Thursday, 17 September 2015

तप की महिमा

आज एक कार्यक्रम में कुछ बच्चों द्वारा तप के बारे में एक नाटक का मंचन है बच्चों के बोलने के लिए कुछ पंक्तियां तप पर लिखी है,..जो आप यहां साझा कर रही हूं,..

1)
तप तो है बहता पानी
बहा ले जाता सारे पाप,
निर्मल मन से करके देखो
हर लेगा तप हर संताप।

2)
तप एक ऐसी ज्वाला है
कर्मो का जो कर दे अंत,
तप सच्चा कर लेते कोई
कट जाते पल में भव अनंत।

3)
तप नहीं केवल भूखा रहना
तप तो इन्द्रियों का वशीकरण है,
निर्मल मन और इन्द्रिय शमन का
एक पावन सा समीकरण है।

4)
उपवास बेला तेला अठाई
तपस्या तन से खूब कराई,
पर मन को वश में कर न सके
तो सारे ही तप व्यर्थ है भाई।

5)
अनुमोदना तप की करें हम ह्रदय से
हमारे मन में भी तप के भाव तो आएं,
माना तन को उपवासी करना कठिन है
पर करने की सच्ची भावना तो भाएं।

6)
तप कोई खेल नहीं है
जो देखादेखी हो जाता है,
तप में रसना को वश में करना
किसी किसी को ही आता है।

7)
तपना पड़ता है सोने को
तब वह कुंदन बन पाता है,
तप से कर्म जल जाते हैं
तभी जीव मुक्ति पाता है।

8)
कर्मों की गति निराली है
भव भ्रमण कराने वाली है,
तप संयम की नैय्या में बैठो
ये भवपार ले जाने वाली है।

9)
मुक्ति तब तक नहीं मिलेगी
कर्मो का जब तक खाता है,
भवपार गया है वो ही
जिसने कर्मों को काटा है।

10)
तप कर सोना बना है कुंदन,
घिस कर शीतल हुआ है चन्दन,
तप से कर्मों को घिसने वालों को,
करते हैं देवेन्द्र भी वंदन।

11)
तप एक साधना है,
भावों की आराधना है,
शरीर को संयम में रखकर
आस्रव से संवर में बांधना है।

12)
अंतराय कर्म की निर्जरा
कर ले तू मनुज जरा,
तप कर ले सच्चे मन से
जीवन को बना मोती खरा।

प्रीति सुराना

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