हाँ!
दोस्ती किताबों की,
जिसे हम तन्हाई का साथी कहते हैं
पर सच तो ये है
किताबें बोलती है
सुनती नहीं
रास्ता दिखाती है
साथ ले जाई जा सकती है
पर खुद चलती नहीं
किताबें तब तन्हाई में साथी होती हैं
जब हम गुनना चाहते हैं,
पढ़ना चाहते हैं, सुनना-समझना चाहते हैं
अकेले बैठकर खुद को।
तब नहीं
जब हम साथ चाहते हैं किसी का,
जो रख ले अपने कांधे पर हमारा सिर,
और सहला कर हौले से कह दे
सब कुछ मुझपर छोड़ दो,
यकीन करो
तुम्हारे साथ, तुम्हारे पास, तुम्हारा होकर
मैं हूँ न!
बिल्कुल अलग है दोस्ती
और
दोस्ती किताबों की,..!
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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