माँ हूँ
अपने बच्चों को
पीड़ा में देखती हूँ
तो हृदय बिंध जाता है
कोशिश करती हूँ
हर लूँ अपनी संतानों का हर दुख
कोख से जना है जिन्हें
उनके लिए जान देकर भी,..
जबकि देखती हूँ
कितने ही बच्चों को
आगे बढ़ने की लालसा में
अपनी माँ भी बोझ लगने लगती है
ठीक वैसे ही
जैसे चाँद की तमन्ना है और धरती नहीं संभलती।
मैं समझ सकती हूँ
धरती का दुख क्योंकि मैं भी माँ हूँ!
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



बहुत सुन्दर प्रस्तुति
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