आज शहर में कर्फ़्यू का तीसरा दिन है, आज ही सोहन के पिता का तीसरा यानि उठावना है।
दंगे धर्म के नाम पर और विडंबना ऐसी कि चार कांधे नहीं मिले सोहन के पिता को कर्फ़्यू के कारण। सोहन के दोनों बेटे जो बारह और पंद्रह साल के थे। अर्थी को पीछे से कंधे देकर चल रहे थे और आगे से हांडी को कुहनी में लटकाए, दोनों हाथों से अर्थी को उठाए तीन लोगों ने कर्फ़्यू में जाकर अन्तिमसंस्कार किया।
विधि का विधान ऐसा कि समाज का मुखिया तीन के फेरे में ऐसा पड़ा कि हिंदुओं के मसीहा बने सोहन ने दंगे के तीसरे घंटे में अपने पिता को खो दिया और अंतिम क्रिया के बाद का तीसरा दिन ही उसकी समस्त अंतिम क्रियाओं का दिन बन गया।
अराजकता का पोषक सोहन निंदा, उकसाना और फूट डालना इन तीन बीजों से उपजे वृक्ष का फल खुद ही बन गया।
हाँ! सचमुच आज सोहन के पिता का तीसरा दिन और अंतिम क्रिया थी और लोग थे सिर्फ तीन क्योंकि दंगे भड़काए भी तो सोहन ने ही थे।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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