जी रही थी
कुछ बातों को दरकिनार करके
अपने वजूद की लड़ाई
जो अब नहीं लड़ी जाती मुझसे!
बचपन से
मेरी आदत रही है
दोस्ती में रिश्ते ढूंढने की बजाय
हर रिश्ते को दोस्ती की तरह जिया मैंने!
रही बेपर्दा
नियत और नियति दोनों से
कभी छुपाया नहीं कुछ भी
खुली किताब की तरह!
जैसी हूँ वैसी हूँ,
छल नहीं मुझमें
रिश्तों का सम्मान करती हूँ
हमेशा निःस्वार्थ!
अब मेरी भावनाओं का
स्वीकार या अस्वीकार
रिश्तों की मर्जी
बस इतनी ही दरकार!
आखरी बार,...!
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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