हाँ!
है हौसला मुझमें
कि तोड़ दूँ
अनपेक्षित बंधनों की कैद,
और
मुझमें ये हुनर भी है
कि तराश लूँ
खुद को अपनों की
अपेक्षाओं के अनुरुप,..!
नहीं है स्वीकार
कोई अनैतिक अधिकार
कोई अत्याचार
कोई दुर्व्यवहार
मुझे बंधन केवल वही स्वीकार है
विश्वास और प्रेम हो जिसका आधार!
सनद रहे!
संगतराश हूँ मैं,
अगर तुम पत्थर दिल हो!
और
सृजन का हुनर दिया है विधाता ने,
तराशना सिखा दिया मुझे समय ने,
समर्पण सीखा है धरती-अम्बर से,
अबला समझकर भूल की जग ने।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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