Tuesday, 19 June 2018

नव विहान

*नव विहान*
        सुबह-सुबह हाथ में किताबें और कंधे पर पर्स लटकाकर बहुत आत्मविश्वास के साथ आज सुनिधि ने देहरी के बाहर कदम रखा तो लगा मानो सूरज की रंगत में निखार सा है और सकारात्मक किरणें उसके जीवन में भरने आया है।
         तीन महीने पहले अनिल से उसकी सगाई परिवार के दबाव में हुई थी। अनिल रईस परिवार का इकलौता बिगड़ा बेटा था जिसे उसकी हरकतों के कारण लड़की नहीं मिल रही थी। सुनिधि गरीब परिवार की अति विलक्षण प्रतिभाशाली रूप के अलावा सर्वगुण सम्पन्न लड़की जिसके रिश्तेदारों ने सौदानुमा सगाई तो करवा दी पर सुनिधि उसे न स्वीकार कर पा रही थी न परिवार के खिलाफ जाकर कोई निर्णय कर पा रही थी।
           कल बाज़ार में अचानक उसके प्रोफेसर से मिलना हुआ। दो साल बाद अचानक उन्हें सामने देखकर सुनिधि अचकचा गई। तभी प्रोफेसर साहब ने कॉफी पीने का निमंत्रण दिया। दोनों ही पास के कॉफ़ी हाउस में जाकर बैठे। कॉफ़ी आने तक बातों का सिलसिला शुरू हुआ।
प्रोफेसर साहब ने पूछा :-
          'फिर आगे क्या कर रही हो आजकल?'
         'सर,अपने ही महाविद्यालय में व्याख्याता हूँ आजकल, आप ने तो अचानक ही तबादला करवा लिया।'
        'क्या करता एकाकी जीवन जीने का फैसला जो किया था, तुमने साथ देने से इनकार किया उसके बाद यहां रुकने का मन ही नहीं किया।'
        'मैं अपनी कुरूपता को आपके जीवन की कालिमा नहीं बनने दे सकती थी। पर मेरी नियति तय ही थी शायद इसलिए मेरा जीवन पैसों के मोल एक बिगड़े नवाब के हाथों बेच दिया जाना तय हुआ।' और उसने अनिल से सगाई की बात बता दी।
         प्रोफेसर साहब ने हाथ बढ़ाकर सुनिधि का हाथ थाम लिया और कहा सुनिधि मैं आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ, मेरा विश्वास करो मैंने कभी तुम्हारे रूप-रंग पर दया वाले भाव रखकर तुम्हें नहीं चाहा, मैं मोहित हुआ था तुम्हारी आंतरिक सुंदरता पर। अपने गुणों को इस तरह बिकने मत दो। तुम्हारा जीवन खत्म हो जाएगा और तुम्हारे बिना मेरा भी। मेरे पास सबकुछ है पर तुम्हारे बिना सब व्यर्थ है,.. मेरा निवेदन स्वीकार कर सको तो कल सुबह मैं महाविद्यालय के कार्यालय में प्रतीक्षा करूंगा।
         तुम्हारे पिताजी से तुम्हारी हालात देखी नहीं जा रही थी उनके कहने पर ही मैं लौटा हूँ और कल फिर से नौकरी पर लौट रहा हूँ।
         निर्णय तुम्हें लेना है रिश्तेदारों के विरोध करने की हिम्मत भले ही तुम्हारे मातापिता में न रही हो पर तुम्हारे निर्णय में साथ देने को वो तैयार है। यदि तुम चाहो तो सुबह मेरे साथ-साथ एक नवजीवन भी तुम्हारी प्रतीक्षा करेगा।
         *आज सचमुच सुनिधि का स्वागत 'नव विहान' और प्रो. विहान दीक्षित ने किया।*

*डॉ. प्रीति सुराना*
*वारासिवनी (मप्र)*

1 comment:

  1. https://bulletinofblog.blogspot.com/2018/06/blog-post_19.html

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