बारिश की पहली फुहार
और तन्हाई का ये मंजर
तुम बिन जीने को सहने का
प्रकृति प्रदत्त अवसर
ताकि कोई न जान सके
मैं तड़पकर कितना रोई
टूट कर कितना बिखरी
बिखर कर तुम्हारी खातिर
फिर कैसे संभली?
मेरे गमों के राजदार
बारिश और तन्हाई का ये मंजर!
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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