करते हो कैसी बात ये,
अनचाहे हैं दिनरात ये।
आफत ये कैसी आ गई,
है बेमौसम बरसात ये।
खुशियाँ तो मिलती ही रही,
समय दिखाता औकात ये।
हरियाली में नाँचे बहुत,
लो देखो बिखरे पात ये।
घटित फलित सोचा ही नहीं,
यूँ ही लगता आघात ये।
ढलती है काली रात भी
समझो है कुछ सौगात ये।
है सीख कुदरती कहर की,
सोचो है कोई मात ये।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



0 comments:
Post a Comment