Monday, 30 July 2018

द्वंद की पीड़ा

व्यथित हूँ
अंतर्मन में झेल रही हूँ
सतत एक द्वंद की पीड़ा
जो किया
जब किया
जितना किया
यथा सामर्थ्य पूर्ण समर्पण
और
दायित्वों के प्रति निष्ठाभाव से किया
पर
परिणाम
हर बार एक ही
सिरहाने मिली
उलाहनों की पोटली
पैबंद लगा बिछौना
अनमनापन
निराशमन
और
स्तंभित कदम
जो रोक रहे आगे कुछ भी करने से,..
मन से आवाज़ आती है
जो करता है
हमेशा दोष उसमें ही ढूंढे जाते हैं
बस कर्म किये जा,...
मस्तिष्क कहता है
वो अधिक सुखी हैं
जो कुछ नही करते
कम से कम
दोषारोपण के
दंश झेलने से बच जाते है,...
जूझ रही हूँ प्रतिपल
आखिर
आगे क्या करुँ क्या न करुँ??
सुनो!
सच कहूँ
पुकारती हैं फिर मुझे
गुमानाम राहें
न मिलूं अगर कभी
तो ढूंढ लेना
उसी गहनतम अंधेरे कोने में
जिसका पता किसी को नहीं
सिवा तुम्हारे,.... प्रीति सुराना

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया

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  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' ०६ अगस्त २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/



    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।



    आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'



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