Wednesday, 31 July 2013

ओस की बूंदों सी

ओस की बूंदों सी 
ये उम्मीदें होती है 

सूरज रूठा बैठा हो
बरखा सी रोती है

ताप अगर बढ़ जाए 
अपना वजूद खोती है

सूरज बदली से झांके
फिर सपने बोती है

सपने कभी जो टूटे
रूठ कर सोती है

सिरहाने रख टूटे सपनें
आंसुओं से धोती है

ओस की बूंदों सी 
ये उम्मीदें होती है

या उम्मीदों सी नाजुक
ये बेटियां होती हैं,......????
                      प्रीति सुराना



4 comments:

  1. suraj jo rootha hai ...
    bheetar se toota hai
    darta hai apne taap se ..
    bana rahe vajood ous (ummeed ) ka
    vo jal na jaye ....uske santaap se




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  2. Sach kaho to betiyan sab kuch hoti hain ...
    Dil ko choone wali rachna ....

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  3. खूबसूरत ....बेटियाँ बस ऐसी ही होती हैं

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