Tuesday, 9 January 2018

चिराग

ढल रही सांझ के मानिंद
मंद पड़ती जाती है
मेरी उम्मीदों के चिरागों की लौ,..
और ठीक तभी
दूर ही सही
तुम्हारी मौजूदगी
महसूस होती है
रात के अंधेरे में
बादलों की मचान पर छुपे
चाँद की तरह,
जो निकले या न निकले
अमावस को
पर हर पूर्णिमा को निकलेगा ही,...

और
सुबह जब भी सूरज आएगा
रोशनी के बाद भी
अंधेरों के फिर आने के
डर को परे धकेलकर
मेरे चाँद के हमेशा साथ होने का यकीन
जिंदा रखेगा
मेरी उम्मीदों के चिरागों को,...

हाँ !
मेरी जिंदगी में रोशनी का अर्थ
सिर्फ तुम हो
सूरज की तरह तप्त रोशनी नहीं
तुम्हारे साथ कि स्निग्ध शीतलता
रखती है मुझमें
जिन्दा रहने का हौसला,
अमावस से पूर्णिमा तक,...

सुनो!!!
ग्रहण के अपवाद में भी
कायम रखोगे न
विश्वास मेरा,.... प्रीति सुराना

2 comments:

  1. निमंत्रण पत्र


    मंज़िलें और भी हैं ,

    आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद हैआपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना

    जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी

    रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।

    ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा !

    इसी पावन उद्देश्य के साथ लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों का हृदय से स्वागत करता है नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' में सोमवार १५ जनवरी २०१८ को आप सभी सादर आमंत्रित हैं। "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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  2. निमंत्रण पत्र :

    मंज़िलें और भी हैं ,

    आवश्यकता है केवल कारवां बनाने की। मेरा मक़सद है आपको हिंदी ब्लॉग जगत के उन रचनाकारों से परिचित करवाना जिनसे आप सभी अपरिचित अथवा उनकी रचनाओं तक आप सभी की पहुँच नहीं।

    ये मेरा प्रयास निरंतर ज़ारी रहेगा ! इसी पावन उद्देश्य के साथ लोकतंत्र संवाद मंच आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों का हृदय से स्वागत करता है नये -पुराने रचनाकारों का संगम 'विशेषांक' में सोमवार १५ जनवरी २०१८ को आप सभी सादर आमंत्रित हैं। "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



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