *अकथ अनुभूतियाँ*
मुखरित हो उठती हैं
कि तुमने भी,
*काश! कभी सोचा होता,....*

*वाह! जिंदगी*
तुम भी न,.. जाने कैसे-कैसे सतरंगी ख्वाब दिखलाती हो,
*सुनो! जरा धीरे चलो न,..*
तुम्हारी *पगडंडियों पर चलते हुए*
जीवन कथा के सागर में
एक *कथासेतु* बनाना चाहती हूँ
जिससे मेरे अहसास पहुँच सके
*मुझ से,.. मुझ तक*।

हाँ!
सचमुच समझ सको
तो समझना मुझे तुम,...

*मैं,..*
*मनस्विनी*
जीती हूँ एक ही जीवन मे कई-कई रूप
कभी *मस्ती की पाठशाला* में खेल-खेल में
पर्यावरण संरक्षण के
*परंपरागत तरीके सीखना चाहती हूँ*
कभी सारी मस्तियाँ भूलकर हमारी *मातृभाषा*,
*हिंदी साहित्य, कला और संस्कृति में समन्वय* की बातें सोचती हूँ।
कभी *स्त्रीविमर्श* करती हुई
*आठवाँ फेरा* होता तो जैसे क्लिष्ट सवालों के जवाब ढूंढती हूँ।
अगले ही पल *सच का दीपक* लेकर
अनैतिकता के अंधकार में फैल रही *कृपण दशा* में
खोती जा रही
अपने *देश की आभा* तलाशती हूँ।
मेरे भीतर *बर्फ में दबी आग* की तरह दफन है
ढेर सारे भाव आक्रोश, गुस्सा, जिज्ञासा
लेकिन सबसे अधिक प्रेम, *परस्तिश* और *अहसास के मोती*!
लाख छुपाऊँ सबसे लेकिन उसकी *अनुगूँज* मेरे व्यक्तित्व में झलकने लगती है।
मेरे *मन का पंछी*
*संचरण* करता हुआ
*मेरी उड़ान* को ले चलता है *काव्य गवाक्ष* में
जहाँ पहुँचकर मैं देना चाहती हूँ अपने भावों की
*दोहांजलि*,  *काव्य कुसुमवाली* और कुछ *प्यासे नग़मे* अपने अपनों को,..
मैंने *जीवन माला* में पिरोये हैं
*उपासना के मोती* भी,
मेरे *अंतर्मन की धारा* में समाहित है  *गागर में सागर* सी,
उमंग और उम्मीद की लहरें,...!
मैं एक
*स्वप्न तरुणी*
मेरे हृदय के *स्पंदन* में सम्मिलित है
*कुछ रंग धूप के*
और
*यादें-कुछ खट्टी कुछ मीठी*
अकसर जो उतर आती है शब्दों में
*अन्तरा-शब्दशक्ति* की प्रेरणा से,...!
सुनो!
अपेक्षा और उपेक्षा के दौर से परे
चलें हाथों में हाथ लिए
हम एक नई डगर में
एक नए सफर में,..
एक नए स्वप्न के साथ,..
चलोगे न,...??

*डॉ. प्रीति सुराना*
*संस्थापक*
*अन्तरा-शब्दशक्ति*

मेरे जीवन का पूरा दर्शन

सुनो!

क्या खोया,क्या पाया?
इसका जवाब
सिर्फ इतना सा
कि
खुद को तुम में खोकर
तुमको खुद में पाया,...
मेरे जीवन का पूरा दर्शन
इसी समीकरण में समाया,..!

प्रीति सुराना

गिरफ्त

कुछ इस तरह
लिया है
दर्द ने गिरफ्त में अपनी,
कि
अपने ही वज़ूद में
तलाशना मुश्किल है खुद को,
पोर-पोर,
जिस्मोज़हन
सिर्फ
तड़प, तन्हाई, मायूसी, आँसू,
और
बस यादें, यादें, और यादें,...!
(खुशी के पलों की यादें भी
रुलाती हैं गम से ज्यादा)

उनकी मरजी,...!

मेरी चाहत
मेरा हक़ भी है
और
मेरा फ़र्ज़ भी,..
इंतज़ार पूरी रात हो
या उम्र भर
उनका आना
न आना
उनकी चाहत
उनकी मरजी,...!

प्रीति सुराना

बेसबब हँस लूँ?

