हर एक को खुश रखना
मेरे बस में नहीं था,..!
फिर मैंने खुद को
गुलाब सा कर लिया
जो दर्द देने को आता पास
उसे चुभ जाती हूँ कांटों सी
पर जिसने भी
दिया हृदय को हृदय से
अपनेपन का सुखद स्पर्श
उसे मिली खुशियाँ और हँसी
गुलाब की महक सी।
और तो और मिटकर भी
अपनों के लिए
मेरे अवशेष बन सकेंगे 'गुलकंद'
बस इससे ज्यादा सबकी खुशी
मेरे बस में नहीं,..!
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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