Saturday, 2 June 2012

"फुरसत के पल"


कल बहुत समय बाद फुरसत से
गई एक सहेली की ननद की शादी में,
सोचा चलो आज थोड़ा वक्त बिताऊं उन सखियों के साथ
जिनके साथ मैं अकसर जाया करती थी 
हर सामाजिक आयोजनों में
वो भी क्या दिन थे जब सजधज कर निकला करती थी
हम औरतों की टोली ,करती हंसी ठिठोली
वंहा पहुची तो मिली वो सारी सखियां और सहेली
पर सब देख रही थी कुछ यूं मानो हूं मैं कोई पहेली,
मुझे देखते ही सब करने लगी आपस में कानाफूसी,.....

कुछ बातें पास से गुजरते हुए मैंने भी सुनी
अरे ये तो वही है ना कितनी अलग सी लगने लगी है
कहां गई इसके माथे की बड़ी सी बिंदीयाआंखों का काजल,
हांथों की भरी भरी चूडियांजो इसकी हर अदा पे खनकती थी
फुदकती रहती ये और साथ पायल छनकती थी,
जिसकी बनारसी साड़ी हमेशा हम सब से अलग हुआ करती थी
जंहा भी जाती सबकी नजरें इसी पर जाकर थम जाती
आज भी देखो सब उसी को देख रहे हैं
पर ये कितना बदल गई है

जाने क्यूं मेरे कदम वहीं रूक गए
मैं खुद को रोक न पाईऔर जा पहुंची उनके सामने
और अपने पुराने अंदाज में हंसकर मिली सबसे
वैसे ही जैसे पहले मिला करती थी
जब मेरी सखियां थोड़ी सहज हुई तो पूछे वो सारे सवाल मुझसे 
जो उनकी जिज्ञासा की वजह थे
मैंने कहा मैं अब भी वही हूं
हां बदल गया मेरा जीने का तरीका
जिन आंखों में काजल हुआ करते थे उनमें है सपने कल के,...

हाथों की मेंहदी और चूड़ियां निकालकर इसलिए पहन ली घड़ी.
क्योंकि वक्त का रखना होता है खयाल ,
आखिर है वक्त के साथ चलने सवाल,
पायल इसलिए उतार दी
क्योंकि मन उलझ जाता था उसकी छनछन में,
लंबे बालों का जुड़ा बांधने में लगता था वक्त सो कटवा लिए बाल,
सर पर पहले होता था बड़ों के आशीर्वाद का हाथ,
अब पल्लू भी नही टिकटा 
रखा है इतनी जिम्मेदारियों का इतना बोझ,
कैसे उठाती बनारसी साड़ी का वजन जब वैसे ही बोझिल रहता है मन,...

पर
मेरा मन और भावनाएं आज भी वही हैं,
मैं अब भी हूं उतनी ही चंचल,
पर मेरे माथे की बिंदीया छोटी हो गई है आजकल,
जैसे मेरी भागती हुई जिंदगी में छोटे हो गए हैं "फुरसत के पल",.....प्रीति

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