Sunday, 3 May 2020

गहराती साँझ और मेरी उम्मीदें

गहराती साँझ और मेरी उम्मीदें

डूबते सूरज को देखकर
होने वाली निराशा
स्वाभाविक नहीं थी
बल्कि
किसी अपने एक बार डाँटा था
डूबते सूरज के साथ कि फ़ोटो मत लगाओ,
शुभ नहीं होता
तब से साँझ से भी डरने लगी थी मैं,..!
साँझ कभी छत पर नहीं जाती थी
एक रोज संयोग से
सागर किनारे जाना हुआ
और साँझ के गहराने का आभास भी नहीं हुआ,..!

तभी
मन का चिंतन बदला
कुछ देर में रात हो जाएगी
और तभी तो सुबह आएगी
सूरज कब डूबता है
घूमती तो धरा है
धूरि पर भी और परिधि पर भी
तभी तो रात-दिन
और दिनों से माह और वर्ष का चक्र चलता है।
रात नहीं होगी तो मेरे अपनों के घर
उजाला कैसे होगा
और जब वहाँ साँझ और रात होगी
तब सूरज मेरे घर उजाला ले आएगा,
ये तो प्रकृति का नियम है
इसमें भला सूरज की क्या गलती?

हाँ!
अब नहीं डरती मैं गहराती साँझ से
और न डूबते सूरज से
बल्कि भर जाती हूँ
उम्मीद की किरण से
मेरे आँगन में भी कल फिर
मेरे हिस्से का
उजास का टुकड़ा आने वाला है।
बस रात बीत जाती है
उसी ख्वाब के साथ कि सुबह आँखे खुले
तो उगता हुआ सूरज दिखे,...!

अब जाती हूँ हर शाम
अपने घर के पीछे के ताल में
डूबते सूरज से जल्दी लौटने का वादा लेकर
विदा करने हर साँझ
और बिताती हूँ कुछ पल सिर्फ अपने साथ।
चिंतन ने नजरिया बदलकर
डर की चिता से मुक्त किया एक बार फिर,...!

#डॉप्रीतिसमकितसुराना

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