थक गई हूँ चलते-चलते
न मंजिल का पता,
न किनारों का पता,
और न ही ये पता
किस पेड़ के तले मिलेगी छाँव
बस अपने सपनो की गठरी लिये
चलती ही जा रही हूँ
मुझे शिकायत नहीं है
कि चलना पड़ता है
मुश्किल राहों पर
पर सवाल ये है
कि कितना और कब तक?
#डॉप्रीतिसमकितसुराना
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