Friday, 14 June 2013

मेरी,तुम्हारी और हमारी

सुनो!!!

तुमने 
मेरी,तुम्हारी और हमारी,.
जिंदगी से जुड़े सारे अधिकार मुझे दिए,.

पर तुम 
एक अधिकार देना तो 
भूल ही गए,...

इन सारे अधिकारों के 
उपयोग करने का 
अधिकार,..

सच 
कितने लापरवाह हो न 
तुम,.... :(,....प्रीति सुराना

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(15-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. जिंदगी में शिकवे शिकायतों का अपना एक अलग ही स्थान है.

    सुंदर प्रस्तुति.

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