Wednesday, 11 April 2012

खरपतवार


मैने बोये अपने मन के आंगन में
भावनाओं और सपनों के बीज,
जिसमें 
प्यार और विश्वास की खाद डाली,
अपनेपन के जल से सींचा,
संस्कारों  की प्राणवायु भी संचारित की,
सुख दुख की धूप छांव से पोषित किया,
उसमें
मैंनें समय समय पर 
कठोर यथार्थ रूपी दवाओं का 
छिड़काव भी किया,
सच के कांटो की बाढ़ से सुरक्षित भी रखा,
और 
इंतजार किया उन बीजों के पनपने का,
फूलने और फलने का,
और वक्त के साथ ऐसा हुआ भी,
पाई मैंने एक अच्छी फसल,
पर 
फिर भी मैं न ऱोक पाई
फसल के साथ साथ
क्रोध,ईर्ष्या,झूठ,लालच,स्वार्थ
जैसे खरपतवारों को उगने से,
अब 
मुझे ढूंढने है उपाय
मन को खरपतवार रहित 
खिला खिला चमन बनाने के,...
अब करनी है तैय्यारी नई फसल की,......प्रीति

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