Wednesday, 7 December 2011

"तुम्हारे अस्तित्व की मौत पर"


आज सुबह मैं नींद से जब जागी,
बहुत अजीब सा महसूस किया,
शरीर में बहुत हल्कापन
पर मन में बहुत भारीपन था,...
मैं तो गहरी नींद से जागी थी,
पर मेरी आंखो की कोरें गीली 
और तकिया भीगा था,..


बहुत सोचा,
याद किया कि 
आखिर हुआ क्या था????
पर जब कुछ याद न आया 
तो हार कर दिल से पूछा,..
दिल ने कहा
तुम तो चैन से रातभर सोई
पर तुम्हारी आंखें बेचारी रातभर रोई,..
मैने पूछा क्यूं????
जवाब मिला 
रातभर तुम्हारे मन के आंगन में चलता रहा 
"अंतरद्वंद"


खुशियों को गम ने दबोचा,
अरमानों को दुनिया के तानो ने दबाया,
सपने वास्तविकता के हाथो मारे गए,
सच का गला झूठ ने घोंट दिया,
मंजिलों का रास्ता बंदिशों ने रोक दिया,
संस्कार समय के हाथो कुचले गए,,....


अंत में 
दुनिया के ताने,गम,झूठ और बंदिशों ने
वास्तविकता और समय के साथ मिलकर 
तुम्हारे अस्तित्व को मार डाला,..
और 
"तुम्हारे अस्तित्व की मौत पर",
तुम्हारी भावनाओं ने 
तुम्हारे मन के आंगन में मातम मनाया,..
तुम्हारी आंखें रातभर रोती रही 
और 
तुम रात भर चैन से सोती रही,...प्रीति

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