Wednesday, 8 January 2014

एक कोशिश (माहिया)

एक कोशिश
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सीमा है सहने की,
पीर सहूं कैसे
तेरे बिन रहने की,...

बस है ये ही कहना,
इक पल भी मुझको
बिन तेरे ना रहना,..

गम को हर पल पीना,
लगता सदियों सा
तुझ बिन पलभर जीना,..

जीने की चाहत है,
मार समय की है
जिससे मन आहत है,...

सच ही है ये बातें,
काल नही थमता
सुख दुख आते जाते,... 
                                     प्रीति सुराना

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (11-1-2014) "ठीक नहीं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1489" पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  2. अच्छी लगी। शुभकामनाएँ

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  3. अच्छा लिखा है आपने-- बधाई हो

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