बेसबब हँस लूँ???
कोई वजह मिल नहीं रही
पर मन तरस रहा है
अधरों पर मुसकान के लिए,..!

प्रीति सुराना

अनवरत नदी सी

मैं
बह रही हूँ
अनवरत
नदी सी
रास्ते में जो मिला
सुख-दुख
आँसू-हँसी
अच्छा-बुरा
कम-ज्यादा
क्योंकि
यात्रा का निर्धारित
अंतिम पड़ाव सागर ही है,...!

सुनो!
याद है न
तुमको तुम्हारा सागर होना?

फिर
लाख अवगुण हो नदी में
सागर नहीं नकारता
नदी के अस्तित्व को
खुद में समाहित करने से
क्योंकि
वो जानता है
सागर की उदारता
नदी के समर्पण के बिना संभव भी तो नहीं,... !

प्रीति सुराना

अनुभूतियाँ

सच!
इस तरह जुड़ी हूँ तुमसे
कि रूह का रूह से रूह तक नाता है,..
शायद इसीलिए
एक अजीब सी बेचैनी हो ही जाती है मुझे,
मानो जो कुछ भी घट रहा है
सही नहीं है,...
तुमको होते देखती हूँ
साजिशों का शिकार
वो भी उन लोगों से
जिन पर अथाह विश्वास करते हो तुम,..
जाने क्यों अकसर मिल ही जाता है
अन्तस से कोई संकेत,
तब मन चाहता है
कि हाथ पकड़कर रोक लूँ,...
और कहूँ
रुक जाओ
ये सही नहीं है,...
पर रोक लेती हूँ खुद को
क्योंकि कोई पुख़्ता कारण नहीं होता,
न कोई सबूत,
न कोई गवाह,
बस होती है तो अनुभूति,...
जिस पर विश्वास दिलाना
मुश्किल होता है
और मैं उलझकर रह जाती हूँ
नई उलझनों में,..
कैसे समझाऊँ तुम्हें
रूह के रिश्ते रूह को महसूस का लेते हैं,
सुख-दुख, भले-बुरे, होनी-अनहोनी,
सही-गलत, प्रेम-गुस्सा, फिक्र-परवाह,
सब कुछ,..
बस कुछ कहा होता है
कुछ अनकहा रह जाता है,..
सुनो!
तुम समझते हो न मुझे
तो समझना हमारे रिश्ते में बसे
अनुभूतियों के ताने-बाने भी,..
जिनके उलझने से बढ़ जाती है उलझनें हमारी भी,..
तुम्हारे लिए
मेरे अंतस में उठती अनुभूतियाँ भी तो
प्रेम ही है न,...!

प्रीति सुराना

नाता

आँसू का पीड़ा से नाता
सुख में भी पर साथ निभाता
समय नहीं बताता कुछ पर
समझे आँसू मन की बोली,..

क्या खोया और क्या-क्या पाया
अंत मे हासिल कुछ नहीं आया
बही-खाते कर्मों के खोले तो
अंतस की गठरी भी टटोली,..

आना-जाना जीवन का खेला
अनजान नहीं इस सच से कोई
फिर भी आशा के दीप जलाती
साँसे भी कितनी हैं भोली,..

आज आँसुओं ने की मनमानी
बहुत कहा पर एक न मानी
बार-बार एहसास दिलाती
द्वार खड़ी प्राणों की डोली,..

धूप-छाँव दोनों की सहेली
जीवन गोधूलि बड़ी सुनहली,
प्राण पखेरू उड़ने को आतुर
सुख-दुख खेले आँख-मिचौली,..

प्रीति सुराना

समझेगा कौन

ये है
मेरे दर्द की इन्तहां,..
कि
लड़ता-झगड़ता
चीखता-चिल्लाता
रोता-बिलखता
मेरा दर्द है अब
स्तब्ध और मौन,..
पर
समझेगा कौन?

प्रीति सुराना

बेमौसम

अंतस से पूरी कोशिश की
रोकूँ बेमौसम सावन को,
लेकिन समय के खेल निराले
वही चलाता जीवन को,
कोशिश ही है हाथ हमारे
बस मन कोशिश से न हारे,
तिनका-तिनका जोड़ रही हूँ
फिर से अपने बिखरे मन को,...!

प्रीति सुराना

हाँ! रोती हूँ,..!

