Monday, 10 September 2012

तुम्हारी अंजुलि,


सुनो!
तुमने कहा था न,
संभालकर रखना
जब मैं प्रेम से भर दूंगा
तुम्हारी अंजुलि,..

देखो ना,
इन आधी-अधूरी 
उलझी लकीरों से भरी
मेरी हथेलियां 
कितनी खुरदुरी सी है,..

पर
प्रेम नाजुक है,.
उसे दर्द होगा
और मैं नही देख पाउंगी
प्रेम को दर्द में,...

प्रेम 
सच की तरह ठोस होकर भी,
पानी की तरह बहने को रास्ते ढूंढ लेता है,.
मेरी अंजुलि से रिस गया तो
कैसे संभाल पाउंगी,.....??

तुम ढूंढ लो न 
कोई और ठिकाना,
जैसे मेरा मन,
या मेरी आत्मा,..
जंहा सुरक्षित रहे प्रेम हमेशा,......प्रीति

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