Monday, 20 July 2020

प्रिय जिज्ञासा

तुम जितना बढ़ती हो
माथे पर उतना ही चढ़ती हो
बढ़ती है इच्छा तुम्हें शांत करने की
पर होते हैं अनेक प्रश्नचिन्ह
जिसका संतोषप्रद उत्तर देने वाला 
कोई नहीं
सिवाय प्रकृति और मन के सामंजस्य के
तुम न शांत होती हो न खत्म!
पर सत्य ये भी तो है
तुम्हारा होना जीवन को देता है 
एक अर्थ 
एक उद्देश्य
बुद्धि के लिए तुम कसौटी का कार्य भी तो करती हो!
आभार तुम्हारा ओ जिज्ञासा🙏🏻

#डॉप्रीतिसमकितसुराना

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