Sunday, 18 February 2018

चुभते आंसू

सुनो!
बहुत चुभते हैं वो आँसू
जो सूख जाते हैं
देर तक अटके रहने पर
पलकों पर,..
क्योंकि
बह जाने दूँ
तो तुम्हारा दिल टूटता है
पी जाऊं
तो मेरा दिल दुखता है,..
छुपाने की अन्य जगहें
बहुत तलाशी
पर पलकों से बेहतर
कोई विकल्प न मिला,..
खैर!
तुम्हारे दो मीठे बोल की खातिर
सारी कड़वी बातें मंजूर
और हाँ!
सूखकर चुभते आंसू भी,..
वैसे भी
तुम्हें पसंद जो है
मेरी ख्वाबों से भरी,
आँसुओ को छुपाकर
प्रेम छलकाती
भीगी पलकें,...

प्रीति सुराना

1 comment:

  1. निमंत्रण :

    विशेष : आज 'सोमवार' १९ फरवरी २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच ऐसे ही एक व्यक्तित्व से आपका परिचय करवाने जा रहा है जो एक साहित्यिक पत्रिका 'साहित्य सुधा' के संपादक व स्वयं भी एक सशक्त लेखक के रूप में कई कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। वर्तमान में अपनी पत्रिका 'साहित्य सुधा' के माध्यम से नवोदित लेखकों को एक उचित मंच प्रदान करने हेतु प्रतिबद्ध हैं। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

    ReplyDelete