Thursday, 11 June 2020

दुविधा



शालिनी की दुविधा ये थी कि उसकी ननद का अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ था। और ननदोई बार-बार लेने आने को फोन कर रहे। उधर दूसरी तरफ सास-ससुर ने साफ कह दिया कि हम नहीं जाएंगे लेने क्योंकि साधन और स्वास्थ्य दोनों से हम समर्थ नहीं। ननद से देवर देवरानी की बात भी बंद ही थी।
ऐसे में ये तय था कि उन्हें लेने जाना यानि अपना स्वास्थ्य, अपना काम, अपनी समस्याएँ, स्टाफ की परेशानी, बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस, घर का बजट (जिसे लॉकडाउन ने वैसे ही ध्वस्त कर रखा था) सबकुछ तक पर रखकर उनको मायके बुलाना।
सब सामान्य होता तो कोई और बात थी, दोनों (ननद-नन्दोई) के झगड़ों से परेशान होकर शालिनी अपने घर की शान्ति भंग नहीं करना चाहती थी, बस पिछले तीन दिनों से इसी दुविधा में घुली जा रही थी क्या करे?
इसी चिंता में तबीयत कुछ ऐसी बिगड़ी कि किस्सा ही पलट गया बस फ़र्क इतना ही था कि शालिनी के लिए मायका नहीं अपना घर, अपना कमरा, अपना कोना ही स्वर्ग था।
तात्कालिक समस्या का समाधन तो हुआ ही, कुछ आराम खुद उसे भी मिल गया, वो भी बच्चों और पति की केअर के साथ। साथ-साथ ये दुविधा ये भी मिटी कि न लाने का निर्णय सही था और विश्वास गहरा हुआ कि हर हाल में अपना घर ही सुखदायी है।

#डॉप्रीतिसमकितसुराना

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