Saturday, 9 March 2013

कितनी पागल हूं ना मैं,...??


मन आज उदास है 
बार बार भीगी पलकों को 
छुपाती हूं तुमसे 
और
अकेले में जाकर 
सुबक-सुबक कर रोती हूं

मन से ये चाहती हूं 
कि मुझे रोता देखकर 
कंही से तुम आ जाओ 

और समेट लो अपनी बांहों में 
और वही दर्द जान लो 
जो मैंने तुसे छुपाया था,..

कितनी पागल हूं ना मैं
तुमसे छुपाया दर्द
तुम्ही से बांटना चाहती हूं

क्या करूं तुमसे प्यार करती हूं 
इसलिए
अपना दर्द तुम्हे दे नहीं सकती
और
तुम पर जितना हक है
उतना किसी और पर नही ,....प्रीति सुराना

16 comments:

  1. बहुत ही भावपूर्ण कविता,आभार.

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  2. बेहतरीन


    सादर

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  3. प्रेम में ऐसी दुविधा की स्थिति होती ही है
    बहुत बढ़िया
    सादर !

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  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (10-03-2013) के चर्चा मंच 1179 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  5. बढ़िया प्रस्तुति-
    शुभकामनायें -
    हर हर बम बम

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  6. सुंदर भाव बधाई
    http://guzarish66.blogspot.in/2012/10/blog-post_16.html

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  7. बहुत सुन्दर रचना... महाशिवरात्रि की शुभकामनायें

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