जाने किसका जीवन कैसे बीत रहा है।
जाने कौन कहाँ किससे भयभीत रहा है।
गुमसुम गुमसुम सूना सूना है हर कोना,
कोयल की कूक बिना सुर का गीत रहा है।
हर मौसम बेमौसम ही लगता है अब तो,
आँखों से भी सूखा सावन रीत रहा है।
जीवन में अब खेल नहीं भाता है कोई,
छल जिसको आते हैं वो ही जीत रहा है।
सुख के पल का साथ नहीं चलता है ज्यादा,
थोड़ा-थोड़ा करके सब कुछ रीत रहा है।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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