खुद में ही सिमट गए
स्वीकार नसीब के लिखे,
किसे पुकारें आज हम
सभी दुखी दुखी दिखे,
भीगी है पलकें
मन भी उदास है
मेरे दर्द की दवा
न किसी के पास है
दर्द भी बताएं किसे
सभी तो दर्द में दिखे
किसे पुकारें आज हम
सभी दुखी दुखी दिखे,..!
आस टूटने लगी
मिटे खुशी के लेखे
अकेलापन साथ है
आसपास जब देखे
लेखे जोखे किये कर्म के
पुण्य से अधिक पाप दिखे
किसे पुकारें आज हम
सभी दुखी दुखी दिखे,..!
दोष किसी का नहीं
समय ही कुछ अजीब है
सब कुछ है जिसके पास
आज वो भी गरीब है
दूरियाँ मनों में बहुत थी
जो ज्यादा पास-पास दिखे
किसे पुकारें आज हम
सभी दुखी दुखी दिखे,..!
खुद में ही सिमट गए
स्वीकार नसीब के लिखे,
किसे पुकारें आज हम
सभी दुखी दुखी दिखे।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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