जरा सोचो!
थक गई हूँ
सभी के लिए
करते-करते
सभी इच्छाओं को पूरा
सोचते-सोचते
अपनों का हित-अहित
समझाते-समझाते
लोगों के स्वार्थ
सभी आपनों को
अब चाहती हूँ थोड़ा आराम
कोई मेरे लिए करे
कोई मेरे सोचे
कोई मुझे समझे
कोई मुझे समझाए
मैं कमज़ोर नहीं हूँ
पर ज़रा सोचो!
मैं अब टूट रही हूँ
बिखर रही हूँ जाने क्यों?
#डॉप्रीतिसमकितसुराना



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