Sunday, 12 August 2012

मेरे साथ


सुनो!

मैं जानती हूं
कि नही है तुम्हे पसंद
बंधनो में बंधकर जीना,
और तुम्हारा व्यक्तित्व भी तो सागर सा ही है,
विशालता और गहनता तुम्हारा मौलिक गुण जो है,..

ये महानता है तुम्हारी कि
सागर की तरह तुम समेट लेते हो सबकी मलिनता,
जैसे सागर नहीं पूछता नदियों से उनका उद्गम स्थल,
बिना भेदभाव के सबकुछ एकसार हो जाता है उसमें
पर वो हमेशा खारा और मलिन ही कहलाता है,...
जबकि ये उसका मौलिक स्वभाव नही है,..

सागर कभी अपने मन का गुबार भी निकाले,
तो लोग कहते हैं ज्वार आया,..
कभी खुद को समेटने लगो तो भाटा,..
पर ये भूल जाते हैं कि ये ज्वार,
कितनी अमूल्य ऩिधियां छोड़ जाता है समुद्र तट पर,...
और ये भाटा समेट लेता है सागर तट की सारी मलिनता खुद में,..

सागर प्रति सबकी कृतघ्नता से
उद्वेलित होता है मेरा मन,..
कि नमकहलाली का दावा करने वाले भी
भूल जाते हैं कि जीवन के लिए महत्वपूर्ण
नमक का अस्तित्व भी संभव नही
सागर के बिना,...

मैं चाहती हूं कि
एक बार तुम फिर नदी बनकर जियो,
जों दो किनारों में प्रतिबंधित होकर भी जीती है स्वच्छंद,
अविरल बहती हुई वह भी तो बहा ले जाती है सृष्टि की मलिनता,...
हर नदी मीठी नही होती,
पर कोई नही कहता उसे खारा,..

और
नदी की तरलता और सरलता के गुनगान करने वाले,..
ये अकसर भूल जाते हैं
कि जब नदियां अपना सब्र खोती हैं,
तो टूट जाते हैं किनारों पर बांधे गए बांध और तब आता है सैलाब,..
और जब नदियां सिमटकर सूखने लगती है तो पड़ता है अकाल,..

क्यूंकि
नदी अपना रवैया दिखाकर
पा लेती है पू्रा मान सम्मान,
जिसकी वो हकदार है,...
जबकि अंततः उसे मिल जाना है,
अपना अस्तित्व खोकर सागर में,...

तो फिर 
सिर्फ एक बार बंध जाओ न,
तुम भी रिश्तों के बंधनों में,..
आखिर तुम सागर हो तो अंततः सागर ही बनना है तुम्हे,..
तो कुछ पल जी लो बंधी नदी सी स्वच्छंद जिंदगी,...
मेरे साथ,....प्रीति

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