#हम नहीं गढ़ते शब्दों को
शब्दों को भावनाएं गढ़ रही है,
जितना जुड़ते हैं हम खुद से
हममें इंसानियत बढ़ रही है,
जैसा मन वैसे भाव,
जैसे भाव वैसा लेखन
हम कौन से रचनाकार
हमारा व्यक्तित्व
हमारे शब्दों में झलकता है
हम कविता को नहीं रचते
कविता हमें रच रही है!
#डॉ प्रीति समकित सुराना



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