Tuesday, 28 April 2020

कहाँ खोए हुए हो?

सुनो!
कहाँ खोए हुए हो?
संभालना ज़रा,
प्रकृति बदल रही है
तुम्हारी प्रकृति के विपरीत,
कहीं दर्द न बढ़ जाए
जोड़ों का
मैं जानती हूँ
तुम भी नहीं सह पाते 
बदलाव
मौसम का
भावनाओं का
रिश्तों का
मेरी तरह,..!
दर्द की गहनता भी समझती हूँ
क्योंकि सहती हूँ हर बार
खुद मैं भी!
और
तुम्हारे दर्द 
मेरे दर्द को दुगना कर देते हैं
शायद तुम ये भूल गए हमेशा की तरह,..!

#डॉप्रीतिसमकितसुराना

0 comments:

Post a Comment