हाँ!
रोती हूँ कभी-कभी बच्चों सी
बिलखकर
जब भावों का आवेग
रोके नहीं रुकता
लेकिन
अक्सर
घर के किसी कोने में
या तेजी से नल चालू करके
कभी बारिश में भीगकर
कभी प्याज काटने
या धूल और धुएँ की एलर्जी के बहाने
और भी जो-जो बहाने बना सकती हूँ
पर
कभी-कभी
मैं बिलखकर रोती हूँ
और सचमुच नहीं ढूंढती कोई भी बहाना
सिर्फ चाहती हूँ
थोड़ा सा प्यार
थोड़ा सा अपनापन
और
बहा देना सारा अवसाद,
गिले-शिकवे,.
आज दर्द ने सारी हदें तोड़ दी है
सुनो!
तुम्हारे कांधे पर सिर रखकर
रोने की बेइंतहा तड़प
ये भी प्यार ही है न!!!

प्रीति सुराना

बेहिसाब बारिश

पहले आए कई तूफान,
शीत लहर भी कम नहीं चली,
और अचानक कभी
बहुत तेज धूप
मानो सूरज आग बरसाने को हो तत्पर,
तेज हवाएँ, ओले, बारिश
कभी भी, कहीं भी,.
सच कहूँ डर लगता है
मौसम के इन बदलते तेवरों से
देखो न!!
आज भी खुला था मौसम
चार दिन की बदली
दो दिन की आँधियों
और फिर अचानक निकली तेज धूप के बाद
आज बेहिसाब बारिश,...
क्यूँ होता है ऐसा
हो जाती है बेमौसम बरसातें
और
बेसबब बातें,...
हाँ!
आस्था की तरह अटूट विश्वास के बाद भी
कि जो भी होगा सब अच्छा ही होगा
कहीं भीतर कुछ पल को दहल जाता है मन
सुनो!
डर तुम्हे खोने का नहीं
डर इस बात का की बदलते मौसम
हाल और हालात न बदल दें,..
न खुद को बदलकर,
न तुम्हे बदलने देकर
नहीं चाहिए कुछ भी
सब कुछ जैसा है
वैसा ही मुझे चाहिए
चाहे मौसम कोई भी हो,..
तुम पर मेरा यूँ हक़ जताना,..
ये भी तो प्यार ही है न!

प्रीति सुराना

कमी

मैं मुस्कुरा लूंगी
आँखों में नमी लिए,

जो दिला दो तुम ये यकीन मुझको,

खुश रह लोगे ताउम्र
जिंदगी में मेरी कमी लिए,..

प्रीति सुराना

तुम संभाल लोगे

ए जिंदगी!
माँ के गर्भ से
जब दुनिया में आई
चलना तो बहुत दूर
पैर जमीन पर रखना भी नहीं आता था,
समय चलता रहा
गोद से उतारकर
माँ ने जमीन पर छोड़ना शरू किया
बचपन के किस्सों में
घुटनों पर चलने से लेकर
पैरों पर चलना सीखने के किस्से भी हिस्से हैं।

पैरों पर चलना
माता-पिता और परिवार ने सिखाया
जिंदगी में ठोकरों ने रुलाया बहुत
फिर समय और परिस्थितियों ने
संभलना सिखाया।

आज जब करती हूँ "आत्ममंथन"
पाती हूँ खुद को अहम के शीर्ष पर
इस वहम के साथ कि जो किया मैंने किया
मैं गिरी, मैं उठी, मैं सम्भली और फिर चल पड़ी।
पर सच ये है कि हमेशा साथ रही
अपनो की दुआएँ, प्रेम और विश्वास
और लक्ष्य था अपनों की खुशियाँ,...।

कुछ दायरे बढ़े सोच के,
और बने बनाए रिश्तों से परे
चुने खुद अपने भी, सपने भी और लक्ष्य भी,
जब दायरे बढ़े, तो रास्ते भी बढ़े,
और रास्ते में मुश्किलें और ठोकरें भी,
आज फिर संभलने की तमाम कोशिशों के बाद,
अहम के साथ-साथ सारे वहम भी टूटने लगे हैं,

दर्द-मर्ज, मन-मान, अर्थ-व्यर्थ,
चरित्र-ईमान, संस्कार-विश्वास,
कर्तव्य-अधिकार, मिलन-विछोह,
अपेक्षा-उपेक्षा, तेरा-मेरा,
आरोप-प्रत्यारोप, टूटना-तोड़ना,
बिखेरना-मिटाना,
इन सारी बातों और परिस्थितियों में
अब मैं
मन से हारने लगी हूँ,
फिर से टूटने लगी हूँ,
फिर से डरने लगी हूँ,
फिर से बिखरने लगी हूँ,..

कहते हैं
सकारात्मक सोच जीवन की दशा बदल देती है
यही सोचकर हर बार
तिनका-तिनका उम्मीद जोड़कर
सपनो का घरोंदा बसाती रही,
जीती रही, मुस्कुराती रही।
उन घरोंदे में प्रेम, विश्वास, समर्पण,
शेष रहे
तो उम्मीदें जीती रहेगी,
हौसले गिरते-संभलते, पर जीते रहेंगे।
लेकिन
सबकुछ समय की आंधी उजाड़ जाए,
तो??

आज
एक बार
खुद को फिर संभाल रही हूँ
भींचकर खुद को खुद की बाहों में,
रोकर अपने ही घुटने पर सिर रखकर,
जुटा रही हूँ हौसला
लड़ रही हूँ खुद से खुद की लड़ाई
पर जो होगा, अच्छा होगा।
और जो मेरा है वो मेरा ही रहेगा,
छूट वो जाएगा जो मेरा था ही नहीं था,...

हर भ्रम से परे
आज भी जीने की एक और कोशिश,
इस उम्मीद के साथ,
कि तुम तो मेरे हो,....
माँ की गोद में लौट जाना नियति नहीं है,
पर लड़खड़ाए जो कदम तो संभाल लेना तुम,..
तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी
"तुम संभाल लोगे"
ये अटूट विश्वास भी तो प्रेम ही है न??

हाँ, मुझे यकीन है कि ये प्रेम ही है,..!!

मेरी पीर

मन है बड़ा अधीर,
रोके नहीं रुकते नीर,
समझो न मेरी पीर!

प्रीति सुराना

जी भर नहीं

क्या क्या कहें
और क्या नहीं?
जी तो लिया
पर जी भर नहीं,....!

प्रीति सुराना

असीम

हद नहीं बेहद
सीमित नहीं असीम
पीर नहीं प्रीत,...।

प्रीति सुराना

किताबें

किताबें ही संगी, किताबें ही साथी,
लिखनी है सब जरूरतें बुनियादी,
फिर सिमट आयेंगे पन्नों पर,
यादें, सपने, भावों की आज़ादी,..

प्रीति सुराना

लौट आना,...

लौटाना,
लौट आना
और लौट जाना
कितना अजीब है
शब्दों का भ्रमजाल
पर स्पष्ट हों सारे अर्थ
तो सुनने और समझने में
बिल्कुल सहज,..

सुनो!
तुम समझते हो
मुझे मुझसे ज्यादा
तो लौटाना मेरे हिस्से की धूप,..
क्योंकि वाकई लौट जाना चाहते हैं
अब अंतस के गहरे काले बादल,..
और लौट आना चाहते हैं
सुनहरे आस के पँछी एक बार फिर,..
आस, विश्वास और एहसास
ये भी मिलकर पाना चाहते हैं
अपने हिस्से का आकाश,..

लौट आना
और लौटाना सारे एहसास
खुशियों के पलों का लौट जाना
कर रहा है उदास
हाँ! प्रेम था,
प्रेम है,
प्रेम रहेगा,... रखना विश्वास
जिंदा रखती है मुझे
तुम्हारे साथ होने की आस,...

क्योंकि,... ये सच्चा है और ये प्रेम ही है,..!!!

प्रीति सुराना

संवर के देखा

जी करके देखा
मर-मर के देखा।

पहले टूटकर फिर
बिखर के देखा।

असम्भव लगा जो
वो करके देखा।

दुर्गम रास्तों से
विचर के देखा।

यादों की गलियों से
गुज़र के देखा।

निश्छल निर्झरणी सा
झर-झर के देखा।

अन्तर की गहनता में
उतर के देखा।

चलते हुए पलभर
ठहर के देखा।

निडरता को छुपाया
और डर के देखा।

भावों के सागर से
उबर के देखा।

मन को गुबारों से
भर-भर के देखा।

जब बिखरे बहुत 'प्रीत'
तब संवर के देखा।

प्रीति सुराना