Sunday, 14 June 2020

ये नहीं होना था!



मैं जब भी सुनती हूँ किसी आत्महत्या के बारे में,
सोचती हूँ
क्या जीवन इतना भी दुष्कर हो सकता है
कि कुदरत की दी अनमोल सांसें अपने ही हाथों मिटाकर 
आत्मा को शान्ति मिल सकती है!

हर कोई निराश होता है कभी न कभी
तन से, मन से, धन से, 
लेकिन सबसे अधिक निराशा होती है जन से,..
नहीं! नहीं! तथाकथित स्वजन से!
पर जीवन की कीमत जीवन तक ही है!

मैं भी गुजरी हूँ कठिन से कठिनतम दौर से निराशा के,
मरकर तो मौका ही खो दूँगी खुद को साबित करने का,
बस यही जज्बा बचा लेता है हर बार इस दुष्कृत्य से!

पर हर बार तब-तब मैं पाती हूँ मैं आत्महत्या के मुहाने पर नहीं खड़ी थी
ये तो हत्या होती अगर हो जाती,
और हत्यारा होता वो जो निराशा का ऐसा सबब बना 
कि मौत आसान लगी जीने के संघर्ष से!

बहुत हिम्मत लगती है ये कदम उठाने में,
उम्रभर जो पाया उसे पलभर में मिटाने में,
ये कायरता नहीं घुटन का परिणाम होता है!

कोई न कोई जीवन में ऐसा होना चाहिये जो ऐसे मोड़ पर हाथ थाम ले,
कह दे ऐसे जाना गलत है-बिल्कुल गलत,
समझाए लड़ो आखरी साँस तक पर साँसों की हत्या मत करो!

अकेलापन, नैराश्य, मत्वाकांक्षाएँ, अपेक्षाएँ और प्रतिद्वंदिता जनक है इस दुष्कृत्य की!
ये आत्महत्याएँ तन-मन-धन नहीं स्वजन की कमी का परिणाम है।

सुनो मानव!
सोचो, समझो, सीखो, किसी अपने को अकेलेपन से कैसे बचाया जाए।
चलो आज किसी को जीना सिखाया जाए!

#डॉप्रीतिसमकितसुराना
#sushantsinghrajput

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