स्वार्थ, झूठ-कपट,
क्रोध, घृणा, ईर्ष्या,
और प्रतिद्वंदिता के माहौल में
घुट कर मर रही थी।
जाने कितने हिस्सों में बंटी
जाने कितने टुकड़ों में जीती रही
कर्तव्य के नाम पर सदा मिटती रही
फिर संवरने से डर रही थी।
इच्छाएं, सपने, लक्ष्य,
कला, कर्म, लगन सब के साथ
प्यार ने सहेज कर रखा मुझे
वरना मैं पल-पल बिखर रही थी।
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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