Thursday, 2 July 2015

खरे मोतियो की तरह,..


सुनो!!

अकसर
मैंने रिश्तों को सम्भाला है
अपनी हथेली पे
खरे मोतियो की तरह,..
कभी कोई बिखर जाता है
तो कभी कोई गिर भी जाता है,... 
तब कभी 
खुद भी बिखरती हूं 
मैं उन्हें समेटने की खातिर,..
तो कभी 
खुद झुककर मैं उनको उठा लेती हूं,..
लेकिन
जब दिखाना होता है ज़माने को 
कितने खूबसूरत हैं मेरे रिश्ते,.
तो इन मोतियों को अपने गहनों में जड़ा लेती हूं,..
और
कोशिश करती हूं
इन मोतियों को किसी की नज़र न लगे,..
और इसलिए
ज़माने के डर से 
कभी आंचल में 
तो कभी
मुट्ठी में छुपा लेती हूं,..प्रीति सुराना

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