Friday, 17 February 2012

मै गृहणी हूं


सुन सखी...! 
तू क्यों करे कोई पश्चाताप???

माना कि तू गृहणी है,
कभी सोचना तू भी ऐसा,
मैने जैसा सोचा था,...
मैं भी तो एक गृहणी हू,
तुझ जैसा ही जीती थी,
सब के सुख दुख सहती,
अपने सपने और इच्छाओं को,
खुद मे समेटे घुटती थी,
मन के भीतर पीड़ा को सहकर,
आत्मसमर्पण करती थी,

एक दिन मन बहुत ही व्यथित हुआ,
मन में अंतर्द्वंद चला,

लगा तालाब की परिधी में ठहरा हुआ पानी हूं मै,
काश मै नदी सा बह पाती,
पर आखिर में जाकर सागर मे ही तो मिल जाती,

सोचा मै पिंजरे का कैद पंछी हूं
काश गगन में उड़ जाती,
पर छोड़ के सपनो का घरोंदा नया घोंसला कंहा बनाती,

माना कि दर्द के भूकंप भी झेले,
सुख के भी तो लगे थे यंहा मेले,
माना सही बीहड़ वन सी तनहाई,
तो कभी विपदाओं के अंधड़ भी आए,

मुश्किल अंधेरों से बाहर आए,
पर तेज तपन भी सह नही पाए,
कितने कितने उतार चढ़ाव, 
पर्वत और घाटी से आए,

सैलाब भी तो आया था प्यार का,
रिश्तों के कितने पौधे लगाए,
दिल में सर्द एहसासों का मौसम,
सपने अरमानो और हसरतों के पतझड़ भी आए,

और कभी आंखों से सावन खूब बहाए,
अपने इस घरोंदे को मैने तिनके तिनके से बनाया,
प्रकृति के हर रंग से मैने इसे सजाया,
मैं ही तो हूं इंद्रधनुष अपने इस रैन बसेरे का,

हर स्वाद और जायका मैने यंही पकाया था,
सबकुछ तो है इसी आंगन में,
जिसे मैनें सपनो से सजाया था,
अब जाकर मुझमें ये विश्वास और गौरव आया,

मैं हूं धरती,
और
ये घर और परिवार है मेरी परिधी,
मेरे बिना मेरा संसार अधूरा,
और ये परिवार मेरी धूरी है,
मैं प्रकृति हूं
मैं सृष्टि हूं
मै नारी हूं
मै गृहणी हूं,.....प्रीति

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