Wednesday, 7 December 2016

जी करता है

विष्णुपद छंद पर

16 10 अंतिम गुरु
एक गीत का प्रयास

जी करता अब जी भर जी लूँ,
साथ मिला तेरा ।
हँस कर सह लूँ सुख दुख सारे,
कहता मन मेरा।।

अंतस पर घनघोर घटा के
मौसम आए थे,
उमड़ घुमड़ दहशत के बादल
नभ पर छाए थे,
बिखरे बिखरे मन को मेरे
गम ने था घेरा।
जी करता अब जी भर जी लूँ,
साथ मिला तेरा

हँस कर सह लूँ सुख दुख सारे,
कहता मन मेरा।।

आज सजाये सपने फिर से
सोच नई पाई,
छोड़ निराशा की बातों को
नव आशा लाई,
मिट जाए अब गहन अंधेरे
हो नया सवेरा,
जी करता अब जी भर जी लूँ
साथ मिला तेरा।

हँस कर सह लूँ सुख दुख सारे
कहता मन मेरा।।

पथ में कांटे बहुत बिछे थे
डर के थे साये,
महका मेरे मन का उपवन
फूल तुम्ही लाये,
फिर से मेरे मन आंगन में
खुशियों का डेरा,
जी करता अब जी भर जी लूँ
साथ मिला तेरा।

हँस कर सह लूँ सुख दुख सारे
कहता मन मेरा।।

प्रीति सुराना

8 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8 - 12- 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2550 में दिया जाएगा ।
    धन्यवाद

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  2. उम्दा रचना भावों की साफ सुंदर अभिव्यक्ति.

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  3. बहुत सुन्दर ...

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  4. बहुत बेहतरीन !

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