Wednesday, 27 December 2017

मैं जल सी,..( कुछ मुक्तक)

मैं बहती ही रही हूं जल सी सदा
पत्थरों ने निभाई अपनी भूमिका
रोकने को रास्ते थे खड़े हर जगह
धाराओं में बंटी पर न बहना रुका

किसी को मुझसे न लगे चोट कोई
नीयत में कभी न आए खोट कोई
जल सी पारदर्शिता रहे मुझमें कायम
मलिनता न हो मुझमें शामिल कोई

चपलता, चंचलता और संजीदगी
नदी सी हमेशा मुझमें कायम रही
बांधने को बांध तत्पर रहे लोग लेकिन
अभियंता ही रहे वो मेरे नियंता नहीं

मैं जल हूँ नदी का बस ये जान लो
हो सके तो फितरत भी पहचान लो
समर्पण है पूंजी और मेरा आत्मबल
मिलूंगी बस सागर से ही मान लो

मेरी राह में जो भी पत्थर बने
फौलादी है इरादे मेरे मान लें
सागर है मंजिल मेरी जिंदगी की
टूटकर भी बहूँगी सभी जान लें।

प्रीति सुराना

3 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर सन्देश देती हुई रचना। सादर

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  2. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद ब्लॉग पर 'शुक्रवार' २९ दिसंबर २०१७ को लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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  3. ब्लॉग जगत के श्रेष्ठ रचनाओं का संगम "लोकतंत्र" संवाद ब्लॉग पर प्रतिदिन लिंक की जा रही है। आप सभी पाठकों व रचनाकारों से अनुरोध है कि आप अपनी स्वतंत्र प्रतिक्रिया एवं विचारों से हमारे रचनाकारों को अवगत करायें ! आप सभी गणमान्य पाठकों व रचनाकारों के स्वतंत्र विचारों का ''लोकतंत्र'' संवाद ब्लॉग स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

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