Wednesday, 22 August 2012

मेरी खामोशी


सुनो! 
अब मैं तुमसे 
कुछ भी नही बोलूंगी,..

पर
जब मैं बोलती रही 
तब तुम न समझ सके,..

तो क्या 
अब तुम पढ़ पाओगे 
मेरी खामोशी?

या 
तुम मुझे 
समझना ही नही चाहते,..

बोलो न
मैं अब तुम्हे 
सुनना चाहती हूं,..

क्यूंकि  
अब मैं थक गई हूं 
तुम्हारी खामोशियों को पढ़ते-पढ़ते,......प्रीति

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