सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर
जीवन की संभावनाओं तक,
अभिव्यक्ति और कलाकृति की
अद्वितीय परिकल्पनाओं तक,
शक्ति-शांति दोनों ही रुपों की
सत्य सार्थक परिभाषाओं तक,
सतत प्रेम और विश्वास निहित
सम्पूर्ण समर्पण की भावनाओं तक,
धरती, सरिता, तुलसी या सीता,
पूजा, अर्चना, संध्या या उषा,
बेटी, बहन, पत्नी या माता,
तुम्ही स्वर्गतुल्य प्रकृति हो,
नारी तुम जिस रुप में भी हो,
विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति हो,
नवजात, यौवना या वृद्धा हो,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो।
डॉ. प्रीति सुराना
संस्थापक
अन्तरा शब्दशक्ति



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