Sunday, 4 June 2017

*अंगूठाछाप*

"निहाल ने आत्महत्या करने की कोशिश की" सुन कर सारा मोहल्ला स्तब्ध था। मोहल्ले के ही नही शहर का मैरिट लिस्टेड बच्चा जो सबसे होनहार होने के साथ साथ सुंदर और सहृदय भी था। सबका चहेता निहाल आखिर ऐसा करेगा क्यों सोचकर सभी हैरान थे।        
       उसके पिता ने रिक्शा चलाकर उसे आई आई टी में मैकेनिकल इंजीनियर बनाया। पूरा शहर उसके पिता की इज्जत करता है।
         एक हफ्ते बाद एक ऑडिट टूर से लौटी थी जैसे ही मोहल्ले की भीड़ में शामिल हुई तब पता चला कि नौकरी न मिलने से बेरोजगारी की निराशा इतनी हावी हुई कि उसने ये भयावह कदम उठा लिया।  पास ही झुग्गियों में उसका घर था कदम खुद ब खुद बढ़ चले उसके घर की ओर।
        घर पर सावित्री यानि उसकी मां और उर्मिला उसकी छोटी बहन है जिसने अभी अभी बारहवीं पास किया है, दोनों ही सिलाई मशीन में जल्दबाजी में काम निबटाते हुए दिखाई दीं। मुझे देखकर सावित्री उठ खड़ी हुई और मेरी तरफ धीरे से टेबिल बढ़ाया। और नमस्ते करके बोली बहनजी आपका आना बहुत अच्छा लगा जानती हूं निहाल आपका बहुत लाडला है।
     मैने पूछा अब कैसा है और ऐसा क्यों किया उसने?
        बिना झिझके या रोए वो बोली पढ़ाई उसके सर पर हावी हो गई थी इसलिए छोटे काम कर नही पाता और बिना घूस के बड़ी नौकरी मिली नही तो मुए को मरना आसान लगा। एक बार न सोचा जिस बाप ने पेट काट कर पढ़ाया वो उसे बचाएगा कैसे?
         मैंने उसकी बात बीच में काटते हुए पूछा अब कैसा है? खर्च के लिए व्यवस्था हुई? तब तक सावित्री पानी ले आई। मैं तो घर मे घुसी भी नही सीधे यहाँ आ पहुंची पानी पीकर राहत मिली।
         तभी सावित्री बोल पड़ी। उसके पिता के किये काम अस्पताल के डॉ भी जानते थे इसलिए खुद्दारी को जानते हुए अस्पताल में सफाई का काम दे दिया। बहुत प्रयासों से उसे बचा भी लिया। सुबह 5 बजे अस्पताल की सफाई के लिए जाते हैं हम दोनों। तब तक उर्मिला खाना बना लेती है। उसका बापू रिक्शा लेकर चला जाता है। पास की प्राइवेट स्कूल के बच्चों की सिलाई का काम दिलवा दिया निहाल के बापू के मित्रों ने वो काम हम दोनों माँ बेटी कर रहे हैं। 4 दिन और रहेगा अस्पताल में। पर 50000 रु लग गए उसे बचाने में। उसके कंधे पर हाथ रखा और निःशब्द उर्मिला के माथे पर हाथ फिरते हुए जाने की इजाजत मांगी।
        रास्ते भर मंथन चलता रहा कि छोटे काम करके बड़ा आदमी बनना अपने पिता से नही सीख पाया निहाल। और एक *अंगूठा छाप* पिता एक बार फिर अपने बेटे को जिंदगी दे गया। तरस आ रहा था युवा पीढ़ी की सोच पर। स्वतः ही उसके माता- पिता के लिए नतमस्तक हो मेरे हाथ जुड़ गए। मन ही मन बुदबुदाती हुई समान उठाकर घर की सीढ़ियां चढ़ी -
''ऐसे पढ़े लिखों से अंगूठा छाप भले"

प्रीति सुराना

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-06-2017) को
    रविकर शिक्षा में नकल, देगा मिटा वजूद-चर्चामंच 2541
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. सच जाने क्यों हम एक तरफ तो कहते हैं की कोई काम छोटा या बड़ा नहीं फिर उसे करने में झिझक क्यों? आज की पीढ़ी अपने माँ-बाप की मेहनत देखते ही नहीं , अक्षर तो पढ़ लेते हैं लेकिन सबक नहीं

    प्रेरक कहानी

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