Friday, 19 June 2015

ये बारिश थमें ही नहीं,..


सुनो!!
आज
सचमुच
जी चाह रहा है
ये बारिश थमें ही नहीं,..

जाने क्यूं
मन के भीतर
उमड़ते-घुमड़ते
दर्द संभाले नहीं जा रहे,..

बहुत अरसा हुआ
संभालते हुए 
इन दर्द के बादलों को
सबसे छुपाते हुए,...

बेसबब
आज टूट रहा है 
सब्र का बांध
जो बांध रखा था मन में,..

काश
संभाल सकूं
बरसते हुए आंसुओं को
और छुपा सकूं इन्हें अपनों से,...

सच 
आज बारिश का न रुकना 
जरुरी है 
मेरे अपनों की खातिर,...प्रीति सुराना

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, २० जून, २०१५ की बुलेटिन - "प्यार, साथ और अपनापन" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

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  3. फॉण्ट कलर के कारण रचना पढ़ने में कठिनाई हो रही ( अन्यथा ना लें )

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  4. बहुत सुन्दर सृजन . हर्दिक बधाई

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