*आज कुछ विशेष बातें*
जब हम किसी भी संस्था और परिवार के सदस्य होते हैं तो हमारे केवल अधिकार नहीं होते बल्कि अधिकार से पहले कर्तव्य होते हैं।
1. हम अपने समूह में लिखते हैं, अपेक्षा होती है कि सब पढ़ें? क्या आप सबको पढ़ते हैं?
हम चाहते हैं हमें प्रतिक्रिया मिले? क्या आप प्रतिक्रिया देते हैं?
2. हम चाहते हैं रचना प्रकाशित हो? क्या आप प्रकाशित रचना अपनी fb वॉल पर या अपने मित्रों के साथ साझा करते हैं?
3. नियमों को तोड़ने पर क्या टोकने पर बुरा न मानने के लिए संकल्पित हैं जो कि हम जोड़ने के पहले ही बता चुके होते हैं।
4. आप दूसरे समूहों की उपलब्धियां नियम तोड़कर साझा करते हैं पर खुद की इसी समूह से प्रकाशित ईबुक साझा नहीं करते, और न कोई साझा करें तो प्रोत्साहित करते क्या ये सही है?
अद्मिन्स का बोलना बुरा लगता है तो नियम तोड़ने ही क्यों?
मैंने अनेक बार कहा है कि रचनाओं के साथ आपका नाम और प्रोफाइल फोटो अनिवार्य है, पर अनेक रचनाकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता। रचनाओं को फूल-पत्त्तियों के डेकोरेशन की नहीं व्यवस्थित, कॉमा, मात्रा और विराम चिन्हों से सजाएं जो कि एक दूरसे से पूछकर य्या बताकर, देखकर सीखा और सिखाया जा सकता है।
आशा करती हूँ इसकी प्रतिक्रिया कमेंट से नहीं अपने आप में इनमे से जो भी गलती हो रही हो सुधार करके देंगे। प्रतिक्रिया करके दिखाएं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप सब समर्थ हैं तो फिर *हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या?*
कहने का सार ये है कि अपेक्षा करें तो बदले में समर्पण जरूरी है और जो व्यवहार हम सामने वाले से चाहते हैं वही व्यवहार करें भी।
हम सब एक ऐसी फुलवारी से जुड़े हैं जिसका उद्देश्य महकना नहीं महकाना है। आशा है मेरा मंतव्य आप सभी समझेंगे। और समझकर उपरोक्त कहावत को चरितार्थ करते हुए सक्रियता और समर्पण के भाव से इसे समूह नहीं बल्कि परिवार मानकर संवारेंगे, आगे बढ़ेंगे और बढ़ाएंगे।
हिन्द और हिन्दी का सम्मान,
प्रमाण है देश भक्ति का,
आइये करें
*सृजन शब्द से शक्ति का*
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति
डॉप्रीतिसमकितसुराना



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