भारत माँ आज बंधी है
कोरोना के बंधन में,
भोग रही है असह्य वेदना
कारण एक महामारी है।
माँ ने नेह बहुत लुटाया
रोटी, कपड़ा, मकान दिया
जीवन का कर्ज चुकाने की
आज हमारी बारी है।
माना समस्या यह वैश्विक है,
सबकी कठिन परीक्षा है,
लेकिन सोन चिरैय्या ने
हिम्मत अपनी कब हारी है?
करते रहेंगे नव सृजन,
प्रफुल्लित रखेंगे अपना मन,
*दृढ़प्रतिज्ञ अन्तरा शब्दशक्ति की*
*न्यारी सृजन फुलवारी है।*
डॉ. प्रीति समकित सुराना



बहुत सुन्दर
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