पीड़ा मुझसे न सही जाए
उस बिन इक पल चैन न आए
कोई खुशी भी रास न आई
ए सखि साजन? न री दवाई।।
सर पर लेकर घूमूं अकसर
काम करुं कमर पर कसकर
साथ बिना लांघूं न देहरी
ए सखि साजन? न सखि चुनरी।।
कह मुकरी
जब मैं चाहूँ तब इतराये
बड़ी मुश्किल से लब तक आये
जब आये मिट जाये थकान
ए सखि साजन? न सखि मुस्कान।
*चलते-चलते* जब वो अकड़े
हालत मेरी भी तब बिगड़े
साथ उसी के जीवन में लय
ए सखि साजन? न सखि समय।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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