मजदूर का बड़ा सा परिवार, जिसका हर प्राणी रोजी-रोटी कमाता और पूरा परिवार खुशहाल था। पर उनमें से कोई भी स्थायी नौकरी पर नहीं था।
महामारी फैलते ही सभी खाली हो गए, न कोई रोजी न कोई काम, गरीबों को मिलने वाला राशन पेट तो भर रहा था पर बड़े परिवार में पलती बेटियाँ जो रोजी से मुक्त घर पर रहने लगी वो हुई हवस का शिकार, अपने ही कुनबे और मोहल्ले में।
समझ से बाहर थी यह बात कि पेट की भूख मिटाने के बाद क्या खाली दिमाग मे हवस ने जगह ले ली?
ये कैसी भूख? 14 दिन बाद क्वारेन्टीन से लौटा बेटा जो शहर से बाहर नौकरी करता था तो पाया जहर खाकर पूरे परिवार ने भूख से नहीं बेटी की बदनामी के डर से आत्महत्या कर ली?
कैसा समाज है यह, जिसमें भूख से ज्यादा नशे और हवस के भूखे दरिंदे रहते हैं?
जवाब ढूंढना जरूरी है :(
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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