Tuesday, 8 January 2013

ताला


मैंने 
अपने 
दिल के दरवाजे पर 
ताले लगा रखे है

ताकि 
मेरी भावनाओं तक पहुंच 
सिर्फ उनकी हो 
जो दिल में रहते हैं 

और 
दिल में जगह 
सिर्फ उनकी है 
जिन्हे मैंने इजाजत दी है 

जिनसे मैं अपने
सुख-दुख,सपने-हसरतें
सच-झूठ,प्यार-गुस्सा
सब कुछ साझा करती हूं

उनके दिए 
सारे अहसास 
मैंने स्वेच्छा से 
स्वीकार किए हैं

फिर ये तनाव 
ये अनमनापन
ये चिड़चिड़हट
सब क्यूं महसूस करती हूं मैं

ओह मैं तो भूल ही गई
मेरे पास जीवन का एक अंग और है
दिमाग
जिसे मैंने खुला छोड़ रखा है

कोई भी 
मुह उठा कर घुसा चला आता है
और छोड़ जाता है 
अपने घर का कूड़ा-करकट

फिर उठती है सड़ांध
फैलता है प्रदूषण
और खराब कर जाता है
मेरे जीवन का माहौल

अब 
मैंने कर लिया है फैसला
जब मैं अपने दिल की तरह
अपने दिमाग पर भी ताला लगा दूंगी

ताकि
जी सकूं मैं 
अपनी जिंदगी
अपने तरीके से

और मैं ये भी जानती हूं
अच्छे और बुरे
दोनो एहसासजरूरी है जिंदगी में
तभी जीने का मजा है

तो क्यूं न जी लूं जिंदगी
अपने अपनो के संग
फिर क्या हुआ जो अपने भी दर्द देते है
आखिर अपने ही अपने होते हैं

लो मैंने लगा दिया
अपने दिमाग को ताला
अब यंहा सिर्फ मेरी
हुकुमत चलेगी,........प्रीति सुराना

2 comments:

  1. बहुत अच्छे ... आपकी पोस्ट से एक ओर उम्दा कविता ...वाह